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Nepal: नेपाल में आरक्षण खत्म करने की सिफारिश पर उठा जोरदार विवाद, विस्तार से जानें पूरा मामला
Thu, 25 Aug 2022 03:29 PM IST
संजीव कुमार झा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Thu, 25 Aug 2022 03:29 PM IST
सार
नेपाल के संविधान के अऩुच्छेद 18 (3) के तहत यह प्रावधान है कि नेपाल सरकार किसी के साथ उसके मूल, धर्म, नस्ल, जाति, कबीले, लिंग, आर्थिक स्थिति, भाषा या उसके भौगोलिक संबंध, विचारधारा आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करेगी।
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नेपाल में आरक्षण खत्म करने को लेकर प्रदर्शन
- फोटो : ANI
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विस्तार
नेपाल में एक संवैधानिक आयोग की कमजोर तबकों के लिए आरक्षण खत्म करने की सिफारिश से देश में नया विवाद खड़ा हो गया है। इस आयोग का गठन पिछड़े वर्गों, विकलांगों, बुजुर्ग लोगों, किसानों, अल्पसंख्यकों, लुप्त हो रहे समुदायों और पिछड़े इलाके के बाशिंदों के संरक्षण के उपाय सुझाने के लिए किया गया था। लेकिन राम कृष्ण तमिलसेना की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने इन तबकों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण खत्म करने की सिफारिश कर दी है।
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आयोग ने ये रिपोर्ट इस महीने के शुरु में ही राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी को सौंप दी थी। लेकिन इसकी सिफारिशें अब चर्चित हुई हैं। आयोग ने कहा है कि नौकरीशुदा लोगों के प्रोमोशन में किसी भी रूप में आरक्षण का प्रावधान नहीं रहना चाहिए।
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आयोग के सदस्य विष्णु माया ओझा के मुताबिक आयोग ने इस बात का अध्ययन किया कि पिछले दो साल में आरक्षण कितना प्रभावी रहा है। उन्होंने कहा कि आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि आरक्षण प्रणाली की समीक्षा की जानी चाहिए, क्योंकि इसके ज्यादातर लाभ एक ही परिवार या समूह के लोगों को मिल रहा है। स्वतंत्र पर्यवेक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आयोग की इस सिफारिश की आलोचना की है। इस आयोग का नाम इन्क्लूजन कमीशन (समावेशन आयोग) था। आलोचकों ने कहा है कि अपने नाम के विपरीत आयोग ने एक्सक्लूजन (लाभ से बाहर करने) की सिफारिश कर दी है। राष्ट्रीय दलित आयोग के अध्यक्ष देवराज विश्वकर्मा ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- आरक्षण व्यवस्था को कैसे खत्म किया जा सकता है। अभी तो इस व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू भी नहीं किया गया है।
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नेपाल के संविधान के अऩुच्छेद 18 (3) के तहत प्रावधान
नेपाल के संविधान के अऩुच्छेद 18 (3) के तहत यह प्रावधान है कि नेपाल सरकार किसी के साथ उसके मूल, धर्म, नस्ल, जाति, कबीले, लिंग, आर्थिक स्थिति, भाषा या उसके भौगोलिक संबंध, विचारधारा आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करेगी। लेकिन इसी अनुच्छेद में कहा गया है कि कमजोर तबके के लोगों के लिए विशेष उपाय करने का अधिकार उसके पास होगा। इसी प्रावधान के तहत देश में आरक्षण प्रणाली अपनाई गई थी। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा है कि आयोग की रिपोर्ट प्रतिगामी है। उन्होंने इसे वंचित समुदायों को अवसरों से और वंचित करने की एक साजिश बताया है। इंडिजीनस नेशनलिटीज कमीशन के अध्यक्ष राम बहादुर थापा ने कहा कि ऐसे कई आयोग हैं, जो आरक्षण नीति खत्म करने का विरोध करेंगे। इसलिए सरकार एक आयोग की सिफारिश पर ऐसा कदम नहीं उठा सकती है। वंचित समूह इस सिफारिश के खिलाफ हैँ। इसलिए उसे लागू करने पर समाज में टकराव पैदा होगा।
नेपाल में आरक्षण नीति 2007 में अपनाई गई थी। कुछ विश्लेषकों ने कहा है कि इन्क्लूजन आयोग के गठन का विचार ही दोषपूर्ण था। इसलिए उसकी रिपोर्ट हैरतअंगेज नहीं है। लॉयर्स एसोसिएशन फॉर ह्यूमन राइट्स ऑफ नेपालीज इंडिजीनस पीपुल्स के सचिव शंकर लिम्बू ने कहा है- ‘आयोग का गठन ही दुर्भावनापूर्ण ढंग से हुआ था। उसका मकसद वंचित तबकों के अधिकारों में कटौती था। इसलिए मुझे उसकी रिपोर्ट पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ है।