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17 साल पुराने सार्स वायरस के एंटीबॉडी से लैब परीक्षण में हारा कोरोना वायरस
Sun, 11 Oct 2020 02:15 AM IST
Jeet Kumar
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
Published by: Jeet Kumar
Updated Sun, 11 Oct 2020 02:15 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
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कोरोना वायरस महामारी से खौफजदा हो रहे लोगों के लिए उम्मीद की किरण सरीखी एक खबर सामने आई है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि 17 साल पहले यानी 2003 में फैली सार्स-कॉव वायरस महामारी की चपेट में आए मरीजों के एंटीबॉडी ने लैब परीक्षण में सार्स-कॉव-2 को बेअसर कर दिखाया है। सार्स-कॉव-2 के कारण ही कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी फैलती है।
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नए अध्ययन के मुताबिक, लैब में सार्स-कॉव-2 से संक्रमित संवर्धित कोशिकाओं पर सार्स-कॉव के मरीजों के संरक्षित किए गए सैंपलों में मौजूद एंटीबॉडी ने अच्छा प्रभाव दिखाते हुए संक्रमण का असर खत्म कर दिखाया है।
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साइंस एडवांस जर्नल में प्रकाशित शोध के लेखक ने यह भी बताया कि हिमालयी पाव सिवेट को संक्रमित करने वाले सार्स-कॉव से तैयार रिसेप्टर बाइंडिंग डोमेन (आरबीडी) से चूहे ऑर खरगोश प्रतिरक्षित किए गए।
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इन चूहे और खरगोश ने आश्चर्यजनक तरीके से सार्स-कॉव-2 के लिए उन जानवरों के मुकाबले ज्यादा मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया दिखाई, जिन्हें मानवीय सार्स-कॉव सैंपल से तैयार आरबीडी से प्रतिरक्षित किया गया था।
शोधकर्ताओं का दावा है कि उनकी खोज से अभी कहर बरपा रहे और भविष्य में आने वाले सभी तरह के कोरोना वायरस के खिलाफ कारगर यूनिवर्सल वैक्सीन तैयार करने की रणनीति बनाई जा सकती है।
अपनी खोज के दौरान युआनमे झू और उनके साथी वैज्ञानिकों ने सार्स-कॉव से संक्रमित होने के बाद ठीक हो गए मरीजों के करीब 20 सीरम सैंपलों का परीक्षण किया। इन सैंपलों को सार्स-कॉव-2 के कहर वाले चार क्षेत्रों से लिए गए प्रोटीन-एंटीजन के साथ प्रतिक्रिया कर निष्कर्ष हासिल किए थे।