रूस की बढ़ेगी ताकत: पुतिन की गैस कूटनीति का उनके विरोधियों के पास कोई जवाब नहीं!
रूस से जर्मनी तक बन रही गैस पाइपलाइन नॉर्ड स्ट्रीम-2 के रास्ते में अब कोई रुकावट नहीं आएगी। ऐसा माना जा रहा है कि इस साल के अंत तक ये पूरी हो जाएगी।
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रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन अपने देश के ऊर्जा संसाधनों का इस्तेमाल रणनीतिक मकसदों से करते रहे हैं। अब उनके इस प्रभाव में और इजाफा होने की संभावना है। विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ पुतिन की शिखर वार्ता से ये साफ हो गया कि रूस से जर्मनी तक बन रही गैस पाइपलाइन नॉर्ड स्ट्रीम-2 के रास्ते में अब कोई रुकावट नहीं है।
इस साल के अंत तक ये पाइपलाइन बन कर तैयार हो जाएगी। बाल्टिक सागर के रास्ते से बनी इस पाइपलाइन के जरिए हर साल 55 अरब क्यूबिक मीटर गैस रूस से जर्मनी भेजी जाएगी। ऐसा बताया जा रहा है कि उससे रूस को 3.2 अरब डॉलर की सालाना आमदनी होगी।
अमेरिका ने लगा दिया था बैन
अमेरिका ने 2019 में इस पाइपलाइन पर प्रतिबंध लगा दिया था। इससे निर्माण और धन जुटाने में रुकावट आई। रूस के कई विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया था कि जब राष्ट्रपति बाइडन और पुतिन की शिखर वार्ता होगी, तब अमेरिका इस प्रतिबंध को हटाने के बदले रूस से यूक्रेन, जॉर्जिया और बेलारूस में अपना दखल बंद करने की मांग करेगा। लेकिन शिखर वार्ता से पहले ही व्हाइट हाउस ने प्रतिबंध हटा लिए। इससे अमेरिका और यूरोप में रूस विरोधी लॉबी को भारी निराशा हुई थी।
यूरोप में बढ़ सकता है पुतिन का प्रभाव
जानकारों के मुताबिक ये पाइपलाइन पुतिन के लिए यूरोप में अपना प्रभाव बढ़ाने का जरिया बन सकती है। इससे यूरोप का एक बड़ा हिस्सा गैस आपूर्ति के लिए रूस पर निर्भर हो जाएगा। इन जानकारों के मुताबिक रूस के प्राकृतिक गैस भंडार का इस्तेमाल पुतिन पहले भी देश के अंदर और बाहर अपना असर बढ़ाने के लिए करते रहे हैँ।
अब उनका ये असर यूरोप भी पहुंच जाएगा। जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि साल 2000 में राष्ट्रपति बनने के साथ ही पुतिन ने ऊर्जा स्रोतों पर सरकारी नियंत्रण कायम करना शुरू कर दिया था। इसी कोशिश में उन्होंने रूस की बड़ी तेल कंपनी गैजप्रोम का राष्ट्रीयकरण किया था।
रूस ने बढ़ाई सैन्य ताकत
पहले हुए कुछ अध्ययनों का ये निष्कर्ष रहा था कि गैस और तेल उद्योग पर सरकारी नियंत्रण बढ़ने के साथ ही पुतिन का रसूख बढ़ा है। 2004 आते-आते पुतिन सरकार रूस के तेल और गैस उत्पादन पर अपना प्रभाव निर्णायक रूप से बढ़ा चुकी थी। तेल और गैस से हुई आमदनी का इस्तेमाल पुतिन सरकार ने रूस की सैनिक ताकत बढ़ाने में किया।
साथ ही पड़ोसी देशों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर वे उन्हें रूस के प्रभाव क्षेत्र में ले आए लेकिन पश्चिमी यूरोप में उनका ऐसा प्रभाव अब तक नहीं है। इसीलिए नॉर्ड स्ट्रीम-2 पाइपलाइन तैयार होने को उस क्षेत्र में इतनी अहमियत दी गई है।
पाइपलाइन पर नाटो के सदस्य देशों में मतभेद
इस पाइपलाइन को लेकर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के सदस्य देशों में पहले ही गहरे मतभेद खड़े हो चुके हैं। पोलैंड, स्वीडन, लिथुआनिया, एस्तोनिया और लातविया गहरी चिंता जता चुके हैँ। उनका कहना है कि रूस इस पाइपलाइन की सुरक्षा के नाम पर अपनी नौ सेना को बाल्टिक सागर में तैनात कर सकता है। उससे पश्चिमी यूरोप में रूस की खुफिया सूचना जुटाने की ताकत भी बढ़ जाएगी।
गौरतलब है कि पुतिन नाटो को रूस की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानते हैँ। विश्लेषकों का कहना है कि नाटो और बाकी यूरोपीय देशों में मतभेद होना सीधे तौर पर रूस के लिए फायदे की बात है। इससे पुतिन को वहां अपनी कूटनीतिक पहल करने का मौका मिलेगा।
यूक्रेन पर बढ़ सकता है रूस का दबदबा
इसके अलावा अब रूस को यूरोप तक गैस पहुंचाने का एक ऐसा रास्ता मिल जाएगा, जो यूक्रेन की सीमा से होकर नहीं गुजरेगा। अब तक रूस को अपने इस विरोधी देश के सीमा क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए यूरोप तक गैस भेजनी पड़ती थी। इसके बदले उस यूक्रेन को तीन अरब डॉलर का सालाना भुगतान करना पड़ता था। आशंका है कि यूक्रेन के ये आमदनी अब खत्म हो जाएगी। इससे यूक्रेन पर उसका दबदबा भी बढ़ेगा। ये पश्चिमी देशों के लिए अच्छी खबर नहीं है। लेकिन पुतिन की गैस कूटनीति के आगे वे फिलहाल दिग्भ्रमित नजर आ रहे हैँ।