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संकेत अच्छे हैं, लेकिन ईरान परमाणु डील को लेकर अनिश्चितता जारी, अमेरिका और ईरान अपने-अपने रुख पर कायम

Fri, 19 Feb 2021 06:27 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ब्रसेल्स Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 19 Feb 2021 06:27 PM IST
सार

जानकारों का कहना है कि बाइडन प्रशासन इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। वह आरंभ से ही ईरान परमाणु डील के खिलाफ रही इस्राइल और अमेरिका में मौजूद इस्राइल समर्थक मजबूत लॉबी की भावनाओं का ख्याल करते हुए आगे बढ़ रहा है...

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Uncertainty over US-Iran nuclear deal continues, US agrees to join multilateral talks with Iran
US Iran Nuclear Deal - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

ईरान के साथ बहुपक्षीय वार्ता में शामिल होने के लिए अमेरिका के राजी हो जाने के बावजूद अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईरान परमाणु डील में अमेरिका की वापसी का रास्ता तैयार हो गया है। हालांकि जो बाइडन ने अमेरिका में पिछले राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ये वादा किया था कि वे अमेरिका को इस समझौते में वापस शामिल करेंगे, लेकिन बाद में खुद उन्होंने इससे जुड़ी उम्मीदों पर पानी डाल दिया।

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बाइडन ने अपने पहले विदेश नीति संबंधी वक्तव्य में कहा कि ईरान जब इस समझौते की शर्तों का पालन शुरू करेगा, उसके बाद ही अमेरिका उस पर प्रतिबंध हटाएगा। जबकि ईरान का कहना है कि इस समझौते से पहले अमेरिका हटा था, इसलिए पहले वह प्रतिबंध हटाए और तब ईरान समझौते की शर्तों का पालन शुरू करेगा।
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फिलहाल अमेरिका ने यूरोपियन यूनियन (ईयू) की तरफ से ईरान के साथ आयोजित बहुपक्षीय वार्ता में शामिल होने पर हामी भर दी है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने गुरुवार को कहा कि अमेरिका ने इस बातचीत में शामिल होने का आमंत्रण स्वीकार कर लिया है। इस वार्ता का लक्ष्य संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) यानी ईरान परमाणु डील को पुनर्जीवित करना है। ये समझौता 2015 में हुआ था।
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इस पर एक तरफ से ईरान और दूसरी तरफ से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांचों स्थायी सदस्य देशों और जर्मनी ने दस्तखत किए थे। समझौते में ईरान ने परमाणु बम ना बनाने का वादा किया था, जबकि पश्चिमी देशों ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाने का फैसला किया था। लेकिन 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया और ईरान पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए।

ईयू की तरफ से आयोजित वार्ता में ईरान शामिल होगा या नहीं, इस बारे में अभी उसने कुछ नहीं कहा है। अमेरिका की तरफ से कहा गया है कि बातचीत में अमेरिकी दल का नेतृत्व रॉब मैले करेंगे। मैले ने 2015 में इस समझौते को अमली जामा पहनाने में अहम भूमिका निभाई थी। नेड प्राइस ने कहा, ‘जब तक हम सामने-सामने बैठ कर बात नहीं करते, तब तक कुछ भी नहीं हो सकता। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि अगर हम आमने-सामने बैठ कर बातचीत करेंगे, तो वार्ता कामयाब ही रहेगी।’

बातचीत की सफलता को लेकर संदेह इसलिए कायम है, क्योंकि हाल में समझौते में शामिल दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ गया है। ईरान ने यूरेनियम का संवर्धन शुरू कर दिया है। साथ ही उसने धमकी दी है कि वह अगले हफ्ते वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के निरीक्षकों को अपने देश से निकाल देगा। इसे देखते हुए गुरुवार को अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने एक साझा बयान जारी कर ईरान से कहा कि वह समझौते की शर्तों का पालन करे, आईएईए के निरीक्षकों को अपने देश से निकालने से बाज आए और कूटनीति के रास्ते पर लौटे।

ये बयान जारी होने के कुछ ही देर बाद ईयू के राजनीतिक निदेशक और मुख्य वार्ताकार एनरिक मोरा ने प्रस्तावित वार्ता के लिए आमंत्रण को ट्विट किया। उन्होंने कहा- ‘ईरान परमाणु डील एक संकटपूर्ण मोड़ पर है। इस समय अमेरिका और समझौते में शामिल सभी देशों के बीच गहन वार्ता की जरूरत है। मैं इसके लिए एक अनौपचारिक वार्ता के लिए सबको आमंत्रित करने को तैयार हूं।’ इसके कुछ घंटों के बाद नेड प्राइस ने बयान जारी कर आमंत्रण स्वीकार करने की बात कही।

इस बीच संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी मिशन ने पिछले सितंबर में ट्रंप प्रशासन की तरफ से किए गए एक दावे से खुद को अलग कर लिया है। तब ट्रंप प्रशासन ने दावा किया था कि ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध फिर से लागू कर दिए गए हैं। उस दावे की तब लगभग हर देश ने अनदेखी की थी। साथ ही, बाइडन प्रशासन ने न्यूयॉर्क में ईरान के राजनयिकों पर ट्रंप प्रशासन के समय लगाए गए खास प्रतिबंधों को हटा लिया है। इन सबको ईरान की तरफ से सकारात्मक संकेत माना गया है।


लेकिन जानकारों का कहना है कि बाइडन प्रशासन इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। वह इस्राइल और अमेरिका में मौजूद इस्राइल समर्थक मजबूत लॉबी की भावनाओं का ख्याल करते हुए आगे बढ़ रहा है। ये लॉबी आरंभ से ही ईरान परमाणु डील के खिलाफ रही है। इन सब कारणों से इस मामले में इतने अगर-मगर हैं कि अभी कोई समझौते के पुनर्जीवित हो जाने को लेकर आश्वस्त नहीं है।

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