जलवायु परिवर्तन के लिए चुनौती: बड़े खराब मौके पर दुनिया में आया ये ऊर्जा संकट, कॉप-26 के लिए चुनौतियां बढ़ीं
जानकारों के मुताबिक दुनिया में समय दिख रही ऊर्जा की कमी के कई कारण हैं। उनमें अक्षय ऊर्जा स्रोतों से अपेक्षा से कम बिजली पैदा होना भी है। ब्रिटेन और ईयू क्षेत्र में इस साल गर्मियों में हवा सामान्य गति से नहीं चली। इसलिए पवन ऊर्जा का उत्पादन घट गया। चीन में कम बारिश हुई। इसकी वजह से पनबिजली का उत्पादन घट गया...
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जिस समय दुनिया में जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता और गहरा गई है, उसी समय गंभीर ऊर्जा संकट खड़ा हो गया है। इससे कार्बन उत्सर्जन को घटाने के दुनिया के लक्ष्य के लिए नई चुनौतियां पैदा हो गई हैं। स्कॉटलैंड के ग्सासगो में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन- कॉप 26 (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीजः 26वां सम्मेलन) होने में अब तीन हफ्तों का वक्त बचा है। दुनिया भर के देश इस तैयारी में जुटे थे कि इस सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन घटाने का कोई महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय हो। लेकिन जानकारों का कहना है कि अब ऐसा होना और कठिन हो गया है।
ऊर्जा संकट से सबसे पहले प्रभावित हुए देश चीन ने अपनी कोयला कंपनियों को खनन तेज करने का आदेश दे दिया है। जबकि यूरोपियन यूनियन (ईयू) में जन भावना जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए प्रस्तावित ग्रीन डील के खिलाफ होती जा रही है। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक से गुजारिश की है कि वे तेल उत्पादन बढ़ाएं। पर्यावरणवादी कार्यकर्ताओं ने इन सभी घटनाओं को जलावायु के लिए एक खतरनाक संकेत माना है।
जानकारों के मुताबिक दुनिया में समय दिख रही ऊर्जा की कमी के कई कारण हैं। उनमें अक्षय ऊर्जा स्रोतों से अपेक्षा से कम बिजली पैदा होना भी है। ब्रिटेन और ईयू क्षेत्र में इस साल गर्मियों में हवा सामान्य गति से नहीं चली। इसलिए पवन ऊर्जा का उत्पादन घट गया। चीन में कम बारिश हुई। इसकी वजह से पनबिजली का उत्पादन घट गया। इसी बीच आरोप है कि रूस ने गैस उत्पादन में कटौती कर दी। उसने इसके जरिए अपनी नॉर्ड स्ट्रीम-2 गैस पाइपलाइन की जल्द मंजूरी प्रक्रिया के दबाव बनाने की कोशिश की। हालांकि रूस और उसकी तेल उत्पादक कंपनी गैजप्रोम ने इन आरोपों का खंडन किया है।
विश्लेषकों का कहना है कि ये तमाम घटनाएं उस समय हुईं, जब कोरोना महामारी के बाद दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं में नई गति आई है। उसकी वजह से ऊर्जा की मांग बढ़ी है। इसके बीच कोयला के जरिए बिजली उत्पादन बढ़ाने की कोशिश करने वाले देशों में चीन अकेला नहीं है। यूरोपीय नेता भी अब अधिक पुरजोर आवाज से कहने लगे हैं कि जीवाश्म ऊर्जा (फॉसिल फ्यूल) में कटौती करना संभव नहीं है। ब्रिटेन की सरकार ने बिजली की मांग पूरी करने के लिए अपने पुराने ताप बिजली संयंत्रों को फिर चालू करने का आदेश दिया है। जबकि ईयू के कुछ देशों में कोयला और कच्चे तेल से चलने वाले बिजली संयंत्रों को बंद करने की समयसीमा बढ़ाने पर विचार किया जाने लगा है।
हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बान उन नेताओं में सबसे आगे हैं, जिन्होंने ग्रीन डील के खिलाफ बोलना शुरू किया है। उन्होंने कहा है कि इस डील को लागू करने के उत्साह में ईयू की नौकरशाही ने मौजूदा ऊर्जा संकट को खड़ा किया है। जबकि ईयू के ऊर्जा आयुक्त काड्री सिमसन ने कहा है कि यूरोप के ऊर्जा संकट का एकमात्र स्थायी समाधान ग्रीन डील ही है। इस खींचतान के बीच कॉप-26 को लेकर चिंता बढ़ गई है। ये आशंका पैदा हो गई है कि वहां ज्यादा कुछ हासिल नहीं हो सकेगा।