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पाक चुनावों में कश्मीर का मुद्दा नदारद

Thu, 09 May 2013 02:15 PM IST
Updated Thu, 09 May 2013 02:15 PM IST
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kashmir issue in pakistan elections

पाकिस्तान में जारी चुनावी सरगर्मियों में इस बार कश्मीर का मुद्दा कहीं सुनाई नहीं पड़ रहा है।

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पिछले 25 वर्षों में ये पहली बार हुआ है जब पाकिस्तानी राजनीतिक पार्टियों ने कश्मीर को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया है।

इस बात को लेकर भारत प्रशासित कश्मीर में कई लोगों खासे नाराज हैं।

खास कर अलगाववादियों का कहना है कि जिन्होंने कश्मीर के संघर्ष में साथ देने का वादा किया था, वो पीछे हट रहे हैं।

पाकिस्तान से निराश


श्रीनगर में कई युवकों का कहना है कि उन्हें ऐसी उम्मीद थी कि पाकिस्तान के चुनाव में उनका जिक्र नहीं होगा।

एक युवती कहती हैं, “जब यहां पर समस्या होती है, तो वो लोग बहुत ही बढ़ा चढ़ा कर बातें करते हैं कि हम आपके साथ हैं। मुझे नहीं लगता कि हमें भारत और पाकिस्तान दोनों से ही कोई उम्मीद करनी चाहिए।”

वहीं एक युवक का कहना है, "पाकिस्तान ने हमें बहुत बार निराश किया है। इसलिए मुझे उम्मीद थी कि हमारा जिक्र पाकिस्तान की मुख्यधारा की पार्टियों के एजेंडे में नहीं होगा।"
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अलगाववादी भी पाकिस्तान से निराश हैं। कश्मीर में 25 वर्षों से जारी हिंसक आंदोलन में पाकिस्तान का समर्थन पाने के बावजूद अब वो खुद को अलग थलग महसूस कर रहे हैं।
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जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता यासीन मलिक कहते हैं कि इस आंदोलन का साथ देने के बाद अब पाकिस्तान पीछे हट गया है।

वो कहते हैं, “पाकिस्तानी नेता कश्मीर की आजादी के आंदोलन पर बात करें या न करें लेकिन चलता रहेगा। लेकिन कश्मीर के लोगों को ये भी याद रहेगा कि जिन्होंने साथ देने का वादा किया था, उन्होंने बीच रास्ते में अकेला छोड़ दिया।”

‘बदली रणनीति’

कई लोगों का कहना है कि पाकिस्तान अपने अंदरूनी हालात से इस कदर जूझ रहा है कि अब कश्मीर में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं बची है।

लेकिन विशेषज्ञों की राय है कि ये पाकिस्तान की नई रणनीति भी हो सकती है।

सेंट्रल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर शेख शौकत हुसैन का कहना है, “चुनावी घोषणापत्रों में कश्मीर का जिक्र न होने का ये मतलब नहीं है कि ये मुद्दा अब उनकी प्राथमिकता नहीं है। वहां ये समझ पैदा हो रही है कि कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के विवाद की बजाय कश्मीरियों की समस्या के तौर पर आगे बढ़ाया जाए और कश्मीरियों को आगे किया जाए तो शायद इसका कुछ सार्थक हल निकल सकता है।”


कश्मीर में 25 साल पहले सशस्त्र अलगाववादी आंदोलन पाकिस्तान के समर्थन से ही शुरू हुआ था। लेकिन पाकिस्तान की बदलती सोच के बीच अब कश्मीर में पाकिस्तान की तरफदारी करने वाले अलगाववादी नेता भी अकेलेपन का शिकार हैं।

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