इस्राइली बस्तियां अंतरराष्ट्रीय कानून का घोर उल्लंघन हैं : यूएन दूत
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किसी देश का अपनी राष्ट्रीय नीति के तहत कुछ भी कहना हो, इस्राइल द्वारा कब्जा किए हुए फलस्तीनी क्षेत्रों में इस्राइली बस्तियां बसाया जाना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत घोर उल्लंघन है। मध्य पूर्व शांति प्रक्रिया के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष संयोजक निकोलय म्लदेनॉफ ने बुधवार को सुरक्षा परिषद में ये बात कही।
उन्होंने अमरीका के राष्ट्रपति द्वारा सोमवार को की गई इस घोषणा पर अफसोस जताया जिसमें कहा गया था कि अमेरिका फलस्तीनी क्षेत्रों में इस्राइली बस्तियों को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ नहीं समझता।
निकोलय म्लदेनॉफ ने 15 सदस्यों वाली सुरक्षा परिषद को संबोधित करते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र का रुख पहले जैसा ही है। मध्य पूर्व शांति प्रक्रिया के लिए संयुक्त राष्ट्र के दूत ने इस्राइली बस्तियों को दो राष्ट्रों के रूप में समाधान निकालने के प्रयासों में और न्यायपूर्ण, दीर्घकालीन व संपूर्ण शांति के रास्ते में एक मुख्य बाधा करार दिया है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि एकतरफा कार्रवाई से गुस्से और निराशा को बढ़ावा मिलता है और ये स्थिति एक टिकाऊ फलस्तीनी राष्ट्र की स्थापना की ऐसी संभावनाओं को धूमिल करती है, जहां येरूशलम दोनों देशों - इस्राइल और फलस्तीन की राजधानी हो।
गाजा की विस्फोटक स्थिति
विशेष समन्वयक ने चैम्बर के भीतर राजदूतों को जानकारी देते हुए कहा कि इस्राइल और गाजा के भीतर सक्रिय फलस्तीनी चरमपंथियों के बीच हाल ही में भड़के गंभीर तनाव के कुछ ही दिनों के भीतर सुरक्षा परिषद को ये बैठक बुलानी पड़ी है। उन्होंने ये माना कि तात्कालिक संकट तो टल गया है मगर वहां स्थिति अब भी बहुत विस्फोटक बनी हुई है।
निकोलय म्लदेनॉफ ने चरमपंथियों की गतिविधियों, रॉकेट फायर और इस्राइल द्वारा बदले में हवाई हमलों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जिस संकट की वजह से दोनों तरफ लोग हताहत हुए हैं।
इस्राइल और फलस्तीनी चरमपंथियों के बीच युद्धविराम कराने के संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों में मिस्र की भूमिका का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 48 घंटों की युद्धक गतिविधियों के भीतर ही कुछ शांति स्थापित हो गई थी।
लेकिन उनका ये भी कहना था कि अगर बीच-बचाव के ये प्रयास नाकाम हो गए होते तो हम एक और युद्ध देख रहे होते जो कि 2014 के भीषण तबाही वाले युद्ध से भी भयावह हो सकता था।
उन्होंने ध्यान दिलाया कि खतरा अभी टला नहीं है और आगाह करते हुए कहा कि आम आबादी के खिलाफ अंधाधुंध रॉकेट व मोर्टार हमले किए जाना किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं हो सकता और ये हमले तुरंत रुकने चाहिए।
हताश स्थिति
अन्य खतरों का जिक्र करते हुए उन्होंने इस्राइल द्वारा गाजा की सीमा की नाकेबंदी और गाजा में विभिन्न फलस्तीनी गुटों के बीच जारी मतभेदों की स्थिति भी हालात की गंभीरता की आग में घी का काम कर रही है।
उनका कहना था संयुक्त राष्ट्र ने पिछले करीब डेढ़ वर्ष के दौरान तनाव को दूर करने और भड़काव को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं लेकिन वित्तीय संसाधनों की किल्लत,फलस्तीनी नेताओं की प्रतिबद्धताओं और इस्राइल द्वारा उठाए जा रहे कदमों की वजह से वो कदम काफी साबित नहीं हुए हैं।
उन्होंने दलील देते हुए कहा कि दीर्घकालीन समाधान राजनैतिक ही हो सकता है और इस्राइल नाकेबंदी की ऐसी नीतियाँ जारी नहीं रख सकता जिससे विकास का गला घुटता है, दूसरी तरफ फलस्तीनी नेता भी अपनी आंतरिक राजनैतिक मतभेदों की स्थिति के खतरनाक नतीजों को नजरअंदाज करना जारी नहीं रख सकते।
विशेष दूत ने सुरक्षा परिषद को याद दिलाते हुए कहा कि उसका अंतिम लक्ष्य "फलस्तीनियों को कब्जे से मुक्त माहौल में प्रगति करने, और इस्राइल को भी सुरक्षा के माहौल में रहने का माहौल तैयार करने में मदद करना है, ऐसा माहौल जहां आतंक व रॉकेट हमलों का डर ना हो।
महिलाओं पर सबसे ज्यादा असर
एक इस्राइली मानवाधिकार संगठन गिशा की डायरेक्टर तानया हैरी ने स्थिति का विश्लेषण करने वाली एक रिपोर्ट सुरक्षा परिषद के सदस्यों को सौंपी। इसमें गाजा पर लगी पाबंदियों के मौहाल में जिंदगी जीने में होने वाली कठिनाइयों का विस्तृत खाका पेश किया गया है।
तानया हैरी का कहना था कि महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हैं साथ ही उन्होंने अपील किया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ये जिम्मेदारी बनती है कि गाजा में सभी लोगों को सभी सुविधाएँ आसानी से मिलें, सामान पर लगी पाबंदियां हटाई जाएं और मौजूदा समीकरणों को पलटकर शांति का रास्ता निकाला जाए।