पाकिस्तान: ‘पॉवरफुल लॉबी’ से कुछ ज्यादा ही टकरा गए इमरान खान?
पाकिस्तानी मीडिया में छपे विश्लेषणों में बताया गया है कि 342 सदस्यीय नेशनल असेंबली में पीटीआई सरकार के पक्ष में अधिक से अधिक 155 सदस्य बचे हैं। इसीलिए इमरान खान के इस दावे को यहां ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया है कि अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान से ठीक पहले वे अपना ट्रंप कार्ड खेलेंगे...
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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार के खिलाफ पेश अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और मतदान के लिए जिस समय नेशनल असेंबली का सत्र शुरू हुआ है, तमाम समीकरण पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) सरकार के खिलाफ नजर आ रहे हैं। पाकिस्तानी मीडिया में छपे विश्लेषणों में बताया गया है कि 342 सदस्यीय नेशनल असेंबली में पीटीआई सरकार के पक्ष में अधिक से अधिक 155 सदस्य बचे हैं। इसीलिए इमरान खान के इस दावे को यहां ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया है कि अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान से ठीक पहले वे अपना ट्रंप कार्ड खेलेंगे।
समझा जाता है कि हार तय दिखने की वजह से ही इमरान खान ने मौजूदा सियासी टकराव को ‘नेकी बनाम बदी’ की लड़ाई बताना शुरू किया है। सरकार गिरने के बाद अपने इस नारे के साथ वे जनता के बीच उतरेंगे। इसकी शुरुआत वे 27 मार्च को करेंगे, जिस दिन उन्होंने लाखों की संख्या में इस्लामाबाद पहुंचने का आह्वान लोगों से किया है। खान ने कहा है कि बुराई से संघर्ष में अच्छाई का साथ देना लोगों का फर्ज है।
सेना और खुफिया तंत्र से असहज रिश्ते
इस बीच पाकिस्तानी सियासत के जानकारों ने राय जताई है कि विपक्ष ने ‘ताकतवर हलकों’ से ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का फैसला किया। पाकिस्तान में अक्सर इसका मतलब सेना और खुफिया तंत्र को माना जाता है। इन जानकारों के मुताबिक हाल में सेना और खुफिया तंत्र के साथ इमरान खान के रिश्ते बिगड़ गए। जबकि उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के पीछे इन्हीं ताकतों का हाथ माना जाता था। सेना और खुफिया तंत्र की राय में बदलाव का एक बड़ा कारण हाल में भू-राजनीतिक स्थिति में आए बदलाव को भी माना जा रहा है।
पीटीआई की तरफ से मीडिया में यह चर्चा आगे बढ़ाई गई है कि इमरान खान सरकार को अस्थिर करने के पीछे यूरोपियन यूनियन (ईयू) और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का हाथ है। पीटीआई सूत्रों ने कहा है कि इमरान सरकार के ‘स्वतंत्र’ विदेश नीति अपनाने की वजह से अमेरिका और ईयू प्रधानमंत्री से नाराज हो गए। गौरतलब है कि यूक्रेन संकट पर पाकिस्तान के रुख को लेकर इमरान खान ने ईयू के खिलाफ सार्वजनिक बयान दिया था। यूक्रेन मामले में पाकिस्तान के रुख को रूस के पक्ष में समझा गया है।
बाजवा के बाद कौन होगा अगला जनरल?
वेबसाइट एशिया टाइम्स पर छपे एक विश्लेषण के मुताबिक अमेरिका पहली बार इमरान खान से तब खफा हुआ, जब अमेरिकी फौज के अभी अफगानिस्तान में मौजूद रहते ही तालिबान ने अप्रत्याशित तेजी से काबुल पर कब्जा जमा लिया। अमेरिका का आकलन यह है कि तालिबान ने ऐसा पाकिस्तान सरकार की मदद से किया। तब कुछ अमेरिकी सांसदों ने पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी की थी। विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी एजेंसियों की आज भी पाकिस्तानी सेना और खुफिया तंत्र के अंदर मजबूत पैठ है।
मीडिया रिपोर्टों में ध्यान दिलाया गया है कि इमरान खान पिछले साल अक्तूबर में सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा से भी टकरा गए थे। तब बाजवा ने पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद का ट्रांसफर कर दिया था। इस पर इमरान ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई थी। आम चर्चा रही है कि 2018 के आम चुनाव में पीटीआई को विजयी बनाने की योजना के सूत्रधार हमीद ही थे।
पिछले कुछ महीनों से चर्चा रही है कि इस साल नवंबर में जनरल बाजवा के रिटायर होने के बाद इमरान खान लेफ्टिनेंट जनरल हमीद को सेनाध्यक्ष बनाने की तैयारी में हैं। एक बड़े हलके में ऐसी धारणा बनी है कि पाकिस्तान में फिलहाल हो रही सियासत पर इन तमाम घटनाओं का साया है।