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श्रीलंकाः राजपक्षे परिवार के लिए बढ़ती ही जा रही हैं राजनीतिक चुनौतियां, राष्ट्रपति से लेकर पीएम तक के इस्तीफे की उठ रही मांग

Sun, 10 Apr 2022 01:44 AM IST
Atul Sinha Atul Sinha
Updated Sun, 10 Apr 2022 01:44 AM IST
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सार
विश्लेषकों का कहना है कि गोतबया राजपक्षे का भविष्य अब भारत और चीन पर निर्भर करता है। इस साल जनवरी से भारत ने श्रीलंका की उदारता से मदद की है। वह 2.5 बिलियन डॉलर की सहायता दे चुका है। खबरों के मुताबिक इस समय गोटबया सरकार भारत और चीन से 1.5- 1.5 बिलियन डॉलर सहायता लेने के लिए बातचीत कर रही है।
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Sri Lanka Economic Crisis affects politics as Voices against Rajapaksa Family rise from PM Mahinda to President Gotabaya Rajapaksa feeling the heat news in hindi
श्रीलंका की सत्ता में राजपक्षे परिवार का दबदबा। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

श्रीलंका में शक्तिशाली राजपक्षे परिवार के राजनीतिक भविष्य के लिए चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे की सरकार के खिलाफ जन आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। देश भर में छिटपुट रूप से सरकार विरोधी प्रदर्शन जारी हैं। इन प्रदर्शनों के दौरान ‘गो होम गोटा’ का नारा लगभग हर जगह लगाया गया है। राष्ट्रपति राजपक्षे ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। समझा जाता है कि इससे आम लोगों में राजपक्षे परिवार को लेकर गुस्सा और भड़क गया है।


वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे को हटाए जाने के बावजूद राजपक्षे परिवार के कई सदस्य अभी भी ऊंचे पदों पर मौजूद हैं। बासिल राष्ट्रपति के भाई हैं। राष्ट्रपति के एक और भाई महिंद राजपक्षे इस समय प्रधानमंत्री हैं। विश्लेषकों ने कहा है कि लोगों के गुस्से की खास वजह देश में बढ़ती गई आर्थिक मुश्किलें हैं। रिकॉर्ड महंगाई और जरूरी चीजों के अभाव को लंबे समय तक झेलने के बाद अब लोगों का सब्र टूट चुका है।


हालांकि गोतबया अपना पद ना छोड़ने पर अड़े हुए हैं, लेकिन उनकी सरकार में अफरातफरी की स्थिति है। एक हफ्ते के अंदर दो वित्त मंत्रियों को हटना पड़ा है। श्रीलंका ने आर्थिक संकट से निकलने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से कर्ज लेने की गुहार लगाई है। इस बारे में जल्द ही वॉशिंगटन में वार्ता शुरू होने वाली है। लेकिन जानकारों का कहना है कि देश में जैसी राजनीतिक उथल-पुथल है, उस कारण आईएमएफ से बातचीत में बाधा पड़ सकती है।

कोरोना महामारी के समय भी श्रीलंका सरकार ने आईएमएफ से कर्ज लेने की कोशिश की थी। लेकिन तब उसकी कोशिश सफल नहीं हुई। तब आईएमएफ ने सरकार पर बढ़ते कर्ज की समस्या से निपटने में नाकामी के कारण सहायता देने से इनकार कर दिया था। बताया जाता है कि अब श्रीलंका के भंडार में सिर्फ 600 बिलियन डॉलर के बराबर विदेशी मुद्रा बची है। यह सिर्फ एक हफ्ते के आयात का बिल चुकाने के लायक है।

विशेषज्ञों के मुताबिक अगर आईएमएफ से कर्ज मिलने में देर हुई, तो उसका नतीजा आर्थिक संकट के और अधिक गहराने के रूप में सामने आएगा। उसका मतलब होगा कि श्रीलंका में डॉलर की कमी बनी रहेगी, जिससे वह जरूरी चीजों का आयात नहीं कर पाएगा। ईंधन आयात ना होने से बिजली की कटौती की समस्या जारी रहेगी। लोगों की मुसीबत महंगाई की वजह से भी बढ़ी है। मार्च में मुद्रास्फीति की दर 30 प्रतिशत तक चढ़ गई।

विश्लेषकों का कहना है कि गोतबया राजपक्षे का भविष्य अब भारत और चीन पर निर्भर करता है। इस साल जनवरी से भारत ने श्रीलंका की उदारता से मदद की है। वह 2.5 बिलियन डॉलर की सहायता दे चुका है। खबरों के मुताबिक इस समय गोटबया सरकार भारत और चीन से 1.5- 1.5 बिलियन डॉलर सहायता लेने के लिए बातचीत कर रही है।

पर्यवेक्षकों के मुताबिक श्रीलंका को अपने प्रभाव क्षेत्र में रखने की भारत और चीन की कोशिश का लाभ इस समय गोटबया सरकार को मिला है। लेकिन ये राहत लंबे समय तक जारी नहीं रह सकती। असल चुनौती देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने की है। इस मोर्चे पर राजपक्षे सरकार लाचार नजर आ रही है।
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