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UNSC: महासचिव गुटेरेस ने भी सुरक्षा परिषद पर उठाए सवाल, बोले- ये आज भी 1945 के समय में फंसी है
Sun, 15 Mar 2026 11:59 AM IST
अमन तिवारी
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बेरूत
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बेरूत
Published by: अमन तिवारी
Updated Sun, 15 Mar 2026 11:59 AM IST
सार
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली की आलोचना करते हुए कहा कि इसका ढांचा अब भी 1945 की दुनिया को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि वीटो पावर के कारण कई अहम फैसले रुक जाते हैं और अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों का स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं है।
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एंटोनियो गुटेरेस, महासचिव, संयुक्त राष्ट्र
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हमें यह मानना होगा कि सुरक्षा परिषद के साथ एक बड़ी समस्या है। उनके अनुसार, आज की सुरक्षा परिषद दुनिया के मौजूदा हालात को नहीं दर्शाती। यह आज भी 1945 के समय की दुनिया का प्रतिनिधित्व कर रही है जब इसे बनाया गया था।
क्या बोले यूएन महासचिव?
बेरूत में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गुटेरेस ने बताया कि 15 देशों वाली इस परिषद में पांच स्थायी सदस्य हैं। इनमें से तीन देश यूरोप से हैं, एक एशिया से है और एक अमेरिका है। हैरानी की बात यह है कि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे बड़े क्षेत्रों का कोई भी देश इसका स्थायी सदस्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि एशिया की आबादी और दौलत दुनिया में बहुत ज्यादा है, फिर भी यहां से सिर्फ चीन ही स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल है।
काम के तरीके पर उठाए सवाल
गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद की काम के तरीके पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 'वीटो' पावर की वजह से परिषद सही समय पर जरूरी फैसले नहीं ले पाती। जब भी किसी युद्ध को रोकने की जरूरत होती है, कोई न कोई स्थायी सदस्य वीटो का इस्तेमाल कर देता है। इससे शांति की कोशिशें बीच में ही रुक जाती हैं। गुटेरेस को फिलहाल ऐसी उम्मीद नहीं है कि आने वाले कम समय में इन हालातों में कोई बदलाव होगा।
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ये भी पढ़ें: West Asia: 'यूएस को पश्चिम एशिया छोड़ देना चाहिए', खाड़ी में बढ़ते तनाव के बीच ईरानी राष्ट्रपति का बड़ा बयान
सुरक्षा परिषद के ढांचे की बात करें तो चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका के पास वीटो की ताकत है। बाकी 10 अस्थाई सदस्यों को दो साल के लिए चुना जाता है, लेकिन उनके पास वीटो का अधिकार नहीं होता।
भारत कर रहा स्थायी सदस्यता की मांग
भारत पिछले कई दशकों से सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग कर रहा है। भारत का कहना है कि 1945 में बनी यह व्यवस्था 21वीं सदी की जमीनी हकीकत और राजनीति से मेल नहीं खाती। भारत ने कई बार जोर दिया है कि वह सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का पूरा हकदार है। भारत आखिरी बार 2021-22 में अस्थाई सदस्य के तौर पर परिषद का हिस्सा था।
आज की सुरक्षा परिषद दुनिया में शांति बनाए रखने में नाकाम साबित हो रही है। यूक्रेन युद्ध, इस्राइल-हमास संघर्ष और ईरान के खिलाफ चल रहे तनाव जैसे बड़े मुद्दों पर परिषद के सदस्य आपस में बुरी तरह बंटे हुए हैं।
अन्य वीडियो-
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क्या बोले यूएन महासचिव?
बेरूत में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गुटेरेस ने बताया कि 15 देशों वाली इस परिषद में पांच स्थायी सदस्य हैं। इनमें से तीन देश यूरोप से हैं, एक एशिया से है और एक अमेरिका है। हैरानी की बात यह है कि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे बड़े क्षेत्रों का कोई भी देश इसका स्थायी सदस्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि एशिया की आबादी और दौलत दुनिया में बहुत ज्यादा है, फिर भी यहां से सिर्फ चीन ही स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल है।
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काम के तरीके पर उठाए सवाल
गुटेरेस ने सुरक्षा परिषद की काम के तरीके पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 'वीटो' पावर की वजह से परिषद सही समय पर जरूरी फैसले नहीं ले पाती। जब भी किसी युद्ध को रोकने की जरूरत होती है, कोई न कोई स्थायी सदस्य वीटो का इस्तेमाल कर देता है। इससे शांति की कोशिशें बीच में ही रुक जाती हैं। गुटेरेस को फिलहाल ऐसी उम्मीद नहीं है कि आने वाले कम समय में इन हालातों में कोई बदलाव होगा।
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सुरक्षा परिषद के ढांचे की बात करें तो चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका के पास वीटो की ताकत है। बाकी 10 अस्थाई सदस्यों को दो साल के लिए चुना जाता है, लेकिन उनके पास वीटो का अधिकार नहीं होता।
भारत कर रहा स्थायी सदस्यता की मांग
भारत पिछले कई दशकों से सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग कर रहा है। भारत का कहना है कि 1945 में बनी यह व्यवस्था 21वीं सदी की जमीनी हकीकत और राजनीति से मेल नहीं खाती। भारत ने कई बार जोर दिया है कि वह सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का पूरा हकदार है। भारत आखिरी बार 2021-22 में अस्थाई सदस्य के तौर पर परिषद का हिस्सा था।
आज की सुरक्षा परिषद दुनिया में शांति बनाए रखने में नाकाम साबित हो रही है। यूक्रेन युद्ध, इस्राइल-हमास संघर्ष और ईरान के खिलाफ चल रहे तनाव जैसे बड़े मुद्दों पर परिषद के सदस्य आपस में बुरी तरह बंटे हुए हैं।
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