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लैंगिक संतुलन के लिहाज से एक बड़ा मुकाम होगा टोक्यो ओलंपिक्स, खिलाड़ियों में लगभग 49 फीसदी महिलाएं

Sat, 12 Jun 2021 04:17 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तोक्यो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तोक्यो Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 12 Jun 2021 04:17 PM IST
सार

ओलंपिक खेलों के जानकारों का कहना है कि 1896 में जब पहले ओलंपिक खेलों का आयोजन हुआ था, तो उसमें महिलाओं के लिए जगह नहीं थी। ऐसा प्राचीन ग्रीस में होने वाले ओलंपिक्स की परंपरा के मुताबिक किया गया...

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sight of gender balance will be seen In Tokyo Olympics for the first time since the games started in 1896
टोक्यो ओलंपिक टॉर्च लाइटिंग सेरेमनी - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

टोक्यो में 23 जुलाई से शुरू हो रहे ओलंपिक्स इतिहास का एक खास मुकाम बनेगा। 1896 में इन खेलों की शुरुआत होने के बाद ये पहला मौका होगा, जब ‘लैंगिक संतुलन’ (जेंडर बैलेंस) का नजारा देखने को मिलेगा। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने बताया है कि इस बार खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ियों में लगभग 49 फीसदी महिलाएं होंगी। हालांकि कई विशेषज्ञ यह मानते हैं कि अभी समता के लिहाज से अभी लंबी दूर करना बाकी है।

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वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी में इंस्टीट्यूट फॉर कल्चर एंड सोसायटी में अनुसंधानकर्ता डॉ जोर्गे निजनिक ने हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा- ‘संख्या का महत्व बहुत कम है। असल सवाल है कि उनकी आवाजें कहां हैं? ऐसे सिस्टम कहां हैं जो महिलाओं और दूसरे जेंडर के लोगों को उन सीमाओं को तोड़ने में मदद दें, जिनके अंदर उन्हें रहना पड़ता है।’ निजनिक ‘वर्ल्ड कप क्रोनिकल्सः 31 डेज डैट रॉक्ड ब्राजील’ नाम की किताब के लेखक भी हैं। निजनिक उन विशेषज्ञों में रहे हैं, जो टोक्यो ओलंपिक्स को रद्द करने की मांग करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये खेल कोरोना संक्रमण फैलाने का एक बड़ा मौका बन सकता है। इसका सबसे ज्यादा खतरा महिलाओं और दूसरे जेंडर के लोगों के लिए ही रहेगा।
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लेकिन ओलंपिक्स आयोजन समिति, जापान सरकार और टोक्यो नगर प्रशासन ने कहा है कि वे इन खेलों को लैंगिक समता की दिशा में एक बड़ा मुकाम बनाना चाहते हैँ। ऐसा मैदान पर और मैदान के बाहर भी किया जाएगा, ताकि अधिक समान और समावेशी समाज बनाने का रास्ता साफ हो सके। अगर ऐसा हो सका, तो यह टोक्यो की एक बड़ी विरासत होगी।
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ओलंपिक खेलों के जानकारों का कहना है कि अगर ये मकसद पूरी तरह हासिल नहीं भी होता है, तब भी ये माना जाएगा कि अपने सवा सौ साल के इतिहास में ओलिपिंक खेलों ने एक लंबा सफर तय कर लिया है। 1896 में जब पहले ओलंपिक खेलों का आयोजन हुआ था, तो उसमें महिलाओं के लिए जगह नहीं थी। ऐसा प्राचीन ग्रीस में होने वाले ओलंपिक्स की परंपरा के मुताबिक किया गया। आधुनिक ओलंपिक्स के संस्थापक बैरों पियरे द कुर्बतिन ने तब कहा था कि महिलाओं की भागीदारी के साथ ओलंपिक्स का आयोजन अव्यावहारिक और अनुचित है। इससे इन खेलों में दिलचस्पी घटेगी और साथ ही इनका सौंदर्य भी।

लेकिन चार साल बाद जब साल 1900 में ओलंपिक खेलों का आयोजन हुआ तो द कुर्बतिन महिलाओं के प्रति उदारता दिखाने को तैयार हो गए। तब पहली बार महिलाओं को ओलंपिक्स में भागीदारी का मौका दिया गया। स्विट्जरलैंड की हेलेन दे पोर्तालेस ओलंपिक खेलों में भाग लेने वाली पहली महिला बनी थीं। तब कुल 22 महिला एथलीट आई थीं, जिनमें सबसे पहले मैदान में उतरने का मौका पोर्तालेस को ही मिला। 1976 में हुए मॉन्ट्रियल ओलंपिक खेलों में पहली बार कुल एथलीट्स में महिलाओं की संख्या 20 प्रतिशत से अधिक हुई थी। 2012 में हुए लंदन ओलंपिक खेल ऐसे पहले साबित हुए, जिनमें हर देश की टीम में कोई ना कोई महिला खिलाड़ी जरूर थी।


अब टोक्यो ओलंपिक ऐसा पहला मौका होगा, जब ये नियम लागू कर दिया गया है कि हर देश को कम से कम एक महिला खिलाड़ी को अपने दल में जरूर शामिल करना होगा। अमेरिका स्थित वूमन्स स्पोर्ट्स फाउंडेशन ने हाल में कहा कि ओलंपिक समिति ने जो एलान किया है उसकी बहुत जरूरत थी। यह उत्साहवर्धक है। जहां तक खेलों में समता और समावेशन की बात है, तो दुनिया ने लंबा सफर तय किया है। लेकिन अभी भी बहुत लंबी दूरी तय करना बाकी है। जानकारों का कहना है कि ओलंपिक खेलों में महिलाओं को पूरी तरह समान धरातल तब तक नहीं मिल सकता, जब तक सभी देशों में उनके लिए अनुकूल स्थितियां ना बन जाएं।

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