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NSA's China visit: क्या बीजिंग से कुछ नया लेकर लौटेंगे अजीत डोभाल, भारत-चीन संबंधों पर दुनिया की निगाह?

Mon, 24 Aug 2026 10:10 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Mon, 24 Aug 2026 10:10 PM IST
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NSA Ajit Doval's China Visit: Will Beijing Bring a New Turn in India-China Ties?
एनएसए अजीत डोभाल। - फोटो : पीटीआई
एनएसए अजीत डोभाल अपने समकक्ष से वांग यी से बात करने चीन गए हैं। मंगलवार को सीमा विवाद पर 25वें दौर की वार्ता के लिए दोनों वार्ता की मेज पर होंगे। देखना है, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बीजिंग से नया क्या लेकर लौटते हैं।
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दोनों देशों के एनएसए भारत-चीन सीमा विवाद मुद्दे के समाधान के लिए वार्ता प्रक्रिया के विशेष प्रतिनिधि हैं। एनएसए का यह दौरा भारत और चीन की आपसी केमिस्ट्री में भी बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है। 12-13 सितंबर को भारत की अगुआई में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होना है। इसमें रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन आ रहे हैं। शी जिनपिंग समेत ब्रिक्स के सदस्य देशों के शिखर नेता भारत में होंगे। ब्रिक्स के इस फोरम पर अमेरिका के रणनीतिकारों की भी निगाह है। दक्षिण एशिया के सात-साथ दुनिया के तमाम देश भारत-चीन संबंधों पर निगाह गड़ाए बैठे हैं। भारत की कोशिश है कि चीन के साथ उसके सीमा विवाद के समाधान को ठोस स्वरुप मिले। चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों की तैनाती घटाए। दोनों देश प्रतिबद्धता के साथ शांति और स्थायित्व की स्थापना पर काम करें। इस नजरिए से एनएसए की यात्रा को काफी अहम माना जा रहा है।
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चाहे डोकालाम में तनाव पूर्ण स्थिति रही हो या फिर 2020 में गलवां वैली में दोनों देशों के सैनिकों में खूनी संघर्ष के बाद बेहद तनाव पूर्ण स्थिति, एनएसए अजीत डोभाल ने फंसी गाड़ी को निकालने में बड़ी सफलता पाई थी। आपरेशन सिंदूर के दौरान संघर्ष विराम का पाकिस्तान द्वारा सहमति जताने के बाद भी पालन करने में कोताही बरतने पर एनएसए आगे आए थे। वांग यी से बात की थी और सबकुछ मुकम्मल किया था। डोभाल के बारे में आम है कि वह व्यवहारिक कूटनीति का सहारा लेने में देर नहीं लगाते। क्षेत्रीय सुरक्षा और भारत-चीन के संबंध के महत्व को रेखांकित करके वह नए रास्ते तलाश लेते हैं। एक पूर्व राजनयिक कहते हैं कि मुझे पूरी उम्मीद है। कुछ सही दिशा में बात बनेगी। हालांकि वांग यी चीन के विदेश मंत्री और एनएसए दोनों भूमिका में हैं। शी जिनिपंग के भरोसेमंद और उनके बारे में आम है कि जल्दबाजी में नहीं रहते।  
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विदेश मंत्री ने पहले ही दे दिया संकेत
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन के साथ भारत के संबंध की पहली शर्त बता दी है। उन्होंने सीमा पर शांति और स्थायित्व की स्थापना को ही पहली शर्त बताया है। अर्थात भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति बहाल होनी चाहिए। सीमा पर अमन चैन को लेकर संवेदनशील जयशंकर ने कहा कि भारत के लिए चीन महत्वपूर्ण है। दोनों देशों में अच्छा संबंध होना चाहिए। लेकिन दोनों देशों के बीच में द्विपक्षीय संबंधों के लिए सीमा क्षेत्र में शांति और स्थिरता पहली तथा सबसे जरूरी शर्त है। 

चीन के साथ व्यापार घाटा, सीमा पर भरोसे की कमी 
पड़ोसी देश चीन के साथ भारत की दो सबसे बड़ी पीड़ा है। पहली अप्रैल 2020 में चीन की वास्तविक नियंत्रण रेखा(एलएसी) पर अंतरराष्ट्रीय सहमति और समझौते के उल्लंघन की कोशिश। इसके अंर्तगत दोनों देशों के सैनिकों में हिंसक झड़प। इस घटना के बाद से एलएसी पर चीन के 70 हजार से अधिक सैनिक, निगरानी के उपकरण, युद्ध के साजो-सामान तैनात हैं। चीन की सैन्य तैनाती को देखते हुए भारत ने भी एहतियात के तौर पर 50 हजार से अधिक सैनिकों की तैनाती कर रखी है। भारत और चीन के सैनिक इतिहास में कभी इतने अधिक समय के लिए इतनी संख्या में सैनिक तैनात रहे हैं। यह भी तय नहीं है कि यह तैनाती कब तक रहेगी? भारत इस दिशा में ठोस पहल चाहता है। ताकि दोनों देश भरोसा और आत्म विश्वास के साथ द्विपक्षीय रिश्ते को मजबूत आधार दे सकें।
 
दूसरी-बढ़ता व्यापार घाटा। जनवरी-जून 2026 के बीच में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 91.72 अरब डॉलर का रहा। इसमें भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 67.1 अरब डॉलर(23 प्रतिशत की वृद्धि) हो गया। अर्थात चीन से आयात(79.41 अरब) लगातार बढ़ रहा है और उसे निर्यात(12.31) लगातार घटता जा रहा है। 2025-26 में यह द्विपक्षीय व्यापार 151.1 और व्यापार घाटा 112.16 अरब डॉलर का था। 2020 में व्यापार घाटा 45.6-48.66 अरब डालर के बीच,2019 में व्यापार घाटा 56.77 अरब डालर के बीच था। 2014 में भारत-चीन के बीच कुल 70.59 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था।


चीन का क्या है रूख?
भारत के साथ चीन की मंशा साफ नहीं रही है। सीमा विस्तार की उसकी नीति जग जाहिर है। हालांकि आजाद होने के बाद से चीन के पास बहुत सीमित सैन्य कार्रवाई(युद्ध) का अनुभव है। वह मसल पॉवर दिखाकर नर्व वार की नीति पर अधिक चलता है। ढाई कदम आगे बढ़कर दो कदम पीछे आता है और पत्ते नहीं खोलता। भारत के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सीमा विवाद के मामले हों या द्विपक्षीय व्यापार और घाटा की स्थिति, वह इसी नीति पर चल रहा है। इसके समानांतर भारत को चारो तरफ से घेरने ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल’ की नीति उसकी लगातार जारी रही। उसने भारतीय हितों की अनदेखी करके पाकिस्तान का साथ देने में संकोच नहीं किया। उसकी इस नीति के कारण भारत और चीन भरोसे के संबंध से हमेशा दूर रहे।    

 
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