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Nepal Citizenship Bill: राष्ट्रपति ने नागरिकता बिल लौटाया, अब देउबा सरकार के आगे नई चुनौती
Tue, 16 Aug 2022 03:25 PM IST
शक्तिराज सिंह
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
Published by: शक्तिराज सिंह
Updated Tue, 16 Aug 2022 03:25 PM IST
सार
इस बिल पर राष्ट्रपति के दस्तखत में हो रही देर से देश में आशंकाएं पैदा हुई थीं। नेपाल के संविधान के मुताबिक संसद से पारित किसी बिल का अध्ययन करने के लिए राष्ट्रपति 15 तक दस्तखत टाल सकते हैं।
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sher bahadur deuba
- फोटो : pti
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विस्तार
नेपाल में बहुचर्चित नागरिकता कानून संशोधन बिल को वापस संसद को लौटा देने के राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के कदम से नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन के लिए नई समस्या खड़ी हो गई है। राष्ट्रपति भंडारी ने संसद से पारित बिल पर दस्तखत करने के बजाय पुनर्विचार करने का अनुरोध करते हुए उसे संसद को लौटा दिया है। संसद से पास होने के बाद इस बिल को प्रतिनिधि सभा के स्पीकर ने पिछले 31 जुलाई को राष्ट्रपति की मुहर के लिए उनके पास भेजा था।
संसद में इस बिल का मुख्य विपक्षी दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) ने विरोध किया था। राष्ट्रपति के कदम को उसके रुख की पुष्टि की रूप में देखा जा रहा है। शेर बहादुर देउबा की गठबंधन सरकार को उम्मीद थी कि इस बिल के कानून का रूप लेने पर उसे खास कर देश के मधेस इलाके में बड़ा सियासी फायदा मिलेगा। मधेस इलाके की पार्टियां देश में नया संविधान बनने के बाद से नागरिकता कानून में बदलाव की मांग कर रही थीं।
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संसद में इस बिल का मुख्य विपक्षी दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) ने विरोध किया था। राष्ट्रपति के कदम को उसके रुख की पुष्टि की रूप में देखा जा रहा है। शेर बहादुर देउबा की गठबंधन सरकार को उम्मीद थी कि इस बिल के कानून का रूप लेने पर उसे खास कर देश के मधेस इलाके में बड़ा सियासी फायदा मिलेगा। मधेस इलाके की पार्टियां देश में नया संविधान बनने के बाद से नागरिकता कानून में बदलाव की मांग कर रही थीं।
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राष्ट्रपति ने बिल पर 15 चिंताएं जताई
पर्यवेक्षकों के मुताबिक इस बिल पर राष्ट्रपति के दस्तखत में हो रही देर से देश में आशंकाएं पैदा हुई थीं। नेपाल के संविधान के मुताबिक संसद से पारित किसी बिल का अध्ययन करने के लिए राष्ट्रपति 15 तक दस्तखत टाल सकते हैं। उसके बाद या तो उन्हें दस्तखत करना होगा, या फिर पुनर्विचार के लिए संसद को लौटाना होगा। राष्ट्रपति भंडारी ने ये अवधि पूरी होने से पहले बिल को वापस संसद को भेज दिया। राष्ट्रपति भवन के सूत्रों ने मीडिया को बताया है कि राष्ट्रपति ने बिल पर अपनी 15 चिंताएं जताई हैं। उन्होंने संसद से उन चिंताओं पर विचार करने का अनुरोध किया है।
चुनाव से पहले सरकार के सामने बड़ी चुनौती
संसदीय सूत्रों ने बताया है कि संविधान के मुताबिक संसद चाहे तो राष्ट्रपति की चिंताओं को ठुकरा सकती है। संसद अब जिस रूप में भी दोबारा विधेयक पास करेगी, उस पर राष्ट्रपति को 15 दिन के अंदर दस्तखत करना होगा। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि ये संवैधानिक प्रावधान है। बिल को लौटा देने से जो राजनीतिक सवाल उठे हैं, अब सत्ता पक्ष को जनता के बीच उन पर जवाब देना होगा। जिस समय देश आम चुनाव की तैयारी में है, सत्ता पक्ष के सामने ये नई चुनौती खड़ी हो गई है। नेपाल में संघीय और प्रांतीय विधायिकाओं के लिए मतदान अगले 20 नवंबर को होगा।
इस बिल से हजारों बच्चों को होगा फायदा
इस बिल के कानून बन जाने से ऐसे हजारों बच्चों को देश की नागरिकता मिलती, जिनके माताएं शादी के वक्त विदेशी थीं। इसके अलावा उन नेपाली महिलाओं से जन्मे बच्चों को भी नागरिकता मिल जाती, जिनके पिता की पहचान नहीं हो सकी है। राष्ट्रपति भंडारी ने कहा है कि इस बिल में शामिल प्रावधान नेपाली संविधान के अनुच्छेदों 38 और 39 के खिलाफ जाते हैं, जिनके तहत बच्चों के मौलिक अधिकार और माताओं के सुरक्षित मातृत्व एवं प्रजनन अधिकारों को सुनिश्चित किया गया है। राष्ट्रपति ने कहा है कि मधेसी समुदाय की नागरिकता संबंधी चिंताओँ का स्थायी समाधान निकाला जाना चाहिए। लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि नागरिकता सिर्फ मधेसी समुदाय का मुद्दा नहीं है।
कानून मंत्री गोविंद बांदी ने कहा है कि राष्ट्रपति ने अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल किया है। उन्होंने कहा- ‘अब सारी प्रक्रिया नए सिरे से शुरू होगी। राष्ट्रपति की तरफ से उठाए गए मुद्दों के बारे में निर्णय करना संसद के अधिकार क्षेत्र में है।’
पर्यवेक्षकों के मुताबिक इस बिल पर राष्ट्रपति के दस्तखत में हो रही देर से देश में आशंकाएं पैदा हुई थीं। नेपाल के संविधान के मुताबिक संसद से पारित किसी बिल का अध्ययन करने के लिए राष्ट्रपति 15 तक दस्तखत टाल सकते हैं। उसके बाद या तो उन्हें दस्तखत करना होगा, या फिर पुनर्विचार के लिए संसद को लौटाना होगा। राष्ट्रपति भंडारी ने ये अवधि पूरी होने से पहले बिल को वापस संसद को भेज दिया। राष्ट्रपति भवन के सूत्रों ने मीडिया को बताया है कि राष्ट्रपति ने बिल पर अपनी 15 चिंताएं जताई हैं। उन्होंने संसद से उन चिंताओं पर विचार करने का अनुरोध किया है।
चुनाव से पहले सरकार के सामने बड़ी चुनौती
संसदीय सूत्रों ने बताया है कि संविधान के मुताबिक संसद चाहे तो राष्ट्रपति की चिंताओं को ठुकरा सकती है। संसद अब जिस रूप में भी दोबारा विधेयक पास करेगी, उस पर राष्ट्रपति को 15 दिन के अंदर दस्तखत करना होगा। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि ये संवैधानिक प्रावधान है। बिल को लौटा देने से जो राजनीतिक सवाल उठे हैं, अब सत्ता पक्ष को जनता के बीच उन पर जवाब देना होगा। जिस समय देश आम चुनाव की तैयारी में है, सत्ता पक्ष के सामने ये नई चुनौती खड़ी हो गई है। नेपाल में संघीय और प्रांतीय विधायिकाओं के लिए मतदान अगले 20 नवंबर को होगा।
इस बिल से हजारों बच्चों को होगा फायदा
इस बिल के कानून बन जाने से ऐसे हजारों बच्चों को देश की नागरिकता मिलती, जिनके माताएं शादी के वक्त विदेशी थीं। इसके अलावा उन नेपाली महिलाओं से जन्मे बच्चों को भी नागरिकता मिल जाती, जिनके पिता की पहचान नहीं हो सकी है। राष्ट्रपति भंडारी ने कहा है कि इस बिल में शामिल प्रावधान नेपाली संविधान के अनुच्छेदों 38 और 39 के खिलाफ जाते हैं, जिनके तहत बच्चों के मौलिक अधिकार और माताओं के सुरक्षित मातृत्व एवं प्रजनन अधिकारों को सुनिश्चित किया गया है। राष्ट्रपति ने कहा है कि मधेसी समुदाय की नागरिकता संबंधी चिंताओँ का स्थायी समाधान निकाला जाना चाहिए। लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि नागरिकता सिर्फ मधेसी समुदाय का मुद्दा नहीं है।
कानून मंत्री गोविंद बांदी ने कहा है कि राष्ट्रपति ने अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल किया है। उन्होंने कहा- ‘अब सारी प्रक्रिया नए सिरे से शुरू होगी। राष्ट्रपति की तरफ से उठाए गए मुद्दों के बारे में निर्णय करना संसद के अधिकार क्षेत्र में है।’