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UN: 'मैंने जीने की इच्छा छोड़ दी थी', यूक्रेनी युद्धबंदी ने यूएन के जांच रूसी जेल में यातनाओं के भयावह दास्तां
Sat, 16 Mar 2024 12:54 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
यूएन हिंदी समाचार
यूएन हिंदी समाचार
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 16 Mar 2024 12:54 PM IST
सार
संयुक्त राष्ट्र द्वारा नियुक्त स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों की एक नई रिपोर्ट में रूसी सैन्य बलों द्वारा यूक्रेन में आम नागरिकों और बंदी बनाए गए सैनिकों के साथ भयावह दुर्व्यवहार और संभावित युद्ध अपराधों को अंजाम दिए जाने के तथ्य सामने आए है।
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रूस-यूक्रेन युद्ध से तबाह हुई इमारत।
- फोटो : EU/Oleksandr Rakushnyak
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विस्तार
यूक्रेन पर स्वतंत्र, अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग ने अपनी पड़ताल के बाद शुक्रवार को यह रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इसमें व्यापक स्तर पर और व्यवस्थागत ढंग से इन अधिकार हनन मामलों में जानकारी जुटाई गई है। मानवाधिकार परिषद ने दो वर्ष पहले इस आयोग की नियुक्ति की थी, ताकि 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन पर रूसी आक्रमण से हुए गंभीर असर का आकलन किया जा सके।
यूक्रेन के एक सैनिक और पूर्व युद्धबंदी ने जांच आयोग को बताया कि उन्होंने हर उम्मीद और जीवन जीने की इच्छा खो दी थी, उन्हें बार-बार यातना दी गई, हड्डियां और दांत तोड़ दिए गए और एक ज़ख्मी पांव में गैंगरीन हो गया। जांच आयोग प्रमुख ऐरिक मोसे ने कहा कि इस युद्धबंदी को मॉस्को के दक्षिण में स्थित तुला क्षेत्र के दोन्सकोय शहर की जेल में रखा गया था, जहां उन्होंने अपनी जान लेने की कोशिश भी की। मगर, इसके बाद उन्हें बन्दी बनाने वाले लोगों ने फिर से पीटा।
भुक्तभोगियों ने जांच आयोग को बताया कि उनकी निरंतर, बर्बर ढंग से पिटाई की गई, लंबे समय तक हिरासत में रखा गया और उनकी मानवीय गरिमा का कोई ख़याल नहीं रखा गया। जांच आयोग ने शुक्रवार को जेनेवा में पत्रकारों को बताया कि इस बर्ताव से बंदियों को शारीरिक और मानसिक सदमा पहुंचा है, जो लंबे समय तक जारी रह सकता है।
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जांचकर्ताओं ने बताया कि युद्धबंदियों के कूल्हों व पीछे के हिस्से पर बिना रुके पिटाई की गई। फिर उनके चेहरे और जख्मी पांव पर पिटाई की गई और कुछ दांत निकाल लिए गए। ऐसी हालत में युद्धबंदियों ने उनसे जान से मार देने की गुहार लगाई।
बलात्कार, पिटाई, यातना
जाँच आयुक्तों के अनुसार, महिलाओं के साथ बलात्कार और अन्य प्रकार के यौन हमले किए जाने के मामलों में गवाही भी यातना की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। पुरुष युद्धबंदियों को भी बलात्कार की धमकियां दी गईं। उन्हें चोट पहुंचाने के इरादे से बिजली के झटके दिए गए। जांच आयोग प्रमुख ऐरिक मोसे ने बताया कि युद्धबंदियों की पिटाई, उनके साथ गाली-गलौज की गई, बिजली के उपकरणों का उनके शरीर पर इस्तेमाल किया गया और सीमित मात्रा में खाने-पीने का सामान दिया गया।
आयोग का कहना है कि युद्धबंदियों के साथ हुए बर्ताव और महीनों तक ऐसे मामलों के जारी रहने से जो तस्वीर उभरी है, उसकी वजह से रिपोर्ट में भयावह शब्द का इस्तेमाल किया गया है।
आयोग की रिपोर्ट
स्वतंत्र जांच की 20 पन्नों की यह रिपोर्ट सैकड़ों व्यक्तियों की गवाही और अनुभवों को सुने जाने के बाद तैयार की गई है, ताकि रूसी सैन्य बलों द्वारा मानवाधिकार हनन व दुर्व्यवहार, और अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी कानूनों के उल्लंघन मामलों को अंजाम दिए जाने के आरोपों की जांच की जा सके।
इस रिपोर्ट में मारियुपोल शहर की घेराबंदी और अंधाधुंध बमबारी, आम नागरिकों व युद्धबंदियों को यातना दिए जाने, उनके साथ बलात्कार करने, अक्तूबर 2022 में खेरसॉन में एक देखभाल केंद्र से 46 बच्चों को अवैध ढंग से रूसी कब्जे वाले क्रीमिया हस्तांतरित किए जाने, और संरक्षित सांस्कृतिक धरोहरों के विध्वंस पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है।
जाच आयुक्त वृंदा ग्रोवर के मुताबिक, रूसी प्रशासन द्वारा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी कानून और इससे जुड़े युद्ध अपराध मामलों को अंजाम दिए जाने के साक्ष्य मिले हैं। उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में अभी जांच किए जाने की जरूरत है, ताकि यह तय किया जा सके कि ऐसी घटनाओं को मानवता के विरुद्ध अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है या नहीं।
मारियुपोल, ‘मौत की ओर रास्ता’
रिपोर्ट बताती है कि दक्षिणी यूक्रेन में स्थित मारियुपोल शहर की घेरेबंदी के दौरान वहां के निवासियों को किन कठिन हालात से गुजरना पड़ा। किसी सुरक्षित स्थान पर कई दिनों तक शरण लेने के बाद बाहर निकले लोगों ने देखा कि सड़कों पर चारों ओर शव बिखरे हुए थे, घर, अस्पताल और पूरा शहर ही मलबे में तब्दील हो गया था।
जांचकर्ताओं ने कहा कि यहां 11 बिजली स्टेशन के साथ-साथ 58 चिकित्सा केन्द्र ध्वस्त हो गए। कई महिलाओं ने अपनी जान बचाने के लिए लड़ाई के अग्रिम मोर्चे से भागकर अपनी जान बचाई और कहा कि वो एक मौत की ओर ले जाने सड़क बन गई थी। मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा कि रूसी सैन्य बलों ने हमलों के दौरान नागरिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के प्रति पूर्ण रूप से ध्यान नहीं दिया।
जनसंहार की मंशा पर चिंता
जांच आयुक्त वृंदा ग्रोवर ने आक्रमणकारी सैन्य बलों में जनसंहार की मंशा होने के आरोपों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि रूसी मीडिया द्वारा प्रत्यक्ष व सार्वजनिक रूप से जनसंहार के लिए उकसाने की आशंका की अभी और पड़ताल की जानी होगी।
उनके अनुसार, ऐसे कई वक्तव्यों को परखा गया है, जिनमें से अनेक बयानों में अमानवीयकरण करने वाली और नफ़रत, हिंसा व विध्वंस की पुकार लगाने वाली भाषा का इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने कहा, “हम यूक्रेन में रूस द्वारा पूर्ण स्तर पर किए आक्रमण का समर्थन करने वाले वक्तव्यों पर चिंतित हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों को जान से मारने की बात कही गई है।” जांच आयोग की यह रिपोर्ट 19 मार्च को मानवाधिकार परिषद में सौंपी जाएगी।
(नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।)
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यूक्रेन के एक सैनिक और पूर्व युद्धबंदी ने जांच आयोग को बताया कि उन्होंने हर उम्मीद और जीवन जीने की इच्छा खो दी थी, उन्हें बार-बार यातना दी गई, हड्डियां और दांत तोड़ दिए गए और एक ज़ख्मी पांव में गैंगरीन हो गया। जांच आयोग प्रमुख ऐरिक मोसे ने कहा कि इस युद्धबंदी को मॉस्को के दक्षिण में स्थित तुला क्षेत्र के दोन्सकोय शहर की जेल में रखा गया था, जहां उन्होंने अपनी जान लेने की कोशिश भी की। मगर, इसके बाद उन्हें बन्दी बनाने वाले लोगों ने फिर से पीटा।
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भुक्तभोगियों ने जांच आयोग को बताया कि उनकी निरंतर, बर्बर ढंग से पिटाई की गई, लंबे समय तक हिरासत में रखा गया और उनकी मानवीय गरिमा का कोई ख़याल नहीं रखा गया। जांच आयोग ने शुक्रवार को जेनेवा में पत्रकारों को बताया कि इस बर्ताव से बंदियों को शारीरिक और मानसिक सदमा पहुंचा है, जो लंबे समय तक जारी रह सकता है।
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जांचकर्ताओं ने बताया कि युद्धबंदियों के कूल्हों व पीछे के हिस्से पर बिना रुके पिटाई की गई। फिर उनके चेहरे और जख्मी पांव पर पिटाई की गई और कुछ दांत निकाल लिए गए। ऐसी हालत में युद्धबंदियों ने उनसे जान से मार देने की गुहार लगाई।
बलात्कार, पिटाई, यातना
जाँच आयुक्तों के अनुसार, महिलाओं के साथ बलात्कार और अन्य प्रकार के यौन हमले किए जाने के मामलों में गवाही भी यातना की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। पुरुष युद्धबंदियों को भी बलात्कार की धमकियां दी गईं। उन्हें चोट पहुंचाने के इरादे से बिजली के झटके दिए गए। जांच आयोग प्रमुख ऐरिक मोसे ने बताया कि युद्धबंदियों की पिटाई, उनके साथ गाली-गलौज की गई, बिजली के उपकरणों का उनके शरीर पर इस्तेमाल किया गया और सीमित मात्रा में खाने-पीने का सामान दिया गया।
आयोग का कहना है कि युद्धबंदियों के साथ हुए बर्ताव और महीनों तक ऐसे मामलों के जारी रहने से जो तस्वीर उभरी है, उसकी वजह से रिपोर्ट में भयावह शब्द का इस्तेमाल किया गया है।
आयोग की रिपोर्ट
स्वतंत्र जांच की 20 पन्नों की यह रिपोर्ट सैकड़ों व्यक्तियों की गवाही और अनुभवों को सुने जाने के बाद तैयार की गई है, ताकि रूसी सैन्य बलों द्वारा मानवाधिकार हनन व दुर्व्यवहार, और अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी कानूनों के उल्लंघन मामलों को अंजाम दिए जाने के आरोपों की जांच की जा सके।
इस रिपोर्ट में मारियुपोल शहर की घेराबंदी और अंधाधुंध बमबारी, आम नागरिकों व युद्धबंदियों को यातना दिए जाने, उनके साथ बलात्कार करने, अक्तूबर 2022 में खेरसॉन में एक देखभाल केंद्र से 46 बच्चों को अवैध ढंग से रूसी कब्जे वाले क्रीमिया हस्तांतरित किए जाने, और संरक्षित सांस्कृतिक धरोहरों के विध्वंस पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है।
जाच आयुक्त वृंदा ग्रोवर के मुताबिक, रूसी प्रशासन द्वारा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी कानून और इससे जुड़े युद्ध अपराध मामलों को अंजाम दिए जाने के साक्ष्य मिले हैं। उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में अभी जांच किए जाने की जरूरत है, ताकि यह तय किया जा सके कि ऐसी घटनाओं को मानवता के विरुद्ध अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है या नहीं।
मारियुपोल, ‘मौत की ओर रास्ता’
रिपोर्ट बताती है कि दक्षिणी यूक्रेन में स्थित मारियुपोल शहर की घेरेबंदी के दौरान वहां के निवासियों को किन कठिन हालात से गुजरना पड़ा। किसी सुरक्षित स्थान पर कई दिनों तक शरण लेने के बाद बाहर निकले लोगों ने देखा कि सड़कों पर चारों ओर शव बिखरे हुए थे, घर, अस्पताल और पूरा शहर ही मलबे में तब्दील हो गया था।
जांचकर्ताओं ने कहा कि यहां 11 बिजली स्टेशन के साथ-साथ 58 चिकित्सा केन्द्र ध्वस्त हो गए। कई महिलाओं ने अपनी जान बचाने के लिए लड़ाई के अग्रिम मोर्चे से भागकर अपनी जान बचाई और कहा कि वो एक मौत की ओर ले जाने सड़क बन गई थी। मानवाधिकार विशेषज्ञों ने कहा कि रूसी सैन्य बलों ने हमलों के दौरान नागरिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के प्रति पूर्ण रूप से ध्यान नहीं दिया।
जनसंहार की मंशा पर चिंता
जांच आयुक्त वृंदा ग्रोवर ने आक्रमणकारी सैन्य बलों में जनसंहार की मंशा होने के आरोपों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि रूसी मीडिया द्वारा प्रत्यक्ष व सार्वजनिक रूप से जनसंहार के लिए उकसाने की आशंका की अभी और पड़ताल की जानी होगी।
उनके अनुसार, ऐसे कई वक्तव्यों को परखा गया है, जिनमें से अनेक बयानों में अमानवीयकरण करने वाली और नफ़रत, हिंसा व विध्वंस की पुकार लगाने वाली भाषा का इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने कहा, “हम यूक्रेन में रूस द्वारा पूर्ण स्तर पर किए आक्रमण का समर्थन करने वाले वक्तव्यों पर चिंतित हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों को जान से मारने की बात कही गई है।” जांच आयोग की यह रिपोर्ट 19 मार्च को मानवाधिकार परिषद में सौंपी जाएगी।
(नोट: यह लेख संयुक्त राष्ट्र हिंदी समाचार सेवा से लिया गया है।)