अफगानिस्तान: अब एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए हैं तालिबान और आईएसआईएस-के
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अब तालिबान और आईएसआईएस-के में खुल कर लड़ाई छिड़ गई है। उनके मुताबिक आईएसआईएस-के तालिबान सरकार को अस्थिर करना चाहता है। उसने अपने साप्ताहिक पत्र अल-नबा में कहा है कि तालिबान वास्तविक जिहाद में शामिल नहीं है...
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अफगानिस्तान पर अपनी पकड़ को मजबूत बनाने में जुटे तालिबान को आतंकवादी संगठन आईएसआईएस-के को कड़ी चुनौती मिल रही है। खबरों के मुताबिक आईएसआईएस-के अफगानिस्तान में हमले तेज करने की तैयारी कर रहा है। वह अब अपनी पहचान अफगानिस्तान के प्रमुख जिहादी गुट के रूप में बनाना चाहता है।
आईएसआईएस-खुरासान आतंकवादी गुट इस्लामिक स्टेट की अफगानिस्तान और पाकिस्तान में सक्रिय शाखा है। यहां मिल रही सूचना के मुताबिक वह हिंसक हमलों में तेजी लाकर दुनिया को दिखाना चाहता है कि वह तालिबान से अलग और स्वतत्र है। साथ ही वह तालिबान की सरकार चलाने की क्षमता को भी चुनौती देना चाहता है। अफगानिस्तान के अलग-अलग इलाकों में इस गुट ने तालिबान को ‘अमेरिका का पिट्ठू’ बताने की मुहिम छेड़ दी है।
वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान आईएसआईएस-के और उसके समर्थकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रहा है। खास कर कार्रवाई की मुहिम अफगानिस्तान के उन पूर्वी प्रांतों में छेड़ी गई है, जिनकी सीमा पाकिस्तान से लगती है। हाल ही में तालिबान की तरफ से नियुक्त एक प्रांतीय गवर्नर मुल्ला नेदा मोहम्मद ने मीडिया को बताया था कि आईएसआईएस-के से संबंध रखने के आरोप में नांगरहार प्रांत में 80 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है। यह भी खबर है कि तालिबान के लड़ाकों ने आईएसआईएस-के के तकरीबन 150 से ज्यादा लड़ाकों को मार गिराया है। उनमें इस गुट का पूर्व प्रमुख अबू उमर खुरासानी भी शामिल है।
बीते पांच सितंबर को तालिबान ने प्रभावशाली सुन्नी नेता मौलवी मुल्ला अबू ओबैदुल्लाह मुतवकील की भी हत्या कर दी थी। इसकी वजह यह बताई गई कि मुल्ला मुतवकील के कई छात्र आईएसआईस-के से जुड़े हुए हैँ। मुतवकील का संबंध इस्लामी सलफी खेमे से था। तालिबान ने देश के अलग-अलग हिस्सों में दर्जन भर से ज्यादा सलफी मस्जिदों और मदरसों को बंद करवा दिया है। आठ सितंबर को तालिबान ने पाकिस्तान में बलूचिस्तान प्रांत में आईएसआईएस-के के प्रमुख फारूक बेंगालजी को उस समय मार गिराया, जब वह अफगानिस्तान के निमरोज प्रांत में आया हुआ था।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि बीते 26 अगस्त को काबुल हवाई अड्डे पर हुए बम धमाके के बाद से आईएसआईएस-के अमेरिका के निशाने पर भी है। हवाई अड्डे पर हुए बम हमले में 170 से ज्यादा लोग मारे गए थे, जिनमें 13 अमेरिकी सैनिक थे। बीते एक सितंबर को अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी जनरल मार्के मिले ने कहा था कि आईएसआईएस-के खिलाफ कार्रवाई में यह मुमकिन है कि अमेरिका तालिबान के साथ सहयोग करे।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अब तालिबान और आईएसआईएस-के में खुल कर लड़ाई छिड़ गई है। उनके मुताबिक आईएसआईएस-के तालिबान सरकार को अस्थिर करना चाहता है। उसने अपने साप्ताहिक पत्र अल-नबा में कहा है कि तालिबान वास्तविक जिहाद में शामिल नहीं है। उसने आरोप लगाया है कि अफगानिस्तान को एक बार फिर से वैश्विक षड्यंत्र के तहत तालिबान के हाथों में सौंपा गया है।
इटली में वेनिस स्थित शोधकर्ता और अफगानिस्तान में इस्लामी आंदोलन के विशेषज्ञ रिकार्डो वेले ने निक्कई एशिया से कहा- ‘तालिबान सरकार अफगानिस्तान के अलग-अलग समुदायों को जितना अधिक अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेगी, आईएसआईएस-के को उतना ही उसके खिलाफ प्रचार करने का मौका मिलेगा। इससे आईएसआईएस-के को नए लड़ाकू भी मिलेंगे।’ इसलिए विशेषज्ञों का अनुमान है कि अफगानिस्तान में निकट भविष्य में शांति कायम होने की उम्मीद नहीं है।