अफगानिस्तान: गुपचुप अपनी नियमित सेना खड़ी करने में जुटा है तालिबान, ये है वजह
जानकारों के मुताबिक तालिबान के इस रुख का फायदा आतंकवादी संगठन आईएसआईएस-खुरासान को मिल रहा है। पूर्व अफगान सेना के बहुत से फौजी उसकी तरफ आकर्षित हुए हैं। इससे देश में अस्थिरता बढ़ने का खतरा पैदा हुआ है...
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अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था के ढहने और देश में अस्थिरता पैदा होने की गहराती आशंकाओं के बीच खबर है कि तालिबान प्रशासन गुपचुप अपनी नियमित सेना तैयार करने की कोशिशों में जुटा हुआ है। तालिबान नेताओं ने इस काम की जिम्मेदारी रक्षा मंत्री मुल्ला मोहम्मद याकूब को सौंपी है। याकूब तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे हैं। बताया जाता है कि इस काम में तालिबान के सेना प्रमुख करी फसीउद्दीन याकूब की मदद कर रहे हैं।
तालिबान के रक्षा मंत्रालय में कार्यरत एक अधिकारी ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- ‘देश को एक छोटी लेकिन मजबूत नियमित सेना की जरूरत है, ताकि वह देश की सीमाओं की रक्षा कर सके और आंतरिक सुरक्षा संबंधी खतरों से देश को बचा सके।’ इस अधिकारी ने वेबसाइट से अनुरोध किया कि वह उनका नाम गुप्त रखे।
अपनी मिलिट्री कॉर्प्स का कर रहा पुनर्गठन
पिछले महीने तालिबान ने अपनी आठ मिलिट्री कॉर्प्स को इस्लामी इतिहास से जुड़े नाम दिए। तालिबान के वरिष्ठ लड़ाकों को उन कॉर्प्स के प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने काबुल और कांधार समेत देश के बड़े शहरों में सैनिक परेडों का भी आयोजन किया।
पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि तालिबान के लड़ाके अब परंपरागत सैनिक यूनिफॉर्म पहनने लगे हैं। पिछले महीने तालिबान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी ने इस्लामाबाद की यात्रा की थी। उस दौरान उन्होंने कहा था कि अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के दौरान अफगानिस्तान में जो सेना तैयार की गई थी, उसकी अब देश को जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा था- ये सेना विदेशी हमलावरों ने तैयार की थी। जबकि अफगानिस्तान को ऐसी छोटी सेना की जरूरत है, जिसमें इस्लाम में आस्था रखने वाले और देशभक्त सैनिक हों।
अमेरिकी फौज की मौजूदगी के दौरान गठित की गई सेना में तीन लाख सैनिक थे। उन्हें अमेरिकी और नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) की सेना ने प्रशिक्षित किया था। लेकिन अमेरिकी सेना की वापसी के साथ ही वह फौज बिखर गई। उसने बिना लड़ाई लड़े तालिबान को काबुल पर कब्जा करने दिया। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक सत्ता संभालने के बाद से तालिबान ने उस सेना के 100 से ज्यादा सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया है।
आबादी की समस्याओं पर दे ध्यान
जानकारों के मुताबिक तालिबान के इस रुख का फायदा आतंकवादी संगठन आईएसआईएस-खुरासान को मिल रहा है। पूर्व अफगान सेना के बहुत से फौजी उसकी तरफ आकर्षित हुए हैं। इससे देश में अस्थिरता बढ़ने का खतरा पैदा हुआ है। इसके बावजूद तालिबान अपनी नियमित सेना खड़ी करने की तरफ बढ़ रहा है। पेरिस स्थित अफगान सुरक्षा विशेषज्ञ अहमद होताक ने वेबसाइट निक्कई एशिया से कहा- ‘नई नियमित सेना खड़ी करने के तालिबान के फैसले के पीछे वजह अंतरराष्ट्रीय मान्यता पाने की उसकी इच्छा हो सकती है। वे दुनिया को दिखाना चाहते है कि वे एक राज्य चला रहे हैं। अब वे महज एक हथियारबंद गुट नहीं रह गए हैं।’
उधर पूर्व अफगान सेना से संबंधित रहे अब्दुल जब्बार ने कहा- ‘सेना के गठन की जानकारी दुनिया को न देना तालिबान की सोची-समझी रणनीति है। उन पर यह अंतरराष्ट्रीय दबाव है कि वे पहले अपनी जनता के लिए भोजन का इंतजाम करें और दूसरी समस्याओं को हल करने पर ध्यान दें। सेना गठन की बात गुप्त रख कर वे आलोचनाओं से बचने की कोशिश कर रहे हैं।’