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UNHRC: मानवाधिकार से जुड़े प्रस्ताव का विरोध करेगा श्रीलंका, तमिलों के दमन से जुड़ा मामला
Mon, 05 Sep 2022 03:54 PM IST
Amit Mandal
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला , कोलंबो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला , कोलंबो
Published by: Amit Mandal
Updated Mon, 05 Sep 2022 03:54 PM IST
सार
विदेश मंत्री साबरी ने कहा कि श्रीलंका द्विपक्षीय और बहुपक्षीय रूप से अधिकारों की जवाबदेही पर जुड़ाव की नीति अपना रहा है और एक स्थायी समाधान की तलाश कर रहा है।
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विस्तार
श्रीलंका के विदेश मंत्री अली साबरी ने सोमवार को कहा कि इस सप्ताह संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र में श्रीलंका अपनी मानवाधिकार जवाबदेही पर एक नए प्रस्ताव विशेष रूप से एक बाहरी जांच तंत्र का विरोध करेगा। साबरी ने संवाददाताओं से कहा कि श्रीलंका मानवाधिकारों के हनन की जांच के लिए एक बाहरी तंत्र के लिए सहमत नहीं है क्योंकि यह देश के संविधान का उल्लंघन होगा।
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संविधान का दिया हवाला
साबरी ने जिनेवा में 12 सितंबर से 7 अक्टूबर तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 51वें सत्र के आयोजन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि न्याय मंत्री विजेदासा राजपक्षे सत्रों में सरकार का प्रतिनिधित्व करेंगे। उन्होंने कहा कि हम इसका विरोध करेंगे क्योंकि यह हमारे संविधान के खिलाफ है। मानवाधिकार के यूएन उच्च आयुक्त बुधवार को अपनी रिपोर्ट जारी कर सकते हैं।
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साबरी ने कहा कि श्रीलंका द्विपक्षीय और बहुपक्षीय रूप से अधिकारों की जवाबदेही पर जुड़ाव की नीति अपना रहा है और एक स्थायी समाधान की तलाश कर रहा है। श्रीलंका पर एक संभावित मसौदा प्रस्ताव 23 सितंबर को प्रस्तुत किए जाने की उम्मीद है। इसके बाद 6 अक्टूबर को नए मसौदा प्रस्ताव पर सदस्य राज्यों के बीच मतदान होगा। संयुक्त राष्ट्र के अधिकार निकाय ने 2013 के बाद से अधिकारों की जवाबदेही के लिए प्रस्तावों को अपनाया है। युद्ध अपराधों के लिए सरकारी सैनिकों और लिट्टे समूह दोनों पर आरोप लगाया गया, जिन्होंने उत्तर और पूर्वी क्षेत्रों में तमिल अल्पसंख्यकों के लिए एक अलग राज्य बनाने के लिए एक हिंसक अभियान चलाया था।
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अपदस्थ पूर्व राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे ने उस समय श्रीलंका के लगभग 30 साल के गृहयुद्ध को 2009 में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) के सुप्रीमो वेलुपिल्लई प्रभाकरन के खात्मे के साथ कठोरता से समाप्त कर दिया था। पूर्व रक्षा सचिव रहे राजपक्षे मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों से इनकार करते हैं। गोतबाया के बड़े भाई तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने 18 मई, 2009 को 26 साल के युद्ध की समाप्ति की घोषणा की थी जिसमें 1,00,000 से अधिक लोग मारे गए थे और लाखों श्रीलंकाई, मुख्य रूप से अल्पसंख्यक तमिल शरणार्थी के रूप में विस्थापित हुए थे।