बंटवारे के 70 साल: पाकिस्तान में हिन्दुओं को लेकर क्या सोचते थे जिन्ना?
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2012 में जब मुर्तजा सोलंगी पाकिस्तान रेडियो के महानिदेशक थे तो उन्हें पता चला कि संस्था के लाखों मिनट के ऑडियो अभिलेखागार में कायदे-आजम (मुहम्मद अली जिन्ना) के 11 अगस्त 1947 के भाषण की रिकॉर्डिंग मौजूद नहीं है।
यह मुहम्मद अली जिन्ना का कराची में पाकिस्तान की पहली असेंबली में किया गया पहला संबोधन था। मुर्तजा सोलंगी ने उसकी तलाश शुरू की। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने बीबीसी लंदन से भी संपर्क किया और ऑल इंडिया रेडियो से भी। लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। प्रगतिशीलवादी लोग कायदे-आजम के इस भाषण को नवजात पाकिस्तान के विजन के रूप में देखते हैं।
11 अगस्त के भाषण के अंश-
'आप स्वतंत्र हैं। आप स्वतंत्र हैं अपने मंदिरों में जाने के लिए। आप स्वतंत्र हैं अपनी मस्जिदों में जाने के लिए और पाकिस्तान राज्य में अपनी किसी भी इबादतगाह में जाने के लिए। आपके संबंध किसी भी धर्म जाति या नस्ल से हों, राज्य को इससे कोई लेना-देना नहीं है।'
मुर्तजा सोलंगी कहते हैं कि वे राजनीति और इतिहास के छात्र होने के कारण जिज्ञासा रखते थे और भाषण का संदेश उनके दिल के बहुत करीब भी था इसलिए उन्होंने कई महीनों तक इसके लिए भाग-दौड़ की।
'11 अगस्त का भाषण यह बताता है कि जब नया राज्य बन रहा था तो राज्य के संस्थापक के मन में उसका क्या नक्शा था। वह कैसा राज्य बनाना चाहते थे। लेकिन मुझे सफलता नहीं मिली।' मुर्तजा सोलंगी कहते हैं कि भाषण सरकारी अभिलेखागार में नहीं होने के बारे में कई किस्से कहानियां प्रसिद्ध थीं और एक विचार साजिश का था कि भाषण सैन्य तानाशाह जियाउल हक के जमाने में जान-बूझकर अभिलेखागार से गायब कर दिया गया।
मुर्तजा सोलंगी कहते हैं कि साजिशें होती हैं और तार्किक रूप से यह संभव भी है, लेकिन उनके पास इसका सबूत मौजूद नहीं तो वह पत्रकार की हैसियत से साजिश वाली विचारधारा की पुष्टि नहीं कर सकते।
जिन्ना का भाषण पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के लिए बहुत महत्व रखता है
संसद में विरोध यह पहली बार नहीं था कि देश में पाकिस्तान के संस्थापक के 11 अगस्त के भाषण को सैद्धांतिक रूप से सुरक्षित करने या राष्ट्रीय बयान का हिस्सा बनाने की कोशिश की गई हो।
सन 2004 और फिर 2011 में पारसी अल्पसंख्यक से संबंधित नेशनल असेंबली के सदस्य एमपी भंडारी ने इस भाषण को पाठ्यक्रम और संविधान का हिस्सा बनाने के लिए प्रस्ताव और संशोधन प्रस्तुत किया जो एमपी भंडारा के पुत्र इस्फहान यार भंडारा के अनुसार दक्षिणपंथी धार्मिक दलों के विरोध के कारण सफल नहीं हो सका।
इस्फहान यार भंडारा कहते हैं कि यह भाषण पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के लिए बहुत महत्व रखता है। 'कायदे-आजम ने इस भाषण में पाकिस्तानवाद पर जोर दिया है और बताया है कि लोग अपने पूजा स्थलों में जाने के लिए स्वतंत्र हैं और किसी धर्म से राज्य को कोई सरोकार नहीं होगा।'
इस्फहान यार कहते हैं कि उन्हें अफसोस है कि उनके पिता 11 अगस्त के भाषण को संविधान और पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बनवा सकें, क्योंकि उनके पिता की पार्टी मुस्लिम लीग (क्यू) के अंदर भी इस मुद्दे पर मतभेद थे और अगर यह मुशर्रफ के उदारवादी युग में संभव नहीं हो सका तो आज पाकिस्तान में ऐसा होना लगभग असंभव है।
पाकिस्तान में बसने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों में सबसे अधिक संख्या हिन्दुओं की है। ईसाई आबादी के लिहाज से दूसरे बड़े अल्पसंख्यक हैं जबकि उनके अलावा सिख, पारसी, बौद्ध कैलाशी प्रमुख हैं।
सिंध के अंदरूनी इलाकों में बौद्धों के कुछ परिवार रहते हैं। जुम्मन कारमून मेहराबपुर के एक स्कूल में प्राथमिक स्कूल में शिक्षक हैं। वेश-भूषा में वह सिंधी हिंदुओं की तरह दिखते हैं। जुम्मन के अनुसार पाकिस्तान में बौद्धों की संख्या पांच हजार के लगभग है। पाकिस्तान में बौद्ध धर्म का प्राचीन इतिहास है।
पंजाब में तक्षशिला और खैबर पख्तूख्वां में तख्त बाई के क्षेत्र में मौजूद स्तूप और स्वात घाटी में जन्म लेने वाली गंधार संस्कृति को बौद्ध धर्म का पालना माना जाता है। लेकिन अब स्थिति यह है कि पाकिस्तान में बौद्धों का कोई नियमित मंदिर मौजूद नहीं। बौद्धों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व नगण्य है और वह पाकिस्तानी होने के बावजूद पहचान से वंचित हैं।
संख्या कम और आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जुम्मन कहते हैं कि, 'बस यहां जो हम में से छिटपुट रह रहे हैं वे अपने आप में ही मगन हैं, जैसे भूली-बिसरी कौम हों। धीरे-धीरे हो सकता है कि एक-दो पीढ़ी में हम खत्म ही हो जाएं।'
मुसलमान अच्छा पाकिस्तानी या पारसी भी
विभाजन के समय पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों खासकर कराची और लाहौर में कई पारसी परिवार रहते थे जिनके ज्यादातर लोग व्यवसाय से जुड़े थे। करीमन पारेख का जन्म तो लाहौर का है, लेकिन वह अभी कराची में भारतीय बीवीएस पारसी बॉयज स्कूल की प्रिंसिपल हैं।
वो कहती हैं कि विभाजन के समय पारसियों को विस्थापित करने की जरूरत महसूस नहीं हुई और उन्हें कभी चरमपंथ का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन अब सामाजिक व्यवहार में कुछ बदलाव आया है। वो कहती हैं, 'अब हमने देखा है कि अच्छा पाकिस्तानी होने के लिए अच्छा मुसलमान होना जरूरी समझा जाता है।'
स्वात के सिख पंजाबी नहीं पश्तून हैं
पाकिस्तानी पंजाब में सिखों के कई पवित्र स्थान रहे हैं, लेकिन यहां सिख केवल पंजाब तक सीमित नहीं हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों खासकर खैबर पख्तूनख्वां और कबाइली क्षेत्रों में पीढ़ी दर पीढ़ी सैकड़ों सिख परिवार रहते आए हैं। स्वात में सन 2009 में तालिबान ने कब्जा कर लिया था। इस दौरान यहां बसने वाले सिख परिवार अस्थायी तौर पर अन्य लोगों की तरह अपने क्षेत्र से पलायन करके चले गए, लेकिन सैन्य अभियान के तुरंत बाद वे अपने घरों को लौट आए।
स्वात के गुरुद्वारे के ग्रंथी बंसरी लाल कहते हैं कि कबाइली समाज में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्राप्त है, इसलिए उन्हें इन हालात का सामना नहीं करना पड़ा जो देश के अन्य भागों में रहने वाले अल्पसंख्यक कर रहे हैं।
ईसाई ईशनिंदा के आरोप की चपेट में
ईसाई धर्म के मानने वाले पाकिस्तान के दूसरे बड़े अल्पसंख्यक हैं जो वैसे तो पूरे देश में बसे हैं, लेकिन विशेष रूप से पंजाब में उनकी बड़ी संख्या है। हाल के वर्षों में पंजाब में ईसाई आबादी को ईश-निंदा के आरोपों पर निशाना बनाया गया है।
यूनुस चौहान पाकिस्तान में अक्सर ईसाई लोगों के लिए आरक्षित कहे जाने वाले क्षेत्र सैनीटेशन से जुड़े रहे हैं। वे कहते हैं कि समय के साथ सामाजिक भेदभाव में तो कमी हुई है, लेकिन धर्म के अपमान के कानून का डर तलवार की तरह हर समय उनके समुदाय के सिर पर लटकता रहता है। 'अगर एक आदमी गलती करता है तो उसे सजा दी जाए। किसी
को अवैध पकड़कर उस पर धर्म के अपमान का आरोप लगाया जाए तो बहुत तकलीफ होती है।'
हिंदू पाकिस्तानी या भारतीय?
हिंदू आबादी के लिहाज से पाकिस्तान के सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं। खासकर ऊपरी सिंध में सवर्ण हिंदू लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाएं अक्सर आती रहती हैं और
अनुसूचित यानी निचली जाति से संबंध रखने वालों को वडेरों और बहुमत से संबंधित प्रभावशाली लोगों से भेदभाव और शोषण का निशाना बनाने की परंपरा भी आम है।
मुस्लिम बहुल पाकिस्तान में यह धारणा भी काफी मजबूत है कि हिंदू धर्म के आधार पर भारत के वफादार हैं। लेकिन बलूचिस्तान कबाइली व्यवस्था के तहत जीवन बिताने
वाले हिन्दुओं को समाज में स्वीकृति भी हासिल है और सुरक्षा भी। राज कुमार क्वेटा हिंदू पंचायत के अध्यक्ष हैं। वो कहते हैं कि कहीं-कहीं भेदभाव भी होता है।
'स्कूलों में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाती। हमने कहा है कि स्कूलों में इस्लामी शिक्षा की जगह अगर नैतिकता पढ़ाई जाए तो बेहतर होगा।'
दो राष्ट्रीय नजरिया या धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान?
लेखक और विश्लेषक यासिर लतीफ हमदानी कहते हैं कि मोहम्मद अली जिन्ना ने केवल 11 अगस्त के भाषण ही नहीं बल्कि लगभग अपने 33 भाषणों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बारे में बात की है।
यासिर हमदानी कहते हैं कि 11 अगस्त के भाषण में उन्होंने भविष्य में नए राज्य की दिशा तय की और स्पष्ट किया कि राज्य का किसी धर्म से कोई सरोकार नहीं है। हर किसी को धार्मिक स्वतंत्रता होगी और राज्य न तो किसी धर्म को बढ़ावा देगा और न ही किसी को दबाया जाएगा।
तो क्या मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान को धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाना चाहते थे? यासिर हमदानी कहते हैं, 'इस युग में शब्द धर्मनिरपेक्षता उतना मायने नहीं रखती थी जो अब रखती है।'
वो कहते हैं कि धर्मनिरपेक्षता का अगर यह मतलब है कि राज्य में किसी भी नागरिक के खिलाफ धर्म और आस्था के आधार पर भेदभाव करने की अनुमति न हो तो ऐसा ही धर्मनिरपेक्ष राज्य तो कायदे-आजम बनाना चाहते थे। मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के गठन के बाद केवल 13 महीने जीवित रहे। उनके कार्यकाल में कानून मंत्री हिंदू थे। विदेश मंत्री का संबंध भी अल्पसंख्यक समुदाय से था।
द्विराष्ट्र सिद्धांत शक्ति के बंटवारे का फॉर्मूला था
उनके जीवन में तो पाकिस्तान सभी समूहों को शामिल करके चलने की नीति पर चल रहा था, लेकिन उनकी मृत्यु के छह महीने बाद पाकिस्तान में लक्ष्यों के प्रस्ताव को मंज़ूर कर लिया गया।
यासिर लतीफ के अनुसार ,'लक्ष्य प्रस्ताव पहली दरार थी जिसमें राष्ट्र की नींव धर्म पर रख दी गई और मोहम्मद अली जिन्ना के बाद जिन लोगों ने सत्ता संभाली उनके पास वोट की शक्ति नहीं थी, इसलिए उन्होंने इस्लाम का सहारा लिया।' यासिर लतीफ यह भी कहते हैं कि द्विराष्ट्र सिद्धांत तो शक्ति के बंटवारे का फॉर्मूला था जिसमें जनसंख्या के आधार पर मुसलमानों के लिए राजनीतिक अधिकारों की मांग की गई थी।
इसका यह मतलब कतई नहीं था कि हिन्दू और मुसलमान साथ नहीं रह सकते। जब राष्ट्र बनता है तो उसमें हर नागरिक को अधिकार बराबर होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जिस तरह से पाकिस्तान में दो राष्ट्रीय विचारधारा की व्याख्या की गई और उसे परवान चढ़ाया गया है क्या वह कायदे-आजम के 11 अगस्त के भाषण या उनकी दृष्टि से मेल खाते हैं?