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Russia Ukraine War: क्या है ‘बांध युद्ध’ जिसने एक झटके में यूक्रेन में मचाई तबाही, कैसे हुई थी इसकी शुरुआत?
Fri, 09 Jun 2023 12:32 PM IST
हिमांशु मिश्रा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Fri, 09 Jun 2023 12:32 PM IST
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रूस-यूक्रेन के बीच अब बांध युद्ध
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अमर उजाला
विस्तार
रूस-यूक्रेन युद्ध को चलते 16 महीने से ज्यादा का समय हो चुका है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस युद्ध में अब तक 10 हजार से ज्यादा आम लोगों की मौत हो चुकी है। 20 हजार से ज्यादा लोग घायल हैं। करीब 70 हजार से ज्यादा जवान दोनों तरफ से मारे गए हैं। ये आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं।इस बीच, छह जून को यूक्रेन के सबसे बड़े डैम यानी बांध में से एक नोवा कखोव्का पर हमला हुआ। बांध टूटने से 50 से ज्यादा गांव डूब गए हैं। इनमें रहने वाले 40 हजार से ज्यादा लोगों की जान खतरे में पड़ गई है। बांध के टूटने पर यूक्रेन और रूस एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं।
युद्ध में बांध तोड़कर दुश्मन को रोकने और युद्ध में जीत के लिए आगे बढ़ने का तरीका काफी पुराना है। ऐसे में आज हम डैम वॉर यानी बांध युद्ध की पूरी कहानी बताएंगे। कैसे इसकी शुरुआत हुई और इसका प्रयोग युद्ध में कैसे किया जाता है?
पहले समझिए यूक्रेन में क्या हुआ?
दक्षिणी यूक्रेन और क्रीमिया को पानी की आपूर्ति करने वाला कखोव्का बांध मंगलवार छह जून को तड़के टूट गया। सीमा से सटा यह बांध सीमा पर रूस के नियंत्रण वाले क्षेत्र में पड़ता है। बांध टूटने से आसपास के क्षेत्र में बाढ़ आ गई। इससे सबसे बड़ा खतरा पास के एक परमाणु ऊर्जा संयंत्र को उत्पन्न हो गया है।
कखोव्का बांध के क्षतिग्रस्त होने से नजदीक में बसे एक शहर और 50 से ज्यादा गांवों में बाढ़ आ गई। वहीं, बाढ़ के कारण इन इलाकों से 25,000 लोगों को निकाल कर सुरक्षित जगह ले जाया गया है। करीब 15 हजार लोग अभी भी फंसे हुए हैं। अब रूस और यूक्रेन दोनों ही घटना के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
बांध पर रूसी सेना ने फरवरी 2022 में यूक्रेन के साथ युद्ध की शुरुआत में कब्जा कर लिया था। बांध दक्षिणी यूक्रेन के खेरसॉन क्षेत्र और रूस नियंत्रित क्रीमिया प्रायद्वीप के लिए एक रणनीतिक जल स्रोत है। बांध टूटने से परमाणु घटना की आशंका को बढ़ गई है, क्योंकि जापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र पास में ही स्थित है।
दक्षिणी यूक्रेन और क्रीमिया को पानी की आपूर्ति करने वाला कखोव्का बांध मंगलवार छह जून को तड़के टूट गया। सीमा से सटा यह बांध सीमा पर रूस के नियंत्रण वाले क्षेत्र में पड़ता है। बांध टूटने से आसपास के क्षेत्र में बाढ़ आ गई। इससे सबसे बड़ा खतरा पास के एक परमाणु ऊर्जा संयंत्र को उत्पन्न हो गया है।
कखोव्का बांध के क्षतिग्रस्त होने से नजदीक में बसे एक शहर और 50 से ज्यादा गांवों में बाढ़ आ गई। वहीं, बाढ़ के कारण इन इलाकों से 25,000 लोगों को निकाल कर सुरक्षित जगह ले जाया गया है। करीब 15 हजार लोग अभी भी फंसे हुए हैं। अब रूस और यूक्रेन दोनों ही घटना के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
बांध पर रूसी सेना ने फरवरी 2022 में यूक्रेन के साथ युद्ध की शुरुआत में कब्जा कर लिया था। बांध दक्षिणी यूक्रेन के खेरसॉन क्षेत्र और रूस नियंत्रित क्रीमिया प्रायद्वीप के लिए एक रणनीतिक जल स्रोत है। बांध टूटने से परमाणु घटना की आशंका को बढ़ गई है, क्योंकि जापोरिज्जिया परमाणु ऊर्जा संयंत्र पास में ही स्थित है।
कखोव्का बांध कब बना था?
कखोव्का पनबिजली संयंत्र के हिस्से के रूप में कखोव्का बांध को साल 1956 में सोवियत काल में नीप्रो नदी पर बनाया गया था। यह 30 मीटर (98 फीट) ऊंचा और 3.2 किमी (2 मील) लंबा है। यह बांध देश के दूर उत्तर से दक्षिण में समुद्र में फैला हुआ है। बांध में अमेरिकी राज्य यूटा में ग्रेट साल्ट लेक की मात्रा के बराबर पानी रखने की क्षमता है। स्थानीय लोग इसे कखोव्का सागर भी कहते हैं क्योंकि कुछ जगहों पर बांध का दूसरा किनारा नहीं दिखाई देता है।
कखोव्का पनबिजली संयंत्र के हिस्से के रूप में कखोव्का बांध को साल 1956 में सोवियत काल में नीप्रो नदी पर बनाया गया था। यह 30 मीटर (98 फीट) ऊंचा और 3.2 किमी (2 मील) लंबा है। यह बांध देश के दूर उत्तर से दक्षिण में समुद्र में फैला हुआ है। बांध में अमेरिकी राज्य यूटा में ग्रेट साल्ट लेक की मात्रा के बराबर पानी रखने की क्षमता है। स्थानीय लोग इसे कखोव्का सागर भी कहते हैं क्योंकि कुछ जगहों पर बांध का दूसरा किनारा नहीं दिखाई देता है।
अब जानिए डैम वॉरफेयर क्या होता है?
रक्षा मामलों के जानकार कर्नल (रिटायर्ड) आरसी मेहता कहते हैं, 'जंग में जीत के लिए लोग अलग-अलग तरह की युद्ध रणनीतियां बनती हैं। इसमें दुश्मन पर हमले से लेकर उन्हें रोकने तक की योजना होती है। डैम वॉरफेयर इसी का एक हिस्सा है। ये ऐसी जगहों पर होता है, जहां बांध, नदी या कोई नहर होती है।’
‘बांध पर अचानक हमला करके उसे क्षतिग्रस्त किया जाता है, ताकि दुश्मन की सेना या तो पानी में बह जाए या फिर आगे की राह उसकी प्रभावित हो जाए। इसी तरह नदी और नहर के पानी का रूख भी मोड़कर जंग में फायदा उठाने की कोशिश होती है।'
रक्षा मामलों के जानकार कर्नल (रिटायर्ड) आरसी मेहता कहते हैं, 'जंग में जीत के लिए लोग अलग-अलग तरह की युद्ध रणनीतियां बनती हैं। इसमें दुश्मन पर हमले से लेकर उन्हें रोकने तक की योजना होती है। डैम वॉरफेयर इसी का एक हिस्सा है। ये ऐसी जगहों पर होता है, जहां बांध, नदी या कोई नहर होती है।’
‘बांध पर अचानक हमला करके उसे क्षतिग्रस्त किया जाता है, ताकि दुश्मन की सेना या तो पानी में बह जाए या फिर आगे की राह उसकी प्रभावित हो जाए। इसी तरह नदी और नहर के पानी का रूख भी मोड़कर जंग में फायदा उठाने की कोशिश होती है।'
बांध तोड़कर दुश्मन देशों को परास्त करने की रणनीति है पुरानी
इतिहासकार प्रो. किरण शर्मा बताती हैं कि बांधों को नष्ट करके युद्ध जीतने के कई उदाहरण मिलते हैं। युद्धों के इतिहास पर नजर डालें तो ईरान के राजा साइरस ने युफरेटस नदी की धार को बदलकर अपने सैनिकों को लिए रास्ता बनाया। ऐसा कर साइरस ने एक रात में बेबिलोन को जीत लिया था। तब से दुनिया में डैम वॉरफेयर (बांध युद्ध) की शुरुआत मानी जाती है।
शर्मा के मुताबिक, मंगोलों ने 1200 ईसवी में मध्य एशिया के गुरजांग शहर को एक बांध तोड़कर तबाह कर दिया था। इसमें 10 लाख लोगों की मौत हो गई थी। इसी तरह 1500 ईसवी से 2000 के बीच नीदरलैंड और दक्षिण पश्चिम यूरोप में ज्यादातर बाढ़ जंग के समय ही आई थी। ये बांध युद्ध का ही नतीजा था।
इतिहासकार प्रो. किरण शर्मा बताती हैं कि बांधों को नष्ट करके युद्ध जीतने के कई उदाहरण मिलते हैं। युद्धों के इतिहास पर नजर डालें तो ईरान के राजा साइरस ने युफरेटस नदी की धार को बदलकर अपने सैनिकों को लिए रास्ता बनाया। ऐसा कर साइरस ने एक रात में बेबिलोन को जीत लिया था। तब से दुनिया में डैम वॉरफेयर (बांध युद्ध) की शुरुआत मानी जाती है।
शर्मा के मुताबिक, मंगोलों ने 1200 ईसवी में मध्य एशिया के गुरजांग शहर को एक बांध तोड़कर तबाह कर दिया था। इसमें 10 लाख लोगों की मौत हो गई थी। इसी तरह 1500 ईसवी से 2000 के बीच नीदरलैंड और दक्षिण पश्चिम यूरोप में ज्यादातर बाढ़ जंग के समय ही आई थी। ये बांध युद्ध का ही नतीजा था।
साल 1937 में जापान-चीन युद्ध के समय भी बांध युद्ध का प्रयोग हुआ था। उस दौरान जापान की सेना लगातार ताकतवर हो रही थी। सीमा को लेकर चीन से विवाद गहराता जा रहा था। जब मामला बढ़ा तो जापान ने चीन पर हमला कर दिया। इस जंग को सेकेंड सिनो-जापानीज वॉर कहा जाता है।
जापान की सेना चीन के बड़े हिस्से को जीतते हुए चीन की दूसरी सबसे लंबी येलो नदी के करीब पहुंच गई। अब चीन को डर था कि जापान की सेना शंघाई शहर तक न पहुंच जाए। तब चीन ने जापान की सेना को आगे बढ़ने से रोकने के लिए येलो नदी पर बने अपने सबसे बड़े बांध को तोड़ दिया।
इसमें चीन के एक लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। बांध टूटने के बाद बाढ़ से पूरे इलाके में प्लेग की फैल गया। उधर, कई इलाकों में पानी का संकट भी हो गया। सूखे और प्लेग ने भी लाखों लोगों की जान ले ली।
जापान की सेना चीन के बड़े हिस्से को जीतते हुए चीन की दूसरी सबसे लंबी येलो नदी के करीब पहुंच गई। अब चीन को डर था कि जापान की सेना शंघाई शहर तक न पहुंच जाए। तब चीन ने जापान की सेना को आगे बढ़ने से रोकने के लिए येलो नदी पर बने अपने सबसे बड़े बांध को तोड़ दिया।
इसमें चीन के एक लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। बांध टूटने के बाद बाढ़ से पूरे इलाके में प्लेग की फैल गया। उधर, कई इलाकों में पानी का संकट भी हो गया। सूखे और प्लेग ने भी लाखों लोगों की जान ले ली।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1943 में जर्मनी और ब्रिटेन के बीच भी बांध युद्ध देखने को मिला था। तब जर्मनी की यू- बोट पनडुब्बियां एक के बाद एक ब्रिटिश नौसेना के जहाजों को डुबो रही थीं। जर्मनी के हमलों में 175 युद्धपोत और 3500 मर्चेंट वैसल तबाह हो चुके थे और 72 हजार से ज्यादा सैनिक मारे गए थे। इसका बदला लेने के लिए ब्रिटेन की वायुसेना ने जर्मनी की रूर घाटी में तीन बांधों पर हमला कर दिया। इसमें जर्मनी के हजारों लोगों की मौत हुई।
रूस ने 1941 में भी नाइपर नदी पर बने एक बांध को तबाह किया था। 29 अगस्त 1941 के दिन सोवियत संघ के प्रवक्ता लोजोवस्की ने मीडिया को एक बयान दिया। उन्होंने बताया कि जापोरिजिया में नाइपर नदी पर बने बांध को तबाह कर दिया गया है, ताकि वो नाजियों के हाथ न लगे।
रूस ने 1941 में भी नाइपर नदी पर बने एक बांध को तबाह किया था। 29 अगस्त 1941 के दिन सोवियत संघ के प्रवक्ता लोजोवस्की ने मीडिया को एक बयान दिया। उन्होंने बताया कि जापोरिजिया में नाइपर नदी पर बने बांध को तबाह कर दिया गया है, ताकि वो नाजियों के हाथ न लगे।