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तेल निर्यातक देशों के समूह से अलग होगा कतर, 60 साल से था समूह का सदस्य

Thu, 13 Dec 2018 07:33 PM IST
वर्ल्ड डेसक, अमर उजाला
वर्ल्ड डेसक, अमर उजाला Updated Thu, 13 Dec 2018 07:33 PM IST
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Qatar will Not be Member OF OPEC group from 2019
opec

कतर करीब 60 वर्षों तक आर्गेनाइजेशन ऑफ दि पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपीईसी) का सदस्य रहने के बाद अब अगले महीने से समूह से बाहर होने का निर्णय लिया है। घोषणा के मुताबिक तेल संपन्न कतर पहली जनवरी, 2019 में  ओपीईसी से बाहर हो जाएगा।

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कतर अब नेचुरल गैस के उत्पादन पर ज्यादा जोर देगा। फिलहाल कतर में सालाना नैचुरल गैस का उत्पादन 77 मिलियन टन होता है, जिसे आने वाले दिनों में बढ़ा कर 110 मिलियन किए जाने की योजना है। बता दें कि कतर लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) का सबसे पड़ा सप्लायर है। दुनियाभर के करीब 30 फीसदी एलएनजी  का उत्पादन यहीं होता है। 

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आइए जानते हैं ओपेक के तेल उत्पादन और उससे जुड़ी बातें 


आखिर ऐसा क्या हुआ कि कतर ने ये कदम उठाया

पहले जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि कतर को यह कदम उठाना पड़ा। सऊदी अरब के दबदबे के बीच 1961 में इस समूह में शामिल हुए कतर ने ओपेक से बाहर निकलने का कदम अप्रत्याशित है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि कतर 60 साल तक समूह का सदस्य रहने के बाद अचानक उसे यह कदम उठाना पड़ा। जानकार बताते हैं कि कतर पर सऊदी अरब के साथ बिगड़े रिश्ते का असर पड़ रहा था।

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कतर के ओपेक छोड़ने का बड़ा कारण सऊदी अरब की अगुवाई में कुछ खाड़ी देशों द्वारा उससे दूरी बना लेना तो है ही, लेकिन उसका यह फैसला कुछ और भी इशारा कर रहा है।
लगातार तेल उत्पादन और कीमत निर्धारण के साथ-साथ दुनियाभर के देशों का स्वच्छ ईंधन की तरफ आकर्षण को देखते हुए कतर ने आखिर इससे निकलने का फैसला लिया। ओपेक ने पिछले वर्ष करीब 44 फीसदी का ही उत्पादन किया।

 ओपेक की तेल बाजार में क्या है भूमिका 

द ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) उन देशों की संस्था है जहां बड़ी मात्रा में तेल का उत्पादन किया जाता है। वर्ष 1960 में इसका गठन तेल उत्पादन एवं तेल के कीमत-निर्धारण जैसे मामलों पर तेल कंपनियों से बातचीत के लिए किया गया था। साल 2017 में दुनियाभर के कुल तेल के खजाने का 82% हिस्सा ओपेक सदस्य देशों के पास था। 

 हथियार के रूप में इस्तेमाल होता है तेल  

ओपेक का मकसद सदस्य देशों के हितों की रक्षा करना और तेल निर्यात पर लाभ बढ़ाना है। हालांकि ऐसा कहा जाता है कि  ओपेक पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्ते निर्धारित करने में तेल को हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। मिसाल के तौर पर साल 1973 में इजरायल का सीरिया एवं मिस्र के साथ योम किप्पूर युद्ध होने के बाद ओपेक ने उन पश्चिमी देशों को तेल बेचने से इनकार कर दिया, जिन्होंने युद्ध में इजरायल का समर्थन किया था। ओपेक के इस कदम से तेल संकट पैदा हो गया था और तेल की कीमतें चार गुना बढ़ गईं। यही वजह है कि अमेरिका ने पश्चिम एशियाई राजनीति में दखलअंदाजी बढ़ा दी और सऊदी अरब के साथ रिश्ता पक्का कर लिया। 

आखिर ओपेक से क्यों निकला कतर? 

सऊदी अरब से बिगड़े रिश्ते का असर सीधे तौर पर कतर पर पड़ रहा है। हालांकि कतर ओपेक देशों के कुल तेल उत्पादन में महज 2% का योगदान करता है, लेकिन कतर प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा निर्यातक है। यही वजह है कि ओपेक से निकलने के बाद वह प्राकृतिक गैस उत्पादन पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहता है।  

तेल उत्पादन की दौड़ में अमेरिका अग्रणी 

ओपेक का ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर दबदबा धीरे-धीरे कम हो रहा है। 1970 के दशक की तुलना में अब न्यूनतम स्तर पर है। इसकी वजह यह है कि अब वाहनों के लिए सिर्फ पेट्रोलियम ही एकमात्र ईंधन का साधन नहीं रह गया है। ऊपर से कच्चे तेल का 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाने से अमेरिकी शेल ऑयल प्रॉडक्शन के लिए वरदान साबित हुआ। एक और खास बात यह कि अमेरिका ने भी दिसंबर माह से ही तेल का निर्यात करना शुरू कर दिया है, हालांकि अभी वह इतना बड़ा निर्यातक नहीं है कि ओपेक के कम तेल उत्पादन की भरपाई कर सके। लेकिन आंकलनों के मुताबिक भविष्य में अमेरिका तेल उत्पादन के मामले में जल्द ही सऊदी अरब और रूस, दोनों को पीछे छोड़ देगा। 

ये देश निकले, फिर सदस्य बने 

1960 में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने ओपेक की स्थापना की थी। लेकिन समय समय पर कई देश इसमें शामिल होते गए और अलग भी हुए। अभी ओपेक में 15 सदस्य देश बचे हैं। इक्वाडोर ने 1992 में अपनी सदस्यता वापस ली थी, लेकिन 2007 में फिर से सदस्य बन गया। इंडोनेशिया 2009 में ओपेक से निकला और 2016 में दोबारा सदस्य बन गया। हालांकि, 2016 के आखिर तक यह उसने फिर ओपेक को अलविदा कह दिया। वहीं, गैबन जनवरी 1995 में सदस्यता वापस लेकर जुलाई 2016 में ओपेक से दोबारा जुड़ गया। 

भारत पर भी होगा इसका असर? 

भारत के कतर से अच्छे संबंध हैं और ओपेक में सऊदी अरब से भी रिश्ते अच्छे हैं। हमारा देश कच्चा तेल सऊदी अरब से आयात करता है और कतर एलएनजी का बड़ा उत्पादक देश है। भारत अपने देश में होने वाली एलएनजी की कुल जरूरत का 65% हिस्सा कतर से लेता है, क्योंकि यह एलएनजी भी हमारी इकोनॉमी का महत्वपूर्ण भाग है। इसलिए इस मामले में हमारे देश के राजनीतिज्ञ  संतुलित नीति अपनाने की ओर ध्यान दे रहे हैं जिससे हमारा एक तरफ तो ओपेक से भी संबंध अच्छा बना रहा दूसरी ओर कतर से भी संबंध न बिगड़े।  


 
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