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अमेरिका के न्यूनतम टैक्स प्रस्ताव का ब्योरा सामने आया तो उठे कई सवाल

Fri, 09 Apr 2021 02:17 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 09 Apr 2021 02:17 PM IST
सार

अमेरिकी प्रस्ताव डिजिटल कंपनियों के वैश्विक कारोबार के नियमों को बिल्कुल नए सिरे से तय करने का प्रयास है। अमेरिका न सिर्फ गूगल और फेसबुक जैसी अमेरिकी कंपनियों, बल्कि दुनिया भर की तमाम कंपनियों को नए नियमों के दायरे में लाना चाहता है...

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United States has sent the details of its proposal to fix the minimum tax rate globally to the government of more than 130 countries
अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन - फोटो : PTI (फाइल फोटो)

विस्तार

अमेरिका ने वैश्विक न्यूनतम टैक्स रेट तय करने के अपने प्रस्ताव का ब्योरा 130 से ज्यादा देशों की सरकारों को भेजा है। ब्रिटिश अखबार द फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक इस प्रस्ताव में ये प्रावधान शामिल है कि दुनिया की 100 सबसे बड़ी कंपनियों को, जिनका सालाना राजस्व कम से कम 20 अरब डॉलर है- उन देशों में टैक्स देना होगा, जहां वे अपने उत्पाद या सेवाएं बेचती हैं।

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विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि बड़ी टेक कंपनियों पर टैक्स कैसे बढ़ाया जाए, इस सवाल पर कई वर्षों से दुनिया में चर्चा चलती रही है। लेकिन पहली बार इस बारे में एक ठोस प्रस्ताव सामने आया है। धनी देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकॉनमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) इस प्रस्ताव पर संबंधित देशों के साथ चर्चा आगे बढ़ाएगा। लक्ष्य यह है कि अगले जून तक इस बारे में आम सहमति तैयार कर ली जाए।
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अधिकारियों ने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि अमेरिकी प्रस्ताव एक तरह से (खास कर डिजिटल कंपनियों के मामले में) वैश्विक कारोबार के नियमों को बिल्कुल नए सिरे से तय करने का प्रयास है। अमेरिका न सिर्फ गूगल और फेसबुक जैसी अमेरिकी कंपनियों, बल्कि दुनिया भर की तमाम कंपनियों को नए नियमों के दायरे में लाना चाहता है। विभिन्न देशों को भेजे गए प्रस्ताव में अमेरिका ने यह साफ कहा है कि वह किसी ऐसे नियम पर सहमत नहीं होगा, जिसका असर सिर्फ अमेरिकी कंपनियों पर पड़े। इसलिए अमेरिका चाहता है कि ब्रिटेन और फ्रांस अपने यहां हाल में लगाए गए डिजिटल सर्विसेज टैक्स को वापस ले लें। इस टैक्स का निशाना मोटे तौर पर अमेरिकी कंपनियां ही हैं।
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अमेरिकी प्रस्ताव का का मकसद कंपनियों के वैश्विक मुनाफे कर टैक्स के दायरे में लाना है। लेकिन वह चाहता है कि इस दायरे में सिर्फ डिजिटल कंपनियों को ही नहीं, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को भी लाया जाए। इसलिए अगर अमेरिकी कंपनियों पर सहमति बनी, तो जर्मन कार कंपनियां और चीन की अलग-अलग प्रकार की वस्तुएं बनाने वाली कंपनियां भी वैश्विक कर के दायरे में आ जाएंगी।

यूरोपीय आयोग के प्रत्यक्ष कराधान विभाग के निदेशक बेंजामिन एंजेल ने गुरुवार को एक ट्विट में कहा- अमेरिका ये प्रस्ताव कर रहा है कि ऑटोमैटेड डिजिटल सेवाओं और कंज्यूमर को ध्यान में रख कर होने वाले कारोबार के बीच फर्क खत्म कर दिया जाए। वह 100 सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को नए टैक्स ढांचे के तहत लाना चाहता है, भले वे कोई कारोबार करती हों। एंजेल ने कहा कि इसलिए अमेरिकी प्रस्ताव की गहराई से पड़ताल करनी होगी और इस लिहाज से आने वाले महीने निर्णायक होंगे।

कुछ सिविल सोसायटी थिंक टैंक ने अमेरिकी प्रस्ताव पर एतराज उठाए हैं। ऐसी एक संस्था यूरोपियन नेटवर्क ऑन डेट एंड डेवलपमेंट की नीति प्रबंधक टॉव मारिया राइडिंग ने कहा है कि अमेरिकी प्रस्ताव से समस्या हल नहीं होगी। समस्या वे कॉरपोरेट नियम हैं, जो कंपनियों को अपने दायित्व को ठेंगा दिखाने की इजाजत देते हैं। राइडिंग ने वेबसाइट पोलिटिको.ईयू से कहा- ‘यह सचमुच बहुत बेतुकी बात है कि एक नया वैश्विक टैक्स ढांच सिर्फ 100 सबसे बड़ी कंपनियों के लिए बनाया जाए। जरूरत बुनियादी सुधार करने की है, ना कि पुराने सिस्टम पर एक अतिरिक्त ढांचा थोप देने की।’


राइडिंग ने कहा कि कॉरपोरेट टैक्स का सिस्टम बहुत पेचीदा और फिलहाल अप्रभावी है। अब आशंका यह है कि यह और भी बदतर हो जाए। कई दूसरे हलकों से भी अमेरिकी प्रस्ताव पर सवाल उठाए गए हैं। इनमें पहला शक तो इस पर दुनिया भर के देशों की सहमति बनने को लेकर ही है। जिन देशों को मौजूदा व्यवस्था में लाभ है, वे नए प्रस्ताव पर सहमत होंगे, इसकी संभावना कम है। दूसरा सवाल नई व्यवस्था के प्रभावी होने को लेकर भी उठा है।

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