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वो सात कारण जिससे रूस में पुतिन बने सबसे ताकतवर

Tue, 20 Mar 2018 02:52 PM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Updated Tue, 20 Mar 2018 02:52 PM IST
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seven reasons that made putin most powerfull man in russia

ऐसा लग रहा है कि व्लादिमीर पुतिन ने रूस की जनता को भरोसा दिला दिया है कि ना उन्हें हटाना आसान है और ना उनकी जगह किसी और को देना। अगर उनके चीफ ऑफ स्टाफ व्लादिमीर ऑस्ट्रोवेंको के शब्दों में कहा जाए तो, "पुतिन नहीं तो रूस नहीं।" लेकिन पुतिन इस मकाम तक पहुंचे कैसे? कैसे वो रूस का सबसे प्रभावशाली चेहरा बने? इक्कीसवीं सदी में रूस में सिर्फ एक प्रभावशाली चेहरा रहा, और वो नाम है पुतिन।

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साल 1999 में प्रधानमंत्री रहे, 2000-2008 तक राष्ट्रपति रहे, 2008-2012 तक फिर से प्रधानमंत्री बने और फिर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के कार्यकाल को 4 से 6 साल करने के लिए संविधान में संशोधन किया। उसके बाद 2012 में फिर से राष्ट्रपति बने। वो उन रूसी नेताओं में से हैं जो सबसे लंबे समय तक सत्ता में बने रहे। ऐसी संभावना है कि वे सत्ता में 2024 तक बने रहेंगे क्योंकि एक बार फिर उनके सत्ता में आने के बाद यही संकेत मिल रहे हैं।
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1) बड़ी महत्वकांक्षा

पुतिन अपने दो भाइयों के साथ एक साधारण से घर में पले-बढ़े। उस घर में दो और परिवार भी रहते थे। पुतिन 25 साल की उम्र तक अपने माता-पिता के कमरे में ही रहते थे। कहा जाता है कि उन्होंने गरीबी और भूख भी देखी लेकिन फिर भी उनकी आंखों ने कुछ बड़ा करने का सपना देख लिया था। पुतिन ने सेंट पीटर्सबर्ग से कानून की पढ़ाई की और 1975 में रूस की खुफिया एजेंसी में भर्ती हुए जो रूस की सत्ता तक पहुंचने में पहला कदम था।
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2) अचानक राष्ट्रपति बनना

राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने 31 दिसंबर 1999 को बीमार होने की वजह से अचानक अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी। तब तक पुतिन खुद को राजनीतिक तौर पर सत्ता की कमान संभालने के लिए पहले विकल्प के तौर पर खड़ा कर चुके थे और अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर सत्ता संभाल ली। फिर मार्च 2000 में जनता ने राष्ट्रपति के तौर पर उन्हें चुन लिया। हालांकि 'ऑलीगार्क' यानी कुछ कुलीन और अमीर लोग, जो रूस की राजनीति तय करते थे, और येल्तसिन के समर्थकों को लगता था कि इस नए व्यक्ति को तोड़ना इतना मुश्किल नहीं होगा। लेकिन वक्त के साथ उन्हें अहसास हो गया कि वे सब गलत थे।

3) मीडिया पर कंट्रोल

बीबीसी रूसी सेवा के एडिटर फेमिल इस्मेलव याद करती हैं कि पुतिन ने कैसे सत्ता में आने के कुछ दिन बाद ही मीडिया पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया था जिससे राजनीति के पुराने लोग भी हैरत में आ गए थे। इस तरह से सरकार ने सुनिश्चित किया कि लोगों तक जा रही जानकारी को कैसे प्रभावित किया जाए। जैसे कि पॉपुलरिटी रेटिंग को अपने हक में दिखाना, नई सरकार में रूस और उसके नेता की प्रभावी छवि पेश करना और 'देश के दुश्मनों' पर उंगली उठाना। पहला शिकार बना साल 2000 में 'मीडिया मुगल' कहे जाने वाले गुसिन्सकी का स्वतंत्र चैनल एनटीवी।

इसके दर्शकों की संख्या लगभग 10 करोड़ थी और रूस के 70 फीसदी हिस्से में इसकी कवरेज पहुंचती थी। फिलहाल रूस में 3 हजार टीवी स्टेशन हैं। उनमें से ज्यादातर राजनीतिक खबरें कवर ही नहीं करते हैं और जब करते हैं तो वे सरकार के नियंत्रण में होती हैं। 'आरटी' एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया है जो रूस सरकार के पैसे से चलता है और पूरे विश्व में खबरें पहुंचाता है। स्पेनिश भाषा में भी इसका चैनल है। स्वतंत्र मीडिया अब सिर्फ इंटरनेट तक ही सीमित रह गया है।

यूक्रेन युद्ध को जायज ठहराया

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4) 'कुलीन वर्ग' के खिलाफ लड़ाई

सिर्फ गुसिन्सकी ही नहीं थे जिन्हें पुतिन का शिकार होने पड़ा। बीबीसी डाक्यूमेंट्री 'द न्यू जार' के मुताबिक पुतिन ने अपनी आंखों से देखा कि कैसे बोरिस येल्तसिन की सरकार में 'कुलीन वर्ग' का प्रभाव कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। इसलिए पुतिन ने उन पर नियंत्रण करने की ठानी, इससे पहले कि वे पुतिन पर नियंत्रण कर लें। इस तरह 'कुलीन वर्ग' के हाई-प्रोफाइल लोग जैसे लॉबिस्ट बोरिस बेरेजोव्सकी और तेल के बड़े व्यापारी मिखाइल खोदोरकोव्सकी बदनामी के गड्ढे में धकेल दिए गए। भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल काटी या देश छोड़ने पर मजबूर हुए। खोदोरकोव्सकी को 2013 में स्विटजरलैंड में शरण लेनी पड़ी और उसी साल बोरिस बेरेजोव्सकी ब्रिटेन के अपने घर में संदिग्ध हालत में मृत पाए गए थे।

5) 'आपका रूस मेरा रूस'

राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय जानकारों का मानना है कि पुतिन ने 'महान रूस' की छवि बनाने की कोशिश की जिसमें राष्ट्रवाद, सेना और धर्म को बढ़ावा दिया। उनकी मंशा था कि एक मजबूत रूसी पहचान लोगों के मन में बैठा दी जाए ताकि जनता गर्व महसूस करे कि वे क्या हैं और उनके पास क्या है। साथ ही पुतिन को इस तरह दिखाया गया कि वे एक मजबूत व्यक्ति हैं जो सेना के नेतृत्व के करीब हैं और चर्च के भी जो कि देश पर नैतिक दबदबा रखता है। इससे पुतिन की लोकप्रियता में इजाफा हुआ। रूस की छवि को एक मजबूत देश के तौर पर दिखाया गया जिसका नेतृत्व मजबूत हाथों में है और जो अंतरराष्ट्रीय दबाव में नहीं आता है।

6) 'नियंत्रित लोकतंत्र'

किंग्स कॉलेज, लंदन में रशियन इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर सेम्युअल ग्रीन ने बीबीसी को बताया कि 'नियंत्रित लोकतंत्र' के सिद्धांत ने विरोध ना पनपने में पुतिन की काफी मदद की। ग्रीन के मुताबिक मीडिया पर नियंत्रण के साथ-साथ पुतिन ने सिविल सोसाइटी का भी विकल्प खड़ा किया। खुद ऐसे संगठन बनाए और उन्हें आर्थिक मदद दी जो कि वक्त पड़ने पर जनता और राजनीति में अगुआई कर सके और विरोधी संगठनों को पनपने से रोक सकें। पुतिन ने सुनिश्चित किया कि जैसे ही कोई विरोध हो, वह अपने समर्थकों को आगे कर दें इससे पहले कि विपक्ष सामने आए।

ग्रीन ने बताया कि पुतिन ने एक और तरीका अपनाया कि रूस की जनता को आभास हो कि वे एक लोकतंत्र में रहते हैं और उनके पास भी वैसे ही विकल्प हैं जैसे कि दुनिया के सामान्य लोकतांत्रिक देशों में होते हैं। इसके लिए पुतिन के लोगों ने संसद में मौजूद दूसरी पार्टियों से रिश्ते बनाने में काफी मेहनत की। उदाहरण के तौर पर उन्होंने दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ नियमित तौर पर मुलाकातें की ताकि उन्हें स्पष्ट कर सकें कि वो क्या मुद्दा उठा सकते हैं और क्या नहीं और कैसे पैसा इकट्ठा कर सकते हैं और कैसे नहीं। ग्रीन के मुताबिक इससे पार्टियां भी सरकार की वफादार बनी रहीं।

7) परोक्ष युद्ध

पुतिन सरकार के दो सैन्य दख्ल का आधार यही कांसेप्ट है - 2014 में यूक्रेन और 2015 में सीरिया। अधिकारिक तौर पर रूस ने यूक्रेन युद्ध को ये कहकर जायज ठहराया कि यूक्रेन में रूस के हितों के लिए जरूरी था और दूसरा युद्ध जिहादियों से लड़ने के लिए रूस के सहयोगी बशर-अल-असद की मदद मांगने पर किया। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रॉय एलिसन के मुताबिक यूक्रेन और सीरिया में रूस की कार्रवाई, जानकारों के हिसाब से नॉन लीनियर वॉरफेयर का एक उदाहरण है, इनसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान भटका और उन्होंने रूस की इन हरकतों को जाने दिया। प्रोफेसर रॉय के हिसाब से रूस के पास वो ताकत नहीं है कि वो अमरीका या नाटो को चुनौती दे सके। इसलिए उसकी रणनीति रहती है कि विश्व को वो संशय में रखे कि रूस क्या कर रहा है या क्या करने वाला है।

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