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नवाज शरीफ के लिए छह बुनियादी चुनौतियां

Sun, 12 May 2013 08:42 PM IST
Updated Sun, 12 May 2013 08:42 PM IST
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nawaz sharif challenges

चुनाव के नतीजों के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि पाकिस्तान में अगले प्रधानमंत्री नवाज शरीफ बनेगें।

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लेकिन पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में, जहां 66 सालों के लगभग आधे वक्त में फौजी तानाशाह सत्ता में बने रहे, नवाज शरीफ के लिए सत्ता की राह इतनी आसान न होगी।

कई बुनियादी सवाल हैं जो मुंह बाए उनकी ओर देख रहे हैं और उन्हें इसका जवाब जल्द खोजना होगा।

कौन-कौन देगा उनका साथ?
हालांकि पीएमएल (एन) को संसद में उम्मीद से ज्यादा सीटें हासिल हुई हैं और पंजाब के लोगों ने भी उनके साथ जाने की मुहर लगाई है। लेकिन लगता नहीं है कि पार्टी को केंद्र में अपने बलबूते बहुमत हासिल होगा।
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तो वो कौन सी राजनीतिक पार्टियां होंगी जो मौका आने पर उनके गठबंधन में शामिल होकर नवाज शरीफ को सरकार बनाने में मदद कर सकती हैं?

सेना ने हटाया, जनता ने पीएम बनाया
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सिंध के कराची में मजबूत राजनीतिक दल मुत्ताहिदा कौमी मुवमेंट के प्रमुख अलताफ हुसैन ने नवाज शरीफ को जीत पर मुबारक दी है। हालांकि दोनों दलों ने चुनाव प्रचार के दौरान एक दूसरे के खिलाफ कड़े शब्दों का प्रयोग किया था।

लेकिन चुनाव प्रचार और सरकार बनाना दोनों अलग-अलग बात है। उसी तरह जमीयत उलमाए इस्लाम (फजलुर्रहमान) के बारे में तो कहा जाता है कि वो किसी के साथ भी जा सकते हैं।

लग रहा है कि स्वतंत्र उम्मीदवारों को भी ख़ासी सीटे हासिल होंगी। तकरीबन 40 से 50 के बीच। चुनाव आयोग ने उनसे कहा है कि वो तीन-चार दिनों में ये तय कर लें कि वो किसी दल के साथ जाना चाहते हैं या अलग-अलग।

लेकिन अक्सर स्वतंत्र रूप से जीते हुए सांसद उस दल के साथ जाना चाहते हैं जो सरकार बनाने की स्थिति में होता है या सरकार बना रहा होता है।

क्या उम्मीदें हैं जनता की?
पंजाब के प्रांतीय और नेशनल असेंबली के लिए नवाज शरीफ को जो इतने वोट मिले हैं उसकी वजह बिजली की भारी किल्लत रही है।

लोगों की अपेक्षा है कि वो इसे जल्द से जल्द हल कर सकेंगे। लेकिन ये उतना आसान न होगा क्योंकि बिजली उत्पादन को जल्द बढ़ाना मुश्किल होगा।

शरीफ अर्श पर मुशर्रफ फर्श पर

चरमपंथ का बहुत बड़ा चैलेंज अभी भी उनके सामने खड़ा है। चरमपंथ से उन हालात में निपटना जबकि फौज का नवाज़ शरीफ़ को शायद बहुत बड़ा समर्थन न हासिल हो उनके लिए चुनौती होगा।

उन्होंने अमेरिका की चरमपंथ के खिलाफ जारी लड़ाई से भी अलग होने की बात कही है।

फौज के साथ रिश्ते और इसका अमरीका के साथ संबंधो पर असर?
फ़ौज के साथ नवाज़ शरीफ़ के पेचीदे रिश्ते ने लोगों को चिंता में डाल रखा है। नवाज़ शरीफ़ ने सेना प्रमुख जहांगीर करामत के साथ मतभेदों के बाद उन्हें हटाकर परवेज़ मुशर्रफ़ को सेना प्रमुख नियुक्त किया था।

उन्होंने परवेज़ मुशर्रफ़ को दो वरिष्ठ अफसरों लेफ्टीनेंट जनरल अली क़ूली ख़ान और ख़ालिद नवाज़ पर तरजीह दी थी। लेकिन बाद में परवेज़ मुशर्रफ़ ने उनका तख़्ता पलट डाला।

वो दूसरे मुल्क के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के इस्तेमाल को ख़त्म करने की बात कह रहे हैं। ये वो बात है जिस पर सेना से मतभेद बढ़ सकते हैं, क्योंकि अमेरिका का चरमपंथ विरोधी अभियान परवेज़ मुशर्रफ़ के समय शुरू हुआ था और ज़ाहिर है इसमें सेना की पूरी हामी थी।

मुशर्रफ़ के जाने के बाद भी ये जंग जारी रही थी और ड्रोन के लिए पाकिस्तानी वायु क्षेत्र का इस्तेमाल होता रहा है।

अमेरिका से रिश्ते?
अमेरिका अगले साल यानी 2014 में अफग़ानिस्तान से बाहर जा रहा है लेकिन वो इस क्षेत्र में उपस्थिति समाप्त करना चाहेगा या नहीं ये भी एक सवाल है।

अमेरिका के प्रमुख अख़बार 'न्यूयार्क टाइम्स' के संवाददाता डेक्लिन वाल्श ने लिखा है कि नवाज़ शरीफ़ ने वादा किया है कि वो पाकिस्तान में अमेरिका के प्रभाव को कम करेंगे।

उनका कहना है कि इससे अमेरिका के पाकिस्तान के साथ पहले से ही तनावपूर्ण हो गए रिश्तों पर और सवालिया निशान खड़ा हो जाएगा।

डेक्लिन वाल्श को पाकिस्तान ने 'नापसंदीदा कारगुज़ारियों' के चलते मुल्क से बाहर जाने का हुक्म दिया था।

लेकिन ब्रितानी 'टेलिग्राफ़' समाचारपत्र के मुताबिक़ नवाज़ शरीफ़ ने पश्चिमी मुल्कों को यक़ीन दिलाने की कोशिश की है कि वो अल-क़ायदा और तालिबान के ख़िलाफ़ जंग से पीछे नहीं हटेंगे।

समाचार पत्र के मुताबिक़ उन्होंने संडे टेलीग्राफ़ से बात करते हुए कहा, "मुझे अमेरिका के साथ काम करने का तजुर्बा है और मुझे उनके साथ आगे काम करने में भी खुशी होगी।"


पड़ोसी मुल्क भारत से तालुक्क़ात?

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में शांति वार्ता के शुरू होने में नवाज शरीफ का रोल सबसे अहम था। लेकिन कारगिल युद्ध भी उन्हीं के दौर में हुआ।

हालांकि उन्होंने बाद में कहा कि उन्हें इस मामले में सेना प्रमुख, परवेज़ मुशर्रफ़ ने अंधेरे में रखा था। लेकिन नवाज़ शरीफ़ को बीच-बचाव के लिए अमेरिका की दौड़ लगानी पड़ी थी।

साथ ही अगर नवाज़ शरीफ़ तालिबान के प्रति नर्म रूख अख़्तियार करते हैं, तो चरमपंथी भारत के साथ बेहतर संबंधों को शायद न पसंद करें।

पाकिस्तान ने साल 1988 का अपना परमाणु परीक्षण भी किया था। ये भारत में हुए परीक्षण के दो हफ्तों बाद ही किया गया।

कैसे करेंगे प्रांतीय हुकुमतों के साथ तालमेल?
जहां पंजाब में नवाज़ शरीफ़ को बड़ा बहुमत मिला है वहीं सिंध पाकिस्तान पीपल्स पार्टी और ख़ैबर पख़्तूनख्वाह पाकिस्तान तहरीके इंसाफ़ के पक्ष में गया है।

एक जगह पिछड़ेपन की विकराल समस्या है तो उत्तर पश्चिमी प्रांत चरमपंथ से जूझ रहा है।

(बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली की बीबीसी उर्दू के पाकिस्तान संपादक हारून रशीद से बातचीत पर आधारित)

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