इसरायल पश्चिमी तट में करेगा और निर्माण

बीबीसी हिंदी Updated Sat, 01 Dec 2012 08:25 AM IST
israel will do more construction in west bank
इसरायल ने कब्जे वाले पूर्व येरुश्लम और पश्चिमी तट में 3000 और रिहाइशी इकाईयां बनाने का फैसला किया है। इसरायली अधिकारियों ने ये भी कहा है कि 1000 इकाईयों की योजनाओं को मंज़ूरी देने की प्रक्रिया भी तेज की जा रही है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में फलस्तीनीयों को ग़ैर-सदस्य पर्यवेक्षक राष्ट्र का दर्जा मिलने के एक दिन बाद इसरायल ने ये कदम उठाया है। इसरायली अखबार हारेट्ज़ के मुताबिक नई रिहाइशी इकाईयों में से कुछ येरुश्लम और माले अदुमिम बस्ती के बीच बनाई जाएंगी।

फलस्तीनी प्राधिकरण ने कहा है कि जब तक इसरायली बस्तियां बनाने पर रोक नहीं लगती, तब तक वो शांति वार्ता में शामिल नहीं होगा।

उधर अमेरिकी अधिकारियों ने इसरायली कदम को प्रतिकूल बताते हुए उसकी निंदा की है। अधिकारियों का कहना है कि इससे शांति वार्ता दोबारा शुरु करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

ई 1 नाम के इलाके में यहूदी बस्तियां बनाने की योजनाओं का फलस्तीनी कड़ा विरोध करते हैं। फलस्तीनियों का कहना है कि इससे पश्चिमी तट दो हिस्सों में बंट जाएगा और एक समूचे फलस्तीनी राष्ट्र के निर्माण में बाधा आएगी।

इसरायल की प्रतिक्रिया
येरुश्लम में मौजूद बीबीसी संवाददाता केविन कॉनली कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा फलस्तीनी प्राधिकरण का दर्जा बढ़ाए जाने के बाद ये कदम इसरायल के ग़ुस्से का पहला संकेत है। वो ये भी कहते हैं कि फलस्तीनियों को इस या इस जैसे ही किसी और कदम की पहले से ही उम्मीद रही होगी। लेकिन इसरायल का ये फैसला एक बार फिर दर्शाता है कि यहूदी बस्तियों के मामले पर दोंनो पक्षों के बीच गहरी खाई है।

नवंबर की शुरुआत में इसरायली विदेश मंत्रालय के एक पत्र में कहा गया था कि फलस्तीनियों की संयुक्त राष्ट्र में पर्यवेक्षक राष्ट्र की मांग पर मतदान, "एक लाल पंक्ति पार करना है जिसके लिए सबसे कठोर इसरायली प्रतिक्रिया ज़रूरी होगी।"

पश्चिमी तट और पूर्व येरुश्लम पर इसरायली कब्जे के बाद से वहां बनाई गई 100 से ज़्यादा बस्तियों में पांच लाख यहूदी रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत ये बस्तियां ग़ैरक़ानूनी हैं लेकिन इसरायल ने हमेशा इससे हमेशा इंकार किया है।

शांति वार्ता पर असर
नया दर्जा मिलने के बाद फलस्तीनी अब संयुक्त राष्ट्र में बहसों में हिस्सा ले सकते हैं और उनके अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय जैसी संस्थाओं में शामिल होने की संभावना भी बढ़ गई है।

फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने कहा था कि ये कदम इसरायल के साथ "दो-राष्ट्र उपाय को बचाने का आखिरी मौका" था।

इस मुद्दे का स्थाई समाधान निकालने के लिए दोंनो पक्षों के बीच दो दशकों से चल रही बातचीत का अब तक कोई नतीजा नहीं निकला है। दोंनो के बीच आखिरी बार वर्ष 2010 में हुई सीधी बातचीत भी बेनतीजा रही थी।

फलस्तीनी वार्ताकार इस बात पर ज़ोर डालते रहे हैं कि कब्जे वाले इलाकों में यहूदी बस्तियां बनना बंद होने के बाद ही वो सीधी बातचीत फिर से शुरु करने के लिए तैयार होंगे। लेकिन इसरायल का कहना है कि बातचीत बिना शर्त होनी चाहिए।

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