ऑस्ट्रेलिया में चुनाव: आखिर शी जिनपिंग की तस्वीरों से क्यों पट गए हैं चुनावी पोस्टर?
अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक जिस तरह चुनाव प्रचार पर चीन का मुद्दा छाया हुआ है, उससे जाहिर है कि पिछले तीन साल में ऑस्ट्रेलिया से उसके संबंध किस हद तक बिगड़ चुके हैं। इस चुनाव में लिबरल पार्टी और नेशनल पार्टी के गठबंधन का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन अपनी कुर्सी बचाने की कोशिश में जुटे हुए हैं...
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ऑस्ट्रेलिया के आम चुनाव में राजनीतिक दलों के पोस्टरों पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का फोटो छाया हुआ है। विश्लेषकों के मुताबिक यह इस बात का संकेत है कि इस बार के चुनाव में राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बन कर उभरा है। इस बहस के दौरान चीन को ऑस्ट्रेलिया के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया गया है। विपक्षी लेबर पार्टी के नेता एंथनी अल्बानीज ने एक चुनावी भाषण मे कहा- ‘शी जिनपिंग ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के स्वरूप को बदल दिया है। अब ये पार्टी अधिक आक्रामक हो गई है। इसका ऑस्ट्रेलिया पर निश्चित प्रभाव पड़ेगा। इसलिए ऑस्ट्रेलिया को इसका जवाब अवश्य देना चाहिए।’
फिलहाल, चुनाव-पूर्व जनमत सर्वेक्षणों में लेबर पार्टी आगे चल रही है। अगर ये अनुमान सही साबित हुए तो 2013 के बाद पहली बार ऑस्ट्रेलिया में लेबर पार्टी की सरकार बनेगी। ऑस्ट्रेलिया में संसद के 151 सदस्यों वाले निचले सदन- हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव के चुनाव के लिए मतदान 21 मई को होगा।
युद्ध के लिए तैयार रहे आस्ट्रेलिया
अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक जिस तरह चुनाव प्रचार पर चीन का मुद्दा छाया हुआ है, उससे जाहिर है कि पिछले तीन साल में ऑस्ट्रेलिया से उसके संबंध किस हद तक बिगड़ चुके हैं। इस चुनाव में लिबरल पार्टी और नेशनल पार्टी के गठबंधन का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन अपनी कुर्सी बचाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक उन्होंने ही चीन को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। उन्होंने लेबर पार्टी पर चीन के प्रति नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया है। मॉरिसन ने अपनी हर चुनाव सभा में कहा है कि ऑस्ट्रेलिया को युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए।
मॉरिसन के इस आक्रामक रुख के जवाब में लेबर पार्टी ने भी उग्र चीन विरोधी रुख अपनाया है। राजनीति शास्त्रियों के मुताबिक अब दोनों पार्टियों में चीन के मुद्दे पर कोई अंतर नहीं बचा है। लेबर पार्टी ने भी कहा है कि वह ऑकुस (ऑस्ट्रेलिया-यूनाइटेड किंग्डम- यूनाइटेड स्टेट्स) सैन्य संधि को जारी रखेगी। अल्बानीज ने क्वाड्रैंगुलर सिक्योरिटी डायलॉग (क्वैड) का भी समर्थन किया है। ये दोनों अंतरराष्ट्रीय समूह मॉरिसन के शासनकाल में बने हैं और इन्हें चीन विरोधी समझा जाता है।
सोलोमन आइलैंड्स का चीन के साथ समझौता
ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक लॉवी इंस्टीट्यूट के एक सर्वे के मुताबिक ऑस्ट्रेलियाई जनमत का बहुत बड़ा हिस्सा अब चीन के प्रति नकारात्मक राय रखता है। इंस्टीट्यूट ने ये सर्वे पिछले साल किया था। पर्यवेक्षकों का कहना है कि यूक्रेन युद्ध के मामले में जिस तरह चीन ने रूस का समर्थन किया, उससे ऑस्ट्रेलियाई जनमत में उसको लेकर राय और बिगड़ गई है।
इसी बीच सोलोमन आइलैंड्स के साथ चीन के सैन्य समझौते की खबर आई। इस समझौते को ऑस्ट्रेलियाई विशेषज्ञों ने देश की सुरक्षा के लिए चुनौती बताया है। राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि इस घटना के बाद चुनावी माहौल में चीन विरोधी प्रचार और तेज हो गया। लेबर पार्टी ने इस समझौते को वर्तमान सरकार की बड़ी नाकामी बताया। उससे मॉरिसन बचाव की मुद्रा अपनाने को मजबूर हुए। लेकिन जवाब में उन्होंने लेबर पार्टी के पुराने रिकॉर्ड की चर्चा भी शुरू कर दी। इस तरह मतदान करीब आते-आते चीन सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है।