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पाकिस्तान में प्रेस की आजादी पर गहराया संकट?: न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार का पहला पन्ना रहा खाली, सरकार पर उठे सवाल

Sat, 25 Apr 2026 05:02 PM IST
Himanshu Singh Chandel वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद Published by: Himanshu Singh Chandel Updated Sat, 25 Apr 2026 05:02 PM IST
सार

क्या खुद को शांतिदूत बताने वाला पाकिस्तान अपनी ही आवाम के गुस्से से खौफजदा है? आखिर 'न्यूयॉर्क टाइम्स' की उस खबर में ऐसा क्या था, जिसे पाकिस्तानी हुकूमत ने छपने नहीं दिया? क्या सरकार अपनी दोहरी कूटनीति को दुनिया से छिपाना चाहती है? आइए, इस खबर में सभी सवालों के जवाब को विस्तार से समझते हैं।

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Press Freedom Crisis Pakistan Front Page of nyt Newspaper Left Blank Questions Raised Over Government
पाकिस्तान का दोहरा चरित्र फिर उजागर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

खुद को शांति दूत बताने वाले पाकिस्तान की पोल एक बार फिर खुल गई है। अमेरिका ईरान युद्ध के बीच सुलह कराने के लिए बेताब पाकिस्तान अपनी दुनिया के सामने अपनी चमक दिखाने के लिए खुद की आवाम को भी नहीं छोड़ रहा। इतना ही नहीं, हद तो तब हो गई। जब पाकिस्तान की हुकूमत ने खुद को किरकिरी से बचाने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स की एक खबर को छपने से रुकवा दिया। इसके बाद उस अंतर्राष्ट्रीय अखबार ने खबर की जगह खाली पन्ना छोड़ दिया। पाकिस्तान की एक महिला पत्रकार ने अखबार एक्स पर उसकी तस्वीर साझा कर दी। इसके बाद से सोशल मीडिया पर वह तस्वीर बहुत तेजी से वायरल होने लगी। ऐसे में इस रिपोर्ट में जानेंगे कि आखिर इस रिपोर्ट में क्या था। क्यों पाकिस्तानी हुकूमत ने इसे छपने से रुकवाया? 
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पत्रकार अलिफिया सोहेल द्वारा शेयर की गई एक पोस्ट में बताया गया है कि अखबार के जिस हिस्से को खाली छोड़ा गया है, वहां पहले एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट छपी थी। यह रिपोर्ट इस बारे में थी कि पाकिस्तान का शिया समुदाय अमेरिका और इस्राइल के बीच चल रहे संघर्ष और देश के कूटनीतिक रुख को किस नजरिए से देखता है। दावे में कहा गया है कि अधिकारियों ने इस विवादास्पद खबर को आम लोगों तक पहुंचने से रोकने के लिए इसे अखबार से हटवा दिया। वायरल तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि मुख्य सुर्खियों और तस्वीरों के ठीक नीचे एक बड़ी जगह खाली है, जबकि बाकी पन्ने पर ईरान और यूक्रेन जैसे वैश्विक मुद्दों की खबरें मौजूद हैं।
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वह रिपोर्ट जिसे पाकिस्तान में नहीं छपने दिया
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की जिस रिपोर्ट को पाकिस्तान में छापने से रोका गया, वह मुख्य रूप से पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध को लेकर पाकिस्तान के शिया समुदाय के बढ़ते गुस्से पर केंद्रित थी। जिया उर रहमान द्वारा लिखित इस रिपोर्ट में बताया गया था कि एक तरफ पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच शांतिदूत बनने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह अपने ही देश में इस युद्ध के दुष्प्रभावों को संभालने में संघर्ष कर रहा है। रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया था कि पाकिस्तान के लगभग 3.5 करोड़ शिया मुसलमानों में असंतोष गहराता जा रहा है और यह युद्ध देश में महंगाई और बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा बन गया है। 
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इसके अलावा, इस लेख में युद्ध के कारण पाकिस्तान में फिर से सांप्रदायिक हिंसा भड़कने की आशंका जताई गई थी। रिपोर्ट में उन घटनाओं का विशेष रूप से जिक्र था जब अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद पूरे पाकिस्तान में हिंसक प्रदर्शन हुए थे। इसमें कराची में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर प्रदर्शनकारियों का हमला (जिसमें मरीन कमांडो की फायरिंग में 10 लोग मारे गए), इस्लामाबाद में राजनयिक क्षेत्र की ओर मार्च और स्कार्दू में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय की इमारत में आगजनी जैसी घटनाओं का विवरण शामिल था, जो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई हैं।

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सरकार ने इस खबर को पाकिस्तान में क्यों नहीं छपने दिया?

सांप्रदायिक हिंसा भड़कने का डर...
पाकिस्तान में शिया आबादी लगभग 15 प्रतिशत है और वहां सांप्रदायिक हिंसा का एक लंबा इतिहास रहा है। सरकार को डर था कि शिया समुदाय के गुस्से और नाराजगी को उजागर करने वाली यह रिपोर्ट देश में फिर से सांप्रदायिक तनाव और हिंसा को भड़का सकती है।

सेना और धर्मगुरुओं के बीच के टकराव को छिपाना...
इस खबर के पीछे का घटनाक्रम सीधे तौर पर पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर और शिया धर्मगुरुओं के बीच के विवाद से जुड़ा था। सेना प्रमुख ने शिया मौलवियों से कहा था कि "अगर आपको ईरान से इतना प्यार है, तो ईरान चले जाओ।" इसके जवाब में मौलवियों ने सेना पर अमेरिका और इस्राइल के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया था। सरकार सेना की इस आलोचना को आम जनता तक नहीं पहुंचने देना चाहती थी।

विदेशी कूटनीति और दोहरी नीति का पर्दाफाश...
एक तरफ पाकिस्तान अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता योजनाओं में शामिल होकर सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गुट की ओर झुक रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह घरेलू स्तर पर खुद को तटस्थ दिखाने की कोशिश कर रहा है। यह रिपोर्ट सरकार की इस विदेश नीति के खिलाफ घरेलू स्तर पर हो रहे भारी विरोध को उजागर कर रही थी।


आंतरिक सुरक्षा की विफलताएं...
लेख में पूरे पाकिस्तान में हुए हिंसक प्रदर्शनों (जैसे कराची और स्कार्दू की घटनाएं) का विस्तार से जिक्र था। इन घटनाओं को अखबार के पहले पन्ने पर छापने से देश की कानून-व्यवस्था की नाकामी और सरकार की कमजोरी सीधे तौर पर जनता के सामने आ जाती। सेना प्रमुख की यह चेतावनी कि 'किसी दूसरे देश की घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी', इसी डर को दर्शाती है।
 
क्या सरकार या अखबार ने इस पर कोई जवाब दिया?
इस पूरे विवाद पर अभी तक न तो पाकिस्तानी अधिकारियों की तरफ से और न ही 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने आया है। अभी यह भी साफ नहीं हो पाया है कि क्या खाली पन्ने वाला यह अखबार पूरे पाकिस्तान में बांटा गया है या फिर यह सिर्फ कुछ ही इलाकों तक सीमित था। मीडिया जानकारों का कहना है कि अगर यह दावा सच साबित होता है, तो यह प्रेस की आजादी और सामग्री पर नियंत्रण से जुड़ी पुरानी चिंताओं को फिर से सही साबित करेगा। पाकिस्तान को पहले भी धर्म, विदेश नीति और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर पत्रकारिता को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ा है।

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