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काबुल विश्वविद्यालय: तालिबानी वाइस चांसलर का फरमान, इस्लामी माहौल तैयार होने तक महिलाओं को आने की अनुमति नहीं

Tue, 28 Sep 2021 08:16 PM IST
गौरव पाण्डेय वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काबुल Published by: गौरव पाण्डेय Updated Tue, 28 Sep 2021 08:16 PM IST
सार

तालिबान की ओर से नियुक्त किए गए काबुल विश्वविद्यालय के नए वाइस चांसलर ने महिलाओं के पढ़ाने और कक्षाओं में शामिल होने पर रोक लगा दी है। वाइस चांसलर का कहना है कि जब तक यहां असली इस्लामी माहौल तैयार नहीं हो जाता, महिलाओं को विश्वविद्यालय आने की मंजूरी नहीं दी जाएगी। 

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Taliban appointed VC bars women from teaching and attending classes at Kabul University
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला (फाइल)

विस्तार

महीनों चले हिंसा के भीषण दौर के बाद बीती 15 अगस्त को तालिबान ने एक बार फिर अफगानिस्तान की सत्ता पर अपना नियंत्रण हासिल कर लिया था। अपने कट्टरपंथी विचारों के लिए कुख्यात तालिबान के सत्ता में आने के बाद यहां के लोगों में किसी भी तरह देश छोड़ने की आपाधापी दिखी थी। इसके चलते काबुल एयरपोर्ट पर लंबे समय तक हालात बेकाबू बने रहे थे। वहीं, महिलाओं के अधिकारों को लेकर भी तालिबान को आलोचना की दृष्टि से देखा जाता है। पहले ही आशंका जताई जा रही थी तालिबान के आने के बाद अफगानिस्तान की महिलाओं की स्थिति खराब हो जाएगी और अब इसके कदमों से भविष्य का खाका कुछ ऐसा ही दिख रहा है।

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दरअसल, काबुल विश्वविद्यालय में तालिबान की ओर से नियुक्त किए गए नए वाइस चांसलर ने एक आदेश में कहा है कि महिलाओं को तब तक कक्षाओं में शामिल होने की या कार्य करने की अनुमति नहीं दी जाएगी जब तक एक इस्लामी माहौल स्थापित नहीं हो जाता है। सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्वविद्यालय के नए वाइस चांसलर मोहम्मद अशरफ गैरत ने एक ट्वीट में कहा कि जब तक सभी के लिए एक असली इस्लामी माहौल उपलब्ध नहीं करा दिया जाता है, महिलाओं को विश्वविद्यालय आने की या काम करने की अनुमति  नहीं होगी। गैरत ने कहा, इस्लाम सबसे पहले है। यह नीति वैसी ही है जब 20 साल पहले तालिबान ने सत्ता हासिल की थी।
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90 के दशक में भी बनी थी कुछ ऐसी ही स्थिति
बता दें कि तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पहली बार 1990 के दशक में हासिल की थी। तब भी तालिबान ने नियम बनाया था कि महिलाओं को सार्वजनिक रूप से बाहर निकलने की अनुमति उसी स्थिति में होगी अगर उनके साथ एक पुरुष संबंधी हो। इसके अलावा आदेश का उल्लंघन करने पर उन्हें प्रताड़ित किया जाता था और उनके स्कूल जाने पर भी पाबंदी लगा दी गई थी। हालांकि, इस बार तालिबान ने बदलाव के दावे किए हैं, लेकिन विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर का यह फरमान बताता है कि बदलाव आया नहीं है। जो बदलाव आया है वह तकनीकी और हथियारों को लेकर हो सकता है, लेकिन उसके नैतिक व सामाजिक विचार वैसे ही हैं।
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केवल बीए पास हैं विश्वविद्यालय के नए चांसलर
नए चांसलर मोहम्मद अशरफ गैरत के पास महज बीए की डिग्री है। तालिबान ने पीएचडी डिग्रीधारक वाइस चांसलर मोहम्मद उस्मान बाबरी को हटाकर गैरत को यह जिम्मेदारी दी है। तालिबान के इस कदम के बाद से विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसरों और प्रोफेसरों समेत करीब 80 शिक्षक इस्तीफा दे चुके हैं। गैरत को वाइस चांसलर बनाने के खिलाफ सोशल मीडिया पर भी विरोध हुआ था। इसके साथ ही आलोचकों ने गैरत के पिछले साल किए गए एक ट्वीट का भी उल्लेख किया है जिसमें वह पत्रकारों की हत्या को सही बताने की कोशिश कर रहे थे। तालिबान के सत्ता में आने से पहले कुछ भारतीय शिक्षक भी काबुल विश्वविद्यालय में पढ़ाया करते थे।


ऐसा ही रहा तो कैसे आगे बढ़ेगा अफगानिस्तान
तालिबान के इस कदम के बाद से अफगानिस्तान के विकास के लिए जरूरी दो घटकों पर सवाल खड़े हो गए हैं, इनमें से एक है शिक्षा और दूसरा घटक है महिलाएं।  इससे पहले तालिबान ने बुरहानुद्दीन रब्बानी के नाम पर एक सरकारी विश्वविद्यालय का नाम बदलकर काबुल एजुकेशन यूनिवर्सिटी करने की भी घोषणा की थी। पूर्व अफगानी राष्ट्रपति रब्बानी देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के संस्थापक थे। रब्बानी की मौत साल 2009 में एक आत्मघाती हमले में हुई थी, जिसके बाद विश्वविद्यालय का नाम उनके नाम पर रखने का फैसला किया गया था। 

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