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UN: क्या है अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय? जिसमें चल रहा है इस्राइल-हमास संघर्ष को लेकर मुकदमा
Tue, 21 May 2024 12:18 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
यूएन हिंदी समाचार
यूएन हिंदी समाचार
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 21 May 2024 12:18 PM IST
सार
एक नजर, आईसीसी से जुड़े पांच अहम तथ्यों पर, और साथ ही जानते हैं कि एक अधिक न्यायसंगत विश्व को आकार देने में यह कोर्ट अपनी भूमिका किस प्रकार से निभा रही है।
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अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय।
- फोटो : UN
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विस्तार
वर्ष 2002 में स्थापित और नैदरलैंड्स की राजधानी द हेग में स्थित, आईसीसी एक आपराधिक न्यायालय है। जिसमें व्यक्तियों पर युद्ध अपराधों व मानवता के विरुद्ध अपराध मामलों में मुकदमा चलाया जा सकता है। सोमवार को, आईसीसी ने इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, रक्षा मंत्री योआव गैलांट और हमास के तीन नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वॉरंट जारी किए जाने का अनुरोध किया है।
ये वारंट, इस्राइल में हमास के नेतृत्व में किए गए हमलों और उसके बाद, पिछले सात महीनों से गाजा में इस्राइली सैन्य कार्रवाई से जुड़े मामलों में हैं। इन वॉरंट को आईसीसी न्यायाधीशों द्वारा औपचारिक स्वीकृति दी जा सकती है।
एक नजर, आईसीसी से जुड़े पांच अहम तथ्यों पर, और साथ ही जानते हैं कि एक अधिक न्यायसंगत विश्व को आकार देने में यह कोर्ट अपनी भूमिका किस प्रकार से निभा रही है।
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1) जघन्यतम अपराधों के मुकदमे चलाना
आईसीसी को उन "लाखों बच्चों, महिलाओं और पुरुषों" को ध्यान में रखकर बनाया गया था, जो "मानवता की अंतरात्मा को झकझोर देने वाले अकल्पनीय अत्याचारों के शिकार हुए थे।" आईसीसी विश्व की पहली स्थायी, संधि-आधारित अदालत है, जिसका दायित्व मानवता के विरुद्ध अपराधों, युद्ध अपराधों, जनसंहार व आक्रामकतापूर्ण अपराधों के दोषियों की जांच करना व उन पर मुकदमा चलाना है।
इस कोर्ट ने पूर्व यूगोस्लाविया के स्रेब्रेनीत्सा समेत अन्य इलाकों में अंजाम दिए गए युद्ध अपराध मामलों में सफलतापूर्वक दोष सिद्ध किए और अंतरराष्ट्रीय न्याय से जुड़े कई अहम मामलों का निपटारा किया है। इनमें, बाल-सैनिकों का इस्तेमाल, सांस्कृतिक विरासत का विध्वंस, यौन हिंसा, या निर्दोष नागरिकों पर हमलों समेत अनेक अन्य मामले हैं। आईसीसी ने विश्व में कुछ सबसे गंभीर हिंसक टकरावों की जांच की है, जिनमें दारफूर, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, गाजा, जॉर्जिया व यूक्रेन समेत अन्य मामले हैं।
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में सार्वजनिक सुनवाई की जाती है, 31 मामलों की प्रक्रिया चल रही है, और इसकी वारंट सूची में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अलावा, लीबिया के कुछ व्यक्ति भी हैं। हालांकि, एक वॉरन्ट को जारी करना और फिर संदिग्धों को पकड़ा जाना चुनौतीपूर्ण है। कोर्ट के पास अपने वारंट पर अमल के लिए पुलिस नहीं है और अक्सर आदेश को लागू करने के लिए उसे सदस्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा दोषी करार दिए गए अधिकांश व्यक्ति अफ्रीकी देशों से हैं।
2) पीड़ितों को शामिल करना
यदि किसी दिन आप आईसीसी में अदालती प्रक्रिया को देखें, तो आपको गवाहों या पीड़ितों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों की आवाज सुनाई देगी। न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए उनकी बात सुना जाना जरूरी है। न्यायालय न केवल सबसे जघन्य अपराधों के लिये जिम्मेदार लोगों को दंडित करने का प्रयास करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि पीड़ितों की आवाज सुनी जाएं। पीड़ित वे व्यक्ति हैं, जिन्हें न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में किसी भी अपराध के परिणामस्वरूप पीड़ा पहुंची हो।
ये पीड़ित, आईसीसी की न्यायिक कार्यवाही के सभी चरणों में भाग लेते हैं। अत्याचार से जुड़े अपराधों में 10 हजार से अधिक पीड़ित, इस न्यायालय की कार्यवाही में भाग ले चुके हैं। आपराधिक न्यायालय, अपने संपर्क व पहुंच कार्यक्रमों के माध्यम से, अपने अधिकार क्षेत्र में अपराधों से प्रभावित समुदायों के साथ सीधे संपर्क बनाए रखता है।
न्यायालय, पीड़ितों एवं गवाहों की सुरक्षा और शारीरिक व मनोवैज्ञानिक अखंडता की रक्षा करने के लिए भी प्रयासरत है। हालांकि पीड़ित व्यक्ति यहां सीधे अपने मामले लेकर नहीं आ सकते हैं, लेकिन वे अभियोजक को जानकारी दे सकते हैं, जो यह तय करते हैं कि कोई मामला जांच के योग्य है या नहीं। वर्तमान में, पीड़ितों के लिए स्थापित ICC ट्रस्ट कोष, न्यायालय द्वारा क्षतिपूर्ति सम्बन्धी पहले आदेशों को वास्तविकता में बदलने में जुटा है। इनमें कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में पीड़ितों व उनके परिवारों के लिए मुआवजे की मांग भी है।
इस कोष ने अपने सहायता कार्यक्रमों के माध्यम से साढ़े चार लाख से अधिक पीड़ितों को शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक-आर्थिक सहायता भी प्रदान की है।
3) निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना
आईसीसी के समक्ष, सन्देह से परे दोष साबित होने तक सभी प्रतिवादियों को निर्दोष माना जाता है। सभी प्रतिवादी सार्वजनिक और निष्पक्ष कार्यवाही के हकदार होते हैं। आईसीसी में, संदिग्धों और अभियुक्तों के पास महत्वपूर्ण अधिकार होते हैं, जिनमें: आरोपों के बारे में जानकारी पाने; अपना बचाव तैयार करने के लिये पर्याप्त समय मिलने; बिना किसी देरी के मुकदमा चलाए जाने; स्वतंत्र रूप से वकील का चुनाव करने; अभियोजक से दोषमुक्ति सम्बन्धी साक्ष्य प्राप्त करना आदि शामिल हैं।
इन अधिकारों में से एक है - उस भाषा में कार्यवाही करने का अधिकार, जो अभियुक्त को पूरी तरह समझ में आती हो। इसके मद्देनजर, अदालत ने 40 से अधिक भाषाओं में विशेष दुभाषियों व अनुवादकों को भर्ती किया है, और कभी-कभी एक ही सुनवाई के दौरान एक साथ चार भाषाओं का इस्तेमाल किया जाता है।
अपने पहले 20 वर्षों में, प्रतिभागियों को अपराध स्थलों से मीलों दूर, नई व्यवस्था, प्रक्रियात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके अलावा, ICC द्वारा अभियोजित अपराध एक विशिष्ट प्रकृति के होते हैं, जिन्हें अक्सर बड़े पैमाने पर अंजाम दिया जाता है। इसके लिए बड़े पैमाने पर साक्ष्यों की जरूरत होती है, और गवाहों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जानी अहम है। अदालती कार्यवाही जटिल है और ऐसे अनेक विषय हैं जिन्हें सुनवाई के दौरान पर्दे के पीछे हल करने की आवश्यकता पड़ती है।
4) राष्ट्रीय अदालतों की पूरक व्यवस्था
यह न्यायालय, राष्ट्रीय न्यायालयों की जगह नहीं लेता. यह केवल न्याय के अंतिम उपाय के रूप में काम करता है। सबसे गंभीर अपराधों को अंजाम देने वालों की जांच करने और उन्हें दंडित करने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी देशों की ही होती है। आईसीसी द्वारा केवल तभी कदम उठाया सकता है, जब किसी देश में न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के तहत जघन्य अपराध हुआ हो, मगर वो कदम उठाने के लिये अनिच्छुक हो या असल में उसका निपटारा करने में असमर्थ हो।
दुनियाभर में गंभीर हिंसा तेजी से बढ़ रही है। न्यायालय के पास सीमित संसाधन हैं और यह एक समय में बहुत कम मामले ही निपटा सकता है। यह न्यायालय, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरणों के साथ मिलकर काम करता है।
5) न्याय के लिये अधिक सहयोग जुटाना
सभी महाद्वीपों के 123 देशों के समर्थन से, आईसीसी ने स्वयं को एक स्थाई व स्वतंत्र न्यायिक संस्था के रूप में स्थापित किया है। लेकिन राष्ट्रीय न्यायिक प्रणाली के विपरती, इस न्यायालय के पास अपनी पुलिस नहीं है। इस वजह से, कोर्ट को अपने गिरफ्तारी वारंट या समन लागू करने जैसे कार्यों के लिये देशों के सहयोग पर निर्भर रहना पड़ता है। और न ही, कोर्ट के पास ऐसा कोई क्षेत्र है, जहां गवाहों को उनकी सुरक्षा के मद्देनज़र भेजा जा सकता हो। इस वजह से कोर्ट, काफी हद तक, देशों के समर्थन व सहयोग पर ही निर्भर है।
(नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।)
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ये वारंट, इस्राइल में हमास के नेतृत्व में किए गए हमलों और उसके बाद, पिछले सात महीनों से गाजा में इस्राइली सैन्य कार्रवाई से जुड़े मामलों में हैं। इन वॉरंट को आईसीसी न्यायाधीशों द्वारा औपचारिक स्वीकृति दी जा सकती है।
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आईसीसी को उन "लाखों बच्चों, महिलाओं और पुरुषों" को ध्यान में रखकर बनाया गया था, जो "मानवता की अंतरात्मा को झकझोर देने वाले अकल्पनीय अत्याचारों के शिकार हुए थे।" आईसीसी विश्व की पहली स्थायी, संधि-आधारित अदालत है, जिसका दायित्व मानवता के विरुद्ध अपराधों, युद्ध अपराधों, जनसंहार व आक्रामकतापूर्ण अपराधों के दोषियों की जांच करना व उन पर मुकदमा चलाना है।
इस कोर्ट ने पूर्व यूगोस्लाविया के स्रेब्रेनीत्सा समेत अन्य इलाकों में अंजाम दिए गए युद्ध अपराध मामलों में सफलतापूर्वक दोष सिद्ध किए और अंतरराष्ट्रीय न्याय से जुड़े कई अहम मामलों का निपटारा किया है। इनमें, बाल-सैनिकों का इस्तेमाल, सांस्कृतिक विरासत का विध्वंस, यौन हिंसा, या निर्दोष नागरिकों पर हमलों समेत अनेक अन्य मामले हैं। आईसीसी ने विश्व में कुछ सबसे गंभीर हिंसक टकरावों की जांच की है, जिनमें दारफूर, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, गाजा, जॉर्जिया व यूक्रेन समेत अन्य मामले हैं।
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में सार्वजनिक सुनवाई की जाती है, 31 मामलों की प्रक्रिया चल रही है, और इसकी वारंट सूची में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अलावा, लीबिया के कुछ व्यक्ति भी हैं। हालांकि, एक वॉरन्ट को जारी करना और फिर संदिग्धों को पकड़ा जाना चुनौतीपूर्ण है। कोर्ट के पास अपने वारंट पर अमल के लिए पुलिस नहीं है और अक्सर आदेश को लागू करने के लिए उसे सदस्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा दोषी करार दिए गए अधिकांश व्यक्ति अफ्रीकी देशों से हैं।
2) पीड़ितों को शामिल करना
यदि किसी दिन आप आईसीसी में अदालती प्रक्रिया को देखें, तो आपको गवाहों या पीड़ितों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों की आवाज सुनाई देगी। न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए उनकी बात सुना जाना जरूरी है। न्यायालय न केवल सबसे जघन्य अपराधों के लिये जिम्मेदार लोगों को दंडित करने का प्रयास करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि पीड़ितों की आवाज सुनी जाएं। पीड़ित वे व्यक्ति हैं, जिन्हें न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में किसी भी अपराध के परिणामस्वरूप पीड़ा पहुंची हो।
ये पीड़ित, आईसीसी की न्यायिक कार्यवाही के सभी चरणों में भाग लेते हैं। अत्याचार से जुड़े अपराधों में 10 हजार से अधिक पीड़ित, इस न्यायालय की कार्यवाही में भाग ले चुके हैं। आपराधिक न्यायालय, अपने संपर्क व पहुंच कार्यक्रमों के माध्यम से, अपने अधिकार क्षेत्र में अपराधों से प्रभावित समुदायों के साथ सीधे संपर्क बनाए रखता है।
न्यायालय, पीड़ितों एवं गवाहों की सुरक्षा और शारीरिक व मनोवैज्ञानिक अखंडता की रक्षा करने के लिए भी प्रयासरत है। हालांकि पीड़ित व्यक्ति यहां सीधे अपने मामले लेकर नहीं आ सकते हैं, लेकिन वे अभियोजक को जानकारी दे सकते हैं, जो यह तय करते हैं कि कोई मामला जांच के योग्य है या नहीं। वर्तमान में, पीड़ितों के लिए स्थापित ICC ट्रस्ट कोष, न्यायालय द्वारा क्षतिपूर्ति सम्बन्धी पहले आदेशों को वास्तविकता में बदलने में जुटा है। इनमें कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में पीड़ितों व उनके परिवारों के लिए मुआवजे की मांग भी है।
इस कोष ने अपने सहायता कार्यक्रमों के माध्यम से साढ़े चार लाख से अधिक पीड़ितों को शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक-आर्थिक सहायता भी प्रदान की है।
3) निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना
आईसीसी के समक्ष, सन्देह से परे दोष साबित होने तक सभी प्रतिवादियों को निर्दोष माना जाता है। सभी प्रतिवादी सार्वजनिक और निष्पक्ष कार्यवाही के हकदार होते हैं। आईसीसी में, संदिग्धों और अभियुक्तों के पास महत्वपूर्ण अधिकार होते हैं, जिनमें: आरोपों के बारे में जानकारी पाने; अपना बचाव तैयार करने के लिये पर्याप्त समय मिलने; बिना किसी देरी के मुकदमा चलाए जाने; स्वतंत्र रूप से वकील का चुनाव करने; अभियोजक से दोषमुक्ति सम्बन्धी साक्ष्य प्राप्त करना आदि शामिल हैं।
इन अधिकारों में से एक है - उस भाषा में कार्यवाही करने का अधिकार, जो अभियुक्त को पूरी तरह समझ में आती हो। इसके मद्देनजर, अदालत ने 40 से अधिक भाषाओं में विशेष दुभाषियों व अनुवादकों को भर्ती किया है, और कभी-कभी एक ही सुनवाई के दौरान एक साथ चार भाषाओं का इस्तेमाल किया जाता है।
अपने पहले 20 वर्षों में, प्रतिभागियों को अपराध स्थलों से मीलों दूर, नई व्यवस्था, प्रक्रियात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके अलावा, ICC द्वारा अभियोजित अपराध एक विशिष्ट प्रकृति के होते हैं, जिन्हें अक्सर बड़े पैमाने पर अंजाम दिया जाता है। इसके लिए बड़े पैमाने पर साक्ष्यों की जरूरत होती है, और गवाहों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जानी अहम है। अदालती कार्यवाही जटिल है और ऐसे अनेक विषय हैं जिन्हें सुनवाई के दौरान पर्दे के पीछे हल करने की आवश्यकता पड़ती है।
4) राष्ट्रीय अदालतों की पूरक व्यवस्था
यह न्यायालय, राष्ट्रीय न्यायालयों की जगह नहीं लेता. यह केवल न्याय के अंतिम उपाय के रूप में काम करता है। सबसे गंभीर अपराधों को अंजाम देने वालों की जांच करने और उन्हें दंडित करने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी देशों की ही होती है। आईसीसी द्वारा केवल तभी कदम उठाया सकता है, जब किसी देश में न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के तहत जघन्य अपराध हुआ हो, मगर वो कदम उठाने के लिये अनिच्छुक हो या असल में उसका निपटारा करने में असमर्थ हो।
दुनियाभर में गंभीर हिंसा तेजी से बढ़ रही है। न्यायालय के पास सीमित संसाधन हैं और यह एक समय में बहुत कम मामले ही निपटा सकता है। यह न्यायालय, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरणों के साथ मिलकर काम करता है।
5) न्याय के लिये अधिक सहयोग जुटाना
सभी महाद्वीपों के 123 देशों के समर्थन से, आईसीसी ने स्वयं को एक स्थाई व स्वतंत्र न्यायिक संस्था के रूप में स्थापित किया है। लेकिन राष्ट्रीय न्यायिक प्रणाली के विपरती, इस न्यायालय के पास अपनी पुलिस नहीं है। इस वजह से, कोर्ट को अपने गिरफ्तारी वारंट या समन लागू करने जैसे कार्यों के लिये देशों के सहयोग पर निर्भर रहना पड़ता है। और न ही, कोर्ट के पास ऐसा कोई क्षेत्र है, जहां गवाहों को उनकी सुरक्षा के मद्देनज़र भेजा जा सकता हो। इस वजह से कोर्ट, काफी हद तक, देशों के समर्थन व सहयोग पर ही निर्भर है।
(नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।)