तुर्की के राष्ट्रपति की एक कविता क्यों चुभ गई ईरान के दिल में?
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तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन ने अपनी अजरबैजान यात्रा के दौरान एक कविता पढ़ी। इस पर ईरान में राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया। तब से ये कविता पूरे पश्चिम एशिया में बेहद चर्चित बनी हुई है।
एर्दोगन पिछले हफ्ते अजरबैजान की राजधानी बाकू की यात्रा पर गए। वहां उन्होंने आर्मेनिया पर अजरबैजान की सैनिक जीत का उत्सव मनाने के लिए हुई सैनिक परेड की सलामी ली। नागोरनो- काराबाख इलाके पर कब्जे को लेकर अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच हुए युद्ध में तुर्की ने अजरबैजान को सैनिक मदद दी थी। एर्दोगन को अपने उत्सव में बुलाकर आर्मेनिया ने उनकी मदद के लिए आभार जताया।
ये युद्ध 44 दिन चला, जो ईरान के लिए परेशानी की वजह बना हुआ था। आर्मेनिया और अजरबैजान दोनों की सीमा ईरान से मिलती है। इसके अलावा अजरबैजानी मूल के लाखों लोग और आर्मेनियाई मूल के हजारों लोग ईरान में रहते हैं। एर्दोगन ने जो कविता पढ़ी, उसमें इस पर दुख जताया गया कि अजरबैजान और ईरान के बीच बहने वाली अरस नदी ने कैसे अजरबैजानी लोगों को अलग कर रखा है। एर्दोगन की कविता का अर्थ यह निकाला गया कि तुर्की के राष्ट्रपति सभी तुर्कों के एकीकरण की बात कर रहे हैं। इनमें ऐसे इलाके भी हैं, जो ईरान में पड़ते हैं।
कविता में कहा गया- ‘
उन्होंने चट्टानों से भरी अरस नदी से हमें अलग कर रखा है। लेकिन मैं आपसे अलग नहीं हूं। उन्होंने हमें जबरन अलग किया है।’
यही बात ईरान के लोगों को चुभ गई। उन्होंने इस कविता का यह अर्थ समझा कि तुर्की के राष्ट्रपति ईरान के इलाके को अपने देश में मिलाने की बात कर रहे हैं। जानकारों ने कहा है कि एक कविता इतना बड़ा सियासी मुद्दा क्यों बन गई, इसे समझने के लिए इस क्षेत्र के इतिहास पर नजर डालना होगी।
तकरीबन 200 साल पहले रूस-फारस युद्ध की समाप्ति पर एक संधि हुई थी। उस पर फारस (आज के ईरान) के कजर वंश के राजा ने दस्तखत किए थे। इस वंश का 1925 तक शासन रहा। रूस-फारस संधि को आज तक ईरान में अपमान के अध्याय के रूप में याद किया जाता है। उस संधि के तहत फारस के एक बड़े इलाके पर रूस का कब्जा हो गया था। उसी के तहत अरस नदी को दोनों देशों के बीच की सीमा तय किया गया। तब रूस ने जिस जमीन पर कब्जा किया, वो अब अजरबैजान और आर्मेनिया के कब्जे में है। उसका कुछ हिस्सा तुर्की में भी है। जानकारों के मुताबिक अजरबैजानी लोग भले नदी के दोनों तरफ बसे हों, लेकिन वे आपस में जुड़ाव महसूस करते हैं। इसीलिए इलाके के बारे में एर्दोगन का कविता पढ़ना ईरान को नागवार गुजरा।
ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जावेद जरीफ ने कहा कि कोई भी हमारे प्यारे अजरबैजान की बात नहीं कर सकता। उन्होंने एक ट्वीट में कहा कि क्या एर्दोगन को इस बात का अहसास नहीं था कि वे अजबैजान की संप्रभुता की अनदेखी कर रहे हैं। ईरान के विदेश मंत्रालय ने तेहरान स्थित तुर्की के राजदूत को बुला कर एर्दोगन की टिप्पणी पर सफाई मांगी है। उधर अंकारा स्थित ईरान के राजदूत को तुर्की सरकार ने बुलाया और ईरान के बयानों पर विरोध जताया। लेकिन बीते शनिवार को जब जरीफ ने तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुत कावुसोगलू को फोन किया, तो उन्होंने सफाई दी कि तुर्की के राष्ट्रपति ईरान की संवेदनाओं से वाकिफ नहीं थे। लेकिन तुर्की ने ईरान में तुर्की के राष्ट्रपति के बारे जैसी आक्रामक भाषा बोली गई है, उस पर कड़ा विरोध जताया है।
ईरान की संसद में कई सदस्यों ने एर्दोगन से माफी मांगने की मांग की है। ईरानी संसद के उप सभापति अली निकजाद ने कहा कि एर्दोगन या तो इतिहास नहीं जानते या फिर उन्होंने जानबूझ कर उसे तोड़ा-मरोड़ा है। रविवार को ईरानी संसद के 290 में से 225 सदस्यों ने एक बयान जारी कर तुर्की के नेता की टिप्पणी की कड़ी निंदा की।
तुर्की और ईरान में पहले से ही तनावपूर्ण संबंध हैं। तुर्की सुन्नी देशों का नेता बनने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान खुद को शिया देशों का नेता समझता है। इस टकराव ने अजरबैजान के मामले को लेकर नया रूप ले लिया है। इससे इस क्षेत्र की कूटनीति गरमा गई है।