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Sri lanka News: मानवाधिकार के सवाल पर क्यों श्रीलंका ने अपना लिया है आक्रामक रुख?

Thu, 06 Oct 2022 05:23 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 06 Oct 2022 05:23 PM IST
सार

Sri lanka News: श्रीलंका के विदेश मंत्री अली साबरी ने बुधवार को देश को इसके प्रति आगाह किया। साबरी अभी जिनेवा में हैं, जहां मानवाधिकार परिषद की बैठक चल रही है। वहां से उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से देश को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका और ब्रिटेन की सरकारें अपने-अपने देशों में हो रही लॉबिंग के प्रभाव में हैं...

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sri Lanka government busy to handling public opinion in the country on United Nations Human Rights Council
Sri lanka News: Ali Sabri, Finance Minister - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद में खुद को घिरता देख श्रीलंका की रानिल विक्रमसिंघे सरकार देश में जनमत को संभालने में जुट गई है। इस बार मानवाधिकार परिषद की बैठक में श्रीलंका के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव में सामान्य से अधिक सख्त भाषा का इस्तेमाल है। गुरुवार रात इस प्रस्ताव पर मतदान होना है, जिसके पारित हो जाने की पूरी संभावना है।

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श्रीलंका के विदेश मंत्री अली साबरी ने बुधवार को देश को इसके प्रति आगाह किया। साबरी अभी जिनेवा में हैं, जहां मानवाधिकार परिषद की बैठक चल रही है। वहां से उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से देश को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका और ब्रिटेन की सरकारें अपने-अपने देशों में हो रही लॉबिंग के प्रभाव में हैं। ये लॉबिंग वहां रहने वाले तमिल समुदाय के लोग कर रहे हैँ। उनके प्रभाव आकर ये सरकारें श्रीलंका के खिलाफ रुख अख्तियार कर रही हैं। उन्होंने कहा- ‘वे सरकारें अपनी जनता की इच्छा की झलक नहीं दे रही हैं। बल्कि यह जोरदार लॉबिंग का परिणाम है। यह भू-राजनीति है।’

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श्रीलंका के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव में श्रीलंका से संबंधित मामले में मानवाधिकार उच्चायुक्त के अधिकार बढ़ाने की बात कही गई है, ताकि वह तमाम तरह की सूचनाएं इकट्ठा कर उनका विश्लेषण कर सके। इसके आधार पर मानवाधिकार हनन की घटनाओं के लिए श्रीलंका में जवाबदेही तय करने की बात भी प्रस्ताव में शामिल है। प्रस्ताव में मानवाधिकार हनन के शिकार हुए लोगों को न्यायिक एवं अन्य प्रक्रियाओं में सहायता देने का प्रावधान भी शामिल किया गया है।

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विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि पिछले एक साल में परिषद की संरचना बदल गई है। कई वे देश अब परिषद का सदस्य नहीं हैं, जो श्रीलंका की मदद करते थे। साबरी ने भी इस पहलू का जिक्र किया और कहा कि इस बदलाव का असर प्रस्ताव पर होने वाले मतदान पर पड़ेगा। जबकि साबरी ने दावा किया कि श्रीलंका में हाल के वर्षों में बनी तमाम सरकारों ने देश में मेलमिलाप को बढ़ावा की कोशिश की है, जिस पर पश्चिमी देश ध्यान नहीं दे रहे हैँ। साबरी ने कहा- ‘हम चाहे जो भी करें, वे एक नई बात लेकर सामने आ जाएंगे और इस मुद्दे को जीवित रखा जाएगा।’

श्रीलंका में 26 वर्ष तक चला गृह युद्ध 2009 में खत्म हुआ था। आरोप है कि उस दौरान तमिल समुदाय के मानवाधिकारों का घोर हनन हुआ। 2009 के बाद से हर साल श्रीलंका के मानव रिकॉर्ड पर परिषद की बैठक में चर्चा होती रही है। इस दौरान ज्यादातर समय श्रीलंका सरकार ने टकराव से बचने और बचाव का रुख अपनाने की कोशिश की है। इसका अपवाद सिर्फ 2015 से 2019 की अवधि थी, जब श्रीलंका सरकार आक्रामक मुद्रा में नजर आई थी। जानकारों का कहना है कि इस बार प्रस्ताव की बदली भाषा को देखते हुए श्रीलंका सरकार ने प्रस्ताव पर मतदान के पहले ही जवाबी हमला बोल दिया है।

जिनेवा में पत्रकारों से बातचीत करते हुए अली साबरी ने कहा कि पश्चिमी देशों के दांव-पेच से बिना प्रभावित हुए श्रीलंका सरकार सच की तलाश की अपनी प्रक्रिया जारी रखेगी और उसके मुताबिक देश में मेलमिलाप को आगे बढ़ाएगी। वह देश की संप्रभुता और अपनी न्यायपालिका की स्वतंत्रता के उल्लंघन की कोशिशों को किसी रूप में स्वीकार नहीं करेगी।

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