पांच मुद्दे जो तय करेंगे पाकिस्तान का चुनाव परिणाम
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पाकिस्तान में 25 जुलाई को अगला आम चुनाव होने जा रहा है और राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी है। साथ ही कई तरह के मिथक और अनुमान चल रहे हैं कि ये चुनाव कौन जीतेगा? पाकिस्तान में हमने तीन राजनीतिक समीक्षकों से बात की और पूछा कि ऐसे कौन-से कारक हैं जो होने वाले चुनावों पर खास असर डाल सकते हैं।
इसके लिए हमने पाकिस्तान के विधायी विकास एवं पारदर्शिता संस्थान (पीआईएलडीएटी) के प्रमुख अहमद बिलाल महबूब से बात की। साथ ही जाने-माने पत्रकार सोहैल वराइच और कोलंबिया विश्वविद्यालय में पीएचडी स्कॉलर एवं राजनीतिक शास्त्री सारा खान से भी बात की। हमने जब इन विशेषज्ञों से बात की तो पांच ऐसे तत्व निकलकर आये जो आने वाले चुनावों में राजनीतिक दिग्गजों को कुछ बना सकते हैं या हरा सकते हैं।
नवाज शरीफ से सहानुभूति की लहर
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भ्रष्टाचार मामले में जेल में बंद हैं। इससे पहले साल 2016 के पनामा पेपर्स मामले में 28 जुलाई 2017 को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें प्रधानमंत्री पद से आयोग्य घोषित कर दिया था। शरीफ चुनाव नहीं लड़ सकते हैं लेकिन वह अभी भी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) का चेहरा हैं। इस पार्टी के प्रमुख इस समय उनके भाई शहबाज शरीफ हैं। विश्लेषक सोहैल वराइच कहते हैं कि साल 2018 के चुनाव का परिणाम नवाज शरीफ के नारे 'मुझे क्यों निकाला' का फैसला होगा।
अगर जनता इस बात से राजी हो जाती है कि उन्हें गैर-कानूनी तरीके से हटाया गया तो उनकी पार्टी और ताकतवर तरीके से वापस लौटेगी। वराइच कहते हैं, 'उन्होंने इसके इर्द-गिर्द एक कहानी बुनी है, उन्होंने खुद को पीड़ित के तौर पर पेश किया है।' अहमद बिलाल महबूब कहते हैं, 'नवाज शरीफ खुद को एक पीड़ित के रूप में पेश करने में सफल हुए हैं। जनता उन्हें सुन रही है और बहुत से इस बात से सहमत हैं कि ताकतवर संस्थाओं ने उन्हें गलत तरीके से पेश किया है।' नवाज शरीफ की पत्नी गंभीर रूप से बीमार हैं और पिछले साल अगस्त में उनके कैंसर का पता चला था। वह इस समय लंदन में वेंटिलेटर पर हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि उनकी बीमारी ने मतदाताओं में शरीफ और पार्टी के लिए सहानुभूति पैदा की है। साल 2008 में चुनावों से पहले बेनजीर भुट्टो की हत्या ने उनकी पार्टी को सत्ता में लाया था। राजनीतिक शास्त्री सारा खान कहती हैं, 'सहानुभूति की लहर थोड़े समय के लिए होती है और दूसरी पार्टियों के वोटबैंक को बदल नहीं सकती है लेकिन जिन सीटों पर मुकाबला कड़ा है और विपक्षी पार्टियों की जीत का अंतर कम हो सकता है। नवाज शरीफ की पीड़ित की छवि अनिश्चित मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है।'
सेना का दखल?
हाल में पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ये कहा था कि चुनाव कराना चुनाव आयोग का विशेषाधिकार है। हालांकि, इसके बावजूद विश्लेषकों को भरोसा है कि फौज अभी भी शक्तिशाली राजनीतिक साझीदार है। अहमद बिलाल महबूब कहते हैं, "हम पहले देख चुके हैं कि सेना की रुचि किसी राजनीतिक दल की हार या जीत का मुख्य कारण रही है। तो पाकिस्तान के संदर्भ में ये देखना महत्वपूर्ण है कि उनका अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रति क्या रवैया है।"
सोहैल वराइच इसे एक अलग तरीके से देखते हैं। वो कहते हैं, 'सेना की शक्ति और प्रभाव एक वास्तविकता है, लेकिन उनके पास एक बड़ा वोट बैंक भी है। उनके पास 8 लाख जवान हैं। अगर आप उनके परिवार और जिनकी उनमें रुचि है, उन लोगों को मिला लिया जाये तो ये संख्या एक करोड़ हो जाती है।' सारा खान को लगता है कि अगर चुनाव प्रक्रिया स्वच्छ और स्वतंत्र नहीं होगी तो प्रेस की स्वतंत्रता और अन्य साधनों पर लगाम कसकर सेना राजनीतिक वातावरण बना सकती है।
धार्मिक अधिकार
पाकिस्तान में लोगों के जीवन में धर्म एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चुनाव भी इससे अछूता नहीं है। पाकिस्तान में हाल ही में कई धार्मिक-राजनीतिक गठजोड़ों का उदय हुआ है। अहमद बिलाल महबूब की राय है कि जब से पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पीएमएल-एन और पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के बीच मुकाबला कड़ा हुआ है, तब से चुनावों में धार्मिक गठबंधन की भूमिका बढ़ गई है। वो कहते हैं, 'अगर किसी सीट पर हार-जीत का अंतर कम रहता है, तो वहां राजनीतिक पार्टियां वोट लूटेंगी और वो मुख्य उम्मीदवार को हरा या जिता भी सकती हैं।'
सोहैल वराइच कहते हैं कि राजनीतिक पार्टियां उप-चुनावों में पहले ही पीएमएल-एन का वोट बैंक काट चुकी हैं। सारा खान कहती हैं, 'देश की राजनीति में धर्म सबसे शक्तिशाली ईंधन है और वर्तमान परिपेक्ष्य में अभी तक सामयिक है। हाल ही में ईशनिंदा के विरुद्ध धार्मिक समूहों के खिलाफ आंदोलन भी पाकिस्तान के लोग देख चुके हैं।'
अर्थव्यवस्था और विकास
पाकिस्तान में आमतौर पर लोग चुनावी घोषणा-पत्रों और खासतौर पर राजनीतिक पार्टी के आर्थिक एजेंडे पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं। लेकिन खुद से जुड़े रोजगार, बिजली, मूलभूत विकास के मुद्दे मतदाताओं के ज्यादा करीब रहे हैं। सारा खान कहती हैं, 'देश की अर्थव्यवस्था के सूचक के आधार पर मतदाता फैसला नहीं लेते हैं। लेकिन स्थानीय स्तर के अर्थशास्त्र के मुद्दों और अपने क्षेत्र के विकास के आधार पर वो मतदाताओं को चुनेंगे।'
इस बारे में अहमद बिलाल महबूब कहते हैं कि मतदाताओं को प्रभावित करने वाले कारणों को जानने के लिए उन्होंने साल 2013 के बाद एक सर्वे शुरू किया था जिसमें एक मुख्य कारण विकास था। सोहैल वराइच कहते हैं, 'लोग जानना चाहते हैं कि इमरान खान देश के विकास और बदलाव में सक्षम हैं और वो आर्थिक बदलाव ला सकते हैं।'
मीडिया और फेक न्यूज
विश्लेषक मानते हैं कि मीडिया (सोशल मीडिया और मुख्यधारा का मीडिया) और फेक न्यूज देश में चुनावी प्रक्रिया में हेर-फेर कर सकते हैं। साल 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के बाद फेक न्यूज की जिस तरह से चर्चा हुई है, वो पूरी दुनिया में एक नई घटना है। पाकिस्तान में सभी राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और विश्लेषक मानते हैं कि वे सैकड़ों फर्जी फेसबुक और ट्विटर अकाउंट चला रहे हैं ताकि वह अपनी नीतियों और कहानियों को फैला सकें।
सारा खान कहती हैं, 'खासकर सोशल मीडिया पर गलत सूचना भ्रामक हो सकती है। तो अब मुख्यधारा की मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह फेक न्यूज का विरोध करें और मतदाताओं का मार्गदर्शन करें।' लेकिन जिस तरह की पत्रकारिता मुख्यधारा की मीडिया कर रही है, क्या उससे यह हो सकता है? सोहैल वराइच कहते हैं कि ये एक बड़ी चुनौती है।
उन्होंने बताया, 'मुख्यधारा का मीडिया संगठनों में बंटा हुआ है। वो पक्ष ले रहा है तो ये मुश्किल है कि वो फेक न्यूज का अच्छे से मुकाबला कर सकेगा।' हालांकि, अहमद बिलाल का मानना है कि सोशल मीडिया की पहुंच केवल 10 से 15 फीसदी लोगों तक है, तो मुख्यधारा का मीडिया ही है जो आने वाले चुनावों में लोगों की राय को प्रभावित करेगा।