गंभीर हुई चौथी लहर: यूरोप में कोविड की नई लहर से वैक्सीन के असर पर छिड़ी बहस
आयरलैंड में डब्लिन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसीन एंड हेल्थ साइसेंज से जुड़े विशेषज्ञ सैम मैकॉनकी के मुताबिक कोरोना वायरस के नए वैरिएंट पुराने स्ट्रेन की तुलना में अधिक संक्रामक हैं। इस बार की लहर में यह देखने को मिल रहा है कि जिन युवा लोगों का टीकाकरण नहीं हुआ है या जो लोग अति वृद्ध हैं, वे ही ज्यादातर संक्रमण का शिकार हो रहे हैं...
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पश्चिमी यूरोप में कोरोना महामारी की चौथी लहर ने गंभीर रूप ले लिया है। अभी कुछ समय पहले तक यूरोप में रूझान कोविड-19 संबंधी प्रतिबंधों को हटाने और आम जिंदगी शुरू करने का था। लेकिन अब एक के बाद दूसरे देश से फिर से प्रतिबंध लागू किए जाने की खबर आ रही है। पूरे यूरोप में टीकाकरण की सबसे ऊंची दर आयरलैंड में है। वहां 12 साल से अधिक उम्र के 89 फीसदी लोगों को वैक्सीन लग चुका है। उधर पुर्तगाल भी अपनी 87 फीसदी जनता का पूरा टीकाकरण करने में सफल रहा है। लेकिन अब इन दोनों देशों में भी संक्रमण बढ़ने के साथ नए प्रतिबंध लागू किए गए हैं।
डेल्टा से एहतियाती जरूरी
विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि नई हालत ने वैक्सीन विरोधी समूहों की ताकत बढ़ सकती है। जबकि ये विशेषज्ञ दावा करते हैं कि वैक्सीन कारगर है। लंदन स्थित इंपेरियल कॉलेज में संक्रामक रोगों के प्रोफेसर चार्ल्स बैंगहम ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘वैक्सीन से बेहतर सुरक्षा मिल रही है। इससे बीमारी गंभीर रूप नहीं लेती और मृत्यु के मामले कम रहते हैं। यह हम जानते हैं कि कोरोना वायरस का डेल्टा वैरिएंट बेहद संक्रामक है। इसलिए हमें एहतियाती उपायों का सख्ती से पालन करना होगा।’
लेकिन इससे यह साफ है कि वैक्सीन संक्रमण से बचाव करने में पूरी तरह सक्षम नहीं है। जर्मनी की हैम्बर्ग यूनिवर्सटी में पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर राल्फ रीन्टजेस के मुताबिक वैक्सीन से मदद मिलती है। यह वायरस को रोकने की एक दीवार है। लेकिन एक उपाय के तौर पर यह अकेले इतना सक्षम नहीं है कि पूरा बचाव दे सके।
नए वैरिएंट पुराने स्ट्रेन से ज्यादा संक्रामक
दूसरे देशों के डॉक्टरों की भी राय है कि कोविड-19 वायरस के खिलाफ लड़ाई में वैक्सीन सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय है। आयरलैंड में डब्लिन स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसीन एंड हेल्थ साइसेंज से जुड़े विशेषज्ञ सैम मैकॉनकी के मुताबिक कोरोना वायरस के नए वैरिएंट पुराने स्ट्रेन की तुलना में अधिक संक्रामक हैं। इसके बावजूद इनकी वजह से वैक्सीन लगवा चुके लोगों के गंभीर रूप से बीमार पड़ने के मामले बहुत कम हुए हैं। इस बार की लहर में यह देखने को मिल रहा है कि जिन युवा लोगों का टीकाकरण नहीं हुआ है या जो लोग अति वृद्ध हैं, वे ही ज्यादातर संक्रमण का शिकार हो रहे हैं।
यूरोप में 2021 के शुरुआती महीनों में तेज गति से टीकाकरण हुआ। अब वहां यह सामने आ रहा है कि जैसा पहले समझा गया था उसकी तुलना में कोविड-19 वैक्सीन का प्रभाव तेजी से घटने लगता है। पिछले महीने इस बारे में दो अध्ययन रिपोर्टें जारी हुई थीं। उन दोनों में बताया गया कि फाइजर वैक्सीन की दोनों डोज लेने के दो महीने बाद ही उसका असर घटने लगता है। कमोबेश ऐसा ही एस्ट्राजेनिका और मॉर्डेना वैक्सीन के बारे में देखा गया है।
बर्लिन स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ में प्रोफेसर तोबियास कुर्थ ने सीएनएन से कहा- ‘एक निश्चित समय के बाद वैक्सीन का असर घटने लगता है। कुछ उम्र वर्ग के लोगों और जन समूहों में ऐसा अधिक तेजी से हुआ है।’