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US: रूस को खतरा सूची से हटाना अमेरिका की शक्ति-संतुलन की स्वीकारोक्ति, चीन अब सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी
Tue, 09 Dec 2025 04:08 AM IST
लव गौर
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: लव गौर
Updated Tue, 09 Dec 2025 04:08 AM IST
सार
अमेरिका ने अपनी सुरक्षा रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। जिसके बाद अब अमेरिका रूस को खतरा नहीं मानेगा। वहीं चीन अब अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है।
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ट्रंप और पुतिन।
- फोटो : PTI
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विस्तार
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में रूस को थ्रेट लिस्ट से हटाकर अमेरिकी विदेश नीति में सबसे बड़ा सामरिक परिवर्तन कर दिया है। व्हाइट हाउस का यह कदम केवल रूस के प्रति नई सोच नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन की स्वीकारोक्ति भी है।
प्रतिष्ठित अमेरिकी थिंक-टैंकों ब्रुकिंग्स, रैंड कॉरपोरेशन और काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (सीएफआर) ने इसे स्पष्ट तौर पर चीन को प्राथमिक प्रतिद्वंद्वी मानने की नीति के रूप में पढ़ा है। यूरोप पर अमेरिका की तीखी टिप्पणी भी इसी रणनीतिक पुनर्संरचना का हिस्सा है। यह बदलाव वाशिंगटन-मॉस्को संबंधों के साथ-साथ नाटो और पूरे ट्रांस-अटलांटिक ढांचे को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित करेगा।
ट्रंप प्रशासन की नई सुरक्षा नीति में रूस को खतरा सूची से हटा दिया गया है। 2014 और 2022 के बाद यह वही रूस था जिसे अमेरिका ने सैन्य रूप से सबसे आक्रामक प्रतिद्वंद्वी माना था। अब नीति में रूस को व्यापार, ऊर्जा और वैश्विक स्थिरता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण राजनयिक भागीदार के रूप में वर्णित किया गया है। मॉस्को ने इस निर्णय का स्वागत किया और इसे व्यावहारिक सामरिक स्वीकारोक्ति बताया।
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रणनीतिक बाध्यताओं के कारण लिया यह फैसला
अमेरिकी विश्लेषक स्पष्ट रूप से कह रहे हैं, अमेरिका यह कदम कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि रणनीतिक बाध्यता और प्राथमिकताओं के कारण उठा रहा है। अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठान इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अमेरिका के सामने वास्तविक और दीर्घकालिक चुनौती चीन है, न कि रूस। चीन आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता, तकनीकी प्रभुत्व, इंडो-पैसिफिक विस्तार और ताइवान संकट को लेकर अमेरिका का मुख्य रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन चुका है। रैंड कॉरपोरेशन, पेंटागन की रिपोर्ट्स और नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी सभी इस बात पर जोर देते हैं कि चीन वह एकमात्र देश है जो अमेरिका की वैश्विक श्रेष्ठता को संरचनात्मक रूप से चुनौती देता है। अमेरिका को एक ही समय में दो मोर्चों पर यदि बड़ा संघर्ष करना पड़े तो उसके लिए मुश्किल होगा।
ये भी पढ़ें: Russia-Ukraine Conflict: लंदन में राष्ट्रपति जेलेंस्की की अहम बैठक, शांति योजना पर यूरोपीय नेताओं की चर्चा तेज
नाटो का भार उठाने में यूरोप की विफलता, अमेरिका को रास नहीं आई
अमेरिकी विश्लेषण का कहना है कि अमेरिका नाटो को लेकर काफी दिनों से तनाव में था।नाटो के भीतर यह असंतोष वर्षों से जमा था। अमेरिका रक्षा खर्च का बड़ा हिस्सा उठाता है, जबकि ज्यादातर यूरोपीय देश अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने में विफल रहे हैं। पेंटागन के पूर्व रणनीतिक अधिकारियों का कहना है, यूक्रेन युद्ध ने साबित कर दिया कि यूरोप सामरिक रूप से अमेरिका पर निर्भर है और अमेरिका को अकेले युद्ध का बोझ उठाना पड़ता है। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका अब अपनी ऊर्जा रूस-विरोध में खर्च नहीं करना चाहता।
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प्रतिष्ठित अमेरिकी थिंक-टैंकों ब्रुकिंग्स, रैंड कॉरपोरेशन और काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (सीएफआर) ने इसे स्पष्ट तौर पर चीन को प्राथमिक प्रतिद्वंद्वी मानने की नीति के रूप में पढ़ा है। यूरोप पर अमेरिका की तीखी टिप्पणी भी इसी रणनीतिक पुनर्संरचना का हिस्सा है। यह बदलाव वाशिंगटन-मॉस्को संबंधों के साथ-साथ नाटो और पूरे ट्रांस-अटलांटिक ढांचे को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित करेगा।
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ट्रंप प्रशासन की नई सुरक्षा नीति में रूस को खतरा सूची से हटा दिया गया है। 2014 और 2022 के बाद यह वही रूस था जिसे अमेरिका ने सैन्य रूप से सबसे आक्रामक प्रतिद्वंद्वी माना था। अब नीति में रूस को व्यापार, ऊर्जा और वैश्विक स्थिरता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण राजनयिक भागीदार के रूप में वर्णित किया गया है। मॉस्को ने इस निर्णय का स्वागत किया और इसे व्यावहारिक सामरिक स्वीकारोक्ति बताया।
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रणनीतिक बाध्यताओं के कारण लिया यह फैसला
अमेरिकी विश्लेषक स्पष्ट रूप से कह रहे हैं, अमेरिका यह कदम कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि रणनीतिक बाध्यता और प्राथमिकताओं के कारण उठा रहा है। अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठान इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अमेरिका के सामने वास्तविक और दीर्घकालिक चुनौती चीन है, न कि रूस। चीन आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता, तकनीकी प्रभुत्व, इंडो-पैसिफिक विस्तार और ताइवान संकट को लेकर अमेरिका का मुख्य रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन चुका है। रैंड कॉरपोरेशन, पेंटागन की रिपोर्ट्स और नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी सभी इस बात पर जोर देते हैं कि चीन वह एकमात्र देश है जो अमेरिका की वैश्विक श्रेष्ठता को संरचनात्मक रूप से चुनौती देता है। अमेरिका को एक ही समय में दो मोर्चों पर यदि बड़ा संघर्ष करना पड़े तो उसके लिए मुश्किल होगा।
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नाटो का भार उठाने में यूरोप की विफलता, अमेरिका को रास नहीं आई
अमेरिकी विश्लेषण का कहना है कि अमेरिका नाटो को लेकर काफी दिनों से तनाव में था।नाटो के भीतर यह असंतोष वर्षों से जमा था। अमेरिका रक्षा खर्च का बड़ा हिस्सा उठाता है, जबकि ज्यादातर यूरोपीय देश अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने में विफल रहे हैं। पेंटागन के पूर्व रणनीतिक अधिकारियों का कहना है, यूक्रेन युद्ध ने साबित कर दिया कि यूरोप सामरिक रूप से अमेरिका पर निर्भर है और अमेरिका को अकेले युद्ध का बोझ उठाना पड़ता है। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका अब अपनी ऊर्जा रूस-विरोध में खर्च नहीं करना चाहता।
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