अफगानिस्तान में हुए बदलावों का असर: अमेरिका का सहारा हटा, तो बदलने लगे पश्चिम एशिया में आपसी रिश्ते
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राजनीतिक टीकाकार अब्दुलखलीक अब्दुल्ला ने एक टिप्पणी में लिखा है- ‘अफगानिस्तान से अमेरिकी जल्दबाजी में हुई वापसी, काबुल में तालिबान की धमाकेदार वापसी, और ईरानी खतरे में इजाफे से संकेत मिलता है कि अब इस सदी में खाड़ी देशों के सुरक्षा समीकरण बिल्कुल अलग किस्म के होंगे।’
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अफगानिस्तान में हाल आए बदलावों का पश्चिम एशिया पर गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है। विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान हालांकि पश्चिम एशिया का हिस्सा नहीं है, लेकिन वहां के घटनाक्रम से पश्चिम एशिया हमेशा प्रभावित होता रहा है। इन जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि 2001 में अफगानिस्तान पर हमले के साथ अमेरिका ने ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ की शुरुआत की, तो उसकी जद में पूरा पश्चिम एशिया आ गया था।
अब अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी के बाद भी इस क्षेत्र में कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इस इलाके में अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान को गंभीरता से लिया गया है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी के साथ दूसरे देशों का राजनीतिक ढांचा बदलने के लिए होने वाले सैनिक अभियानों का युग समाप्त हो गया है। इसका मतलब यह समझा गया है कि अब अमेरिका किसी दूसरे देश की सुरक्षा जरूरत को पूरा नहीं करेगा। इस मामले में उन्हें आत्म-निर्भर होना होगा। जानकारों का कहना है कि इस अमेरिकी नीति से पश्चिम एशिया में सारे समीकरण बदल जाएंगे।
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राजनीतिक टीकाकार अब्दुलखलीक अब्दुल्ला ने एक टिप्पणी में लिखा है- ‘अफगानिस्तान से अमेरिकी जल्दबाजी में हुई वापसी, काबुल में तालिबान की धमाकेदार वापसी, और ईरानी खतरे में इजाफे से संकेत मिलता है कि अब इस सदी में खाड़ी देशों के सुरक्षा समीकरण बिल्कुल अलग किस्म के होंगे।’ अब्दुल्ला को अबू धाबी के युवराज मोहम्मद बिन ज़ायद का करीबी माना जाता है। उन्होंने लिखा है- ‘खाड़ी क्षेत्र बड़े सुरक्षा और सैनिक बदलाव के मुहाने पर है। यह बदलाव 1971 के बाद का सबसे बड़ा बदलाव होगा, जब अमेरिका ने इस इलाके की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल ली थी और इस क्षेत्र को ‘अमेरिकी खाड़ी’ में तब्दील कर दिया था। लेकिन आने वाले दशकों में अब ये सूरत नहीं रह जाएगी।’
नए बने हालात को लेकर पश्चिम एशिया में मोटे तौर पर दो तरह की राय उभरी है। उनमें एक यह है कि नई स्थितियों के बीच अब खाड़ी में मौजूद अरब देश ईरानी खतरे का मुकाबला करने के मकसद से इस्राइल के ज्यादा करीब चले जाएंगे। दूसरी राय यह है कि अमेरिका का सहारा न रहने के बाद अब खाड़ी देशों और ईरान के बीच मेलमिलाप की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि 2019 में जब सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर ड्रोन हमले हुए और उस पर अमेरिका ने कोई कार्रवाई नहीं की, तभी संकेत मिल गया था कि अब अमेरिका पहले जैसा हस्तक्षेप नहीं करेगा। इन हमलों के लिए सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देशों ने ईरान को दोषी माना था।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक पश्चिम एशियाई देशों के रिश्तों में बदलाव के संकेत अभी से मिलने लगे हैं। यूएई ने टर्की और कतर से उच्चस्तरीय बातचीत की है, जबकि पहले उसने आरोप लगाया था कि ये दोनों देश आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं। सऊदी अरब ने भी इन देशों से रिश्ते सुधारने की कोशिश की है। पिछले हफ्ते इराक की राजधानी बगदाद में एक क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन हुआ। उसी दौरान ईरान के नए विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियान की यूएई के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन राशिद से मुलाकात हुई। इसे वहां हुई सबसे अहम घटना बताया गया।