{"_id":"5d78ee4a8ebc3e015e1b5b23","slug":"how-chambal-became-fertile","type":"story","status":"publish","title_hn":"चंबल का बीहड़ कैसे बने उपजाऊ, युवाओं की पुरजोर भागीदारी की दरकार","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
चंबल का बीहड़ कैसे बने उपजाऊ, युवाओं की पुरजोर भागीदारी की दरकार
Thu, 12 Sep 2019 03:33 AM IST
भारत डोगरा
भारत डोगरा
भारत डोगरा
Published by: भारत डोगरा
Updated Thu, 12 Sep 2019 03:33 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
चंबल घाटी
चंबल की घाटियां कभी डाकुओं के गिरोहों से त्रस्त थीं। डकैतों के समर्पण के गांधीवादी तरीकों के सफल प्रयासों के बाद चंबल क्षेत्र को डाकुओं के आतंक से तो राहत मिली, पर बीहड़ों की समस्या जस की तस बनी रही। नदियों द्वारा भूमि कटान से वहां बहुत-सी कृषि व चरागाह की भूमि बीहड़ों में परिवर्तित होती रही है, जिससे आम लोगों की आजीविका का संकट बढ़ता गया। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में ही चंबल, क्वारी, आसन, सिंध जैसी नदियों के बहाव में भूमि के कटाव की प्रवृत्ति अधिक है। इससे न केवल ऊपर की उपजाऊ मिट्टी का कटाव होता है, बल्कि बीहड़ भी बनते चले जाते हैं।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
इसका सामना करने के लिए भी ‘महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा’ ने प्रयास किए हैं। वहां के प्रमुख प्रेरणा स्रोत विख्यात गांधीवादी कार्यकर्ता एसएन सुब्बराव ‘भाई जी’ रहे हैं, जिन्होंने ‘राष्ट्रीय सेवा योजना’ (एनएसएस) के कैंप आयोजित कर सैकड़ों युवाओं का श्रमदान बीहड़ों को समतल करने, गांवों में सड़क मार्ग बनाने तथा खेती योग्य भूमि तैयार करने में लगाया। सरकारी स्तर भी पर बीहड़ सुधार द्वारा कृषि योग्य भूमि बनाने का कार्य किया गया। एक समय इसके लिए एक अलग विभाग था, पर बाद में यह कार्य सुस्त पड़ गया।
अब इस काम को फिर से बड़े पैमाने पर आरंभ करने का समय आ गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि क्षेत्र के युवाओं में बेरोजगारी से बढ़ती बेचैनी कम करने के लिए भी इस कार्य का उपयोग हो सकता है। बीहड़ प्रभावित भूमि को सुधार कर इसे युवाओं को रासायनिक खादों, कीटनाशकों और दवाओं से मुक्त जैविक या पर्यावरण की रक्षा करने वाली खेती के लिए दिया जा सकता है। वहां की एक अन्य समस्या यह है कि खेती में रासायनिक खाद व कीटनाशकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इससे किसानों का खर्च बढ़ रहा है और पर्यावरण की क्षति भी हो रही है। अतः बीहड़ों की सुधारी हुई भूमि को जैविक खेती के उदाहरण के रूप में विकसित करना चाहिए। जब आसपास के किसान इस भूमि पर जैविक खेती की सफलता देखेंगे, तो पूरे क्षेत्र में इस तरह की खेती को बढ़ावा मिलेगा।
‘महात्मा गांधी सेवा आश्रम’ के कार्यकर्ता परसराम अनेक वर्षों से वहां के सार्थक प्रयासों से जुड़े रहे हैं। उनका कहना है कि यदि बीहड़ जमीन के समतलीकरण के बाद उन पर जैविक खेती को बढ़ावा मिला, तो यह इस क्षेत्र के लिए वरदान सिद्ध होगा। राजस्थान के धौलपुर में तो रेलवे स्टेशन के पास तक बीहड़ पहुंच चुके हैं। ऐसे में सरकार को बीहड़ सुधारने के साथ-साथ बीहड़ों का प्रसार रोकने व नदियों की मिट्टी व भूमि-कटाव रोकने के लिए अपने प्रयास बढ़ाने होंगे। खासकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सरकारों को तो इस ओर तुरंत ध्यान देना चाहिए।
इस क्षेत्र के विभिन्न सार्थक प्रयासों से नजदीकी तौर पर जुड़े रहे ‘एकता परिषद’ के समन्वयक पीवी राजगोपाल पास के बुधवारी गांव में लंबे समय तक रहे हैं। उस समय बीहड़ सुधार का महत्वपूर्ण कार्य हुआ था। बीहड़ सुधार के आरंभिक समय से ही वहां का भूमि-पट्टा किसी जरूरतमंद परिवार या युवा को मिलना चाहिए, ताकि बीहड़ समाप्त होने के साथ-साथ खेती की दृष्टि से भी सुधार होते जाएं। राजगोपाल का कहना है कि बीहड़ सुधार के बड़े कार्य मशीनों की सहायता से हो सकते हैं, पर इसके साथ-साथ युवाओं के कैंप लगाकर बहुत-सा कार्य श्रमदान द्वारा भी होना चाहिए। इस तरह छात्र भी बीहड़ सुधार के अभियान में जुड़ सकते हैं।