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कौन हैं रोहिंग्या प्रवासी और भारत में क्यों हो रही है उनकी चर्चा

Tue, 31 Jul 2018 05:07 PM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Updated Tue, 31 Jul 2018 05:07 PM IST
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Who are Rohingya and what is the History of Rakhine State in Myanmar
रोहिंग्या प्रवासी
सरकार ने लोकसभा में बताया कि भारत में रह रहे कुछ रोहिंग्या प्रवासी गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल हैं। साथ ही यह भी साफ किया कि रोहिंग्या को 'शरणार्थी' का दर्जा नहीं दिया गया है बल्कि वे 'अवैध प्रवासी' हैं। 


आखिर कौन हैं ये रोहिंग्या प्रवासी? ये भारत कैसे पहुंचे और यहां क्यों आए? रोहिंग्या म्यांमार से भागकर बांग्लादेश क्यों जा रहे हैं? इन्हें अब तक म्यांमार में नागरिकता क्यों नहीं मिली? नोबेल विजेता आंग सान सू ची दुनिया भर में मानवाधिकारों के प्रति अपनी मुखर आवाज के लिए जानी जाती हैं। म्यांमार में अब उनकी पार्टी की ही सरकार है फिर भी वह रखाइन प्रांत में रोहिंग्या लोगों पर हो रहे जुल्म पर चुप क्यों हैं? आइए जानते हैं इस बारे में सब कुछ:  

रखाइन प्रांत का इतिहास

रखाइन म्यांमार के उत्तर-पश्चिमी छोर पर बांग्लादेश की सीमा पर बसा एक प्रांत है, जो 36 हजार 762 वर्ग किलोमीटर में फैला है। सितवे इसकी राजधानी है। म्यांमार सरकार की 2014 की जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक रखाइन की कुल आबादी करीब 21 लाख है, जिसमें से 20 लाख बौद्ध हैं। यहां करीब 29 हजार मुसलमान रहते हैं। 

रोहिंग्या कौन हैं

म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की करीब 10 लाख की आबादी को जनगणना में शामिल नहीं किया गया था। रिपोर्ट में इस 10 लाख की आबादी को मूल रूप से इस्लाम धर्म को मानने वाला बताया गया है। जनगणना में शामिल नहीं की गई आबादी को रोहिंग्या मुसलमान माना जाता है। इनके बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। सरकार ने उन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। हालांकि वे पीढ़ियों से म्यांमार में रह रहे हैं। 

रखाइन स्टेट में 2012 से सांप्रदायिक हिंसा जारी है। इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं। बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान आज भी जर्जर कैंपो में रह रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को व्यापक पैमाने पर भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। लाखों की संख्या में बिना दस्तावेज वाले रोहिंग्या बांग्लादेश में रह रहे हैं। इन्होंने दशकों पहले म्यांमार छोड़ दिया था। 

रखाइन से क्यों पलायन कर रहे हैं रोहिंग्या

Who are Rohingya and what is the History of Rakhine State in Myanmar
rohingya
रखाइन प्रांत से क्यों भागे रोहिंग्या

म्यांमार में मौंगडोव सीमा पर 25 अगस्त 2017 को रोहिंग्या चरमपंथियों ने उत्तरी रखाइन में पुलिस नाके पर हमला कर 12 सुरक्षाकर्मियों को मार दिया था। इस हमले के बाद सुरक्षा बलों ने मौंगडोव जिला की सीमा को पूरी तरह से बंद कर दिया और बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया और तब से म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों का पलायन जारी है।

आरोप है कि सेना ने रोहिंग्या मुसलमानों को वहां से खदेड़ने के मकसद से उनके गांव जला दिए और नागरिकों पर हमले किए। इस हिंसा के बाद से अब तक करीब चार लाख रोहिंग्या शरणार्थी सीमा पार करके बांग्लादेश में शरण ले चुके हैं। म्यामांर के सैनिकों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के संगीन आरोप भी लगे। सैनिकों पर प्रताड़ना, बलात्कार और हत्या जैसे आरोप हैं। हालांकि सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था। 

बांग्लादेश ने क्यों जताई कड़ी आपत्ति

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रोहिंग्या शरणार्थी
बांग्लादेश ने विरोध जताया

बांग्लादेश ने रोहिंग्या लोगों के अपने देश में घुसने पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि परेशान लोग सीमा पार कर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में यहां आ रहे हैं। बांग्लादेश ने कहा कि सीमा पर अनुशासन का पालन होना चाहिए। बांग्लादेश अथॉरिटी की तरफ से सीमा पार करने वालों को फिर से म्यांमार वापस भेजा गया।

लेकिन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बांग्लादेश के इस कदम की कड़ी निंदा की और कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है। बांग्लादेश रोहिंग्या मुसलमानों को शरणार्थी के रूप में स्वीकार नहीं करता। रोहिंग्या और शरण चाहने वाले लोग 1970 के दशक से ही म्यांमार से बांग्लादेश आ रहे हैं। 
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नोबेल विजेता आंग सान सू ची क्यों चुप हैं

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आंग सान सू ची
आखिर नोबेल विजेता आंग सान सू ची ने क्यों साधी चुप्पी

म्यांमार में 25 सालों के बाद 2016 में चुनाव हुआ था। इस चुनाव में नोबेल विजेता आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फोर डेमोक्रेसी को भारी जीत मिली थी। संवैधानिक नियमों के कारण वह चुनाव जीतने के बाद भी राष्ट्रपति नहीं बन पाई थीं। सू ची स्टेट काउंसलर की भूमिका में हैं। माना जाता है कि सत्ता की वास्तविक कमान सू ची के हाथों में ही है। हालांकि देश की सुरक्षा सेना के हाथों में है। 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार से सवाल पूछा जा रहा है कि रखाइन प्रांत में पत्रकारों को क्यों नहीं जाने दिया जाता। इस पर म्यांमार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी गलत रिपोर्टिंग की जाती है। यदि सू ची अंतराष्ट्रीय दवाब में झुकती हैं और रखाइन स्टेट को लेकर कोई विश्वसनीय जांच कराती हैं तो उन्हें सेना से टकराव का जोखिम उठाना पड़ सकता है। उनकी सरकार खतरे में आ सकती है। 
आंग सान सू ची पर जब इस मामले में दबाव पड़ा तो उन्होंने कहा था कि रखाइन स्टेट में जो भी हो रहा है वह 'रूल ऑफ लॉ' के तहत है। इस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी आवाज उठ रही है। म्यांमार में रोहिंग्या के प्रति सहानुभूति न के बराबर है। रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ सेना की कार्रवाई का म्यांमार में लोगों ने जमकर समर्थन किया है। 
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संयुक्त राष्ट्र ने की मदद की अपील

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एंटोनियो गुटेरेश
संयुक्त राष्ट्र ने स्थिति पर चिंता जताई है

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने कहा है कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान 'मानवीय आपदा' का सामना कर रहे हैं। गुटेरेश ने कहा कि रोहिंग्या ग्रामीणों के घरों पर सुरक्षा बलों के कथित हमलों को किसी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने म्यांमार से सैन्य कार्रवाई रोकने की भी अपील की थी।

वहीं म्यांमार की सेना ने आम लोगों को निशाना बनाने के आरोप से इनकार करते हुए कहा कि वह चरमपंथियों से लड़ रही है। 

संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी का कहना है कि बांग्लादेश में अस्थायी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को मिल रही मदद नाकाफी है।
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