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Indus Waters Treaty: पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि पर फिर अलापा मध्यस्थता कोर्ट का राग, भारत से की ये अपील

Tue, 01 Jul 2025 01:24 AM IST
शिव शुक्ला वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, इस्लामाबाद Published by: शिव शुक्ला Updated Tue, 01 Jul 2025 01:24 AM IST
सार

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि मध्यस्थता कोर्ट के फैसले से साबित होता है कि सिंधु जल संधि अब भी अस्तित्व में है और भारत को इसका सही भावना से पालन करना चाहिए।

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Pakistan urges India to resume normal functioning of Indus Waters Treaty
सिंधु जल संधि पर रोक। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पाकिस्तान ने एक बार फिर हेग स्थित मध्यस्थता कोर्ट के फैसले का राग अलापते हुए भारत से सिंधु जल संधि का पालन करने की अपील की। हालांकि भारत ने स्पष्ट कर दिया कि उसने इस संधि के विवादों को सुलझाने के मामले में मध्यस्थता कोर्ट के अधिकार को कभी मान्यता नहीं दी है।

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पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने अलापा सिंधु जल संधि का राग
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने सोमवार को एक बयान में कहा, मध्यस्थता कोर्ट के फैसले से साबित होता है कि सिंधु जल संधि अब भी अस्तित्व में है और भारत को इसका सही भावना से पालन करना चाहिए। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा, मध्यस्थता कोर्ट ने 27 जून के फैसले में सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान के पक्ष को सही ठहराया है। हम भारत से आग्रह करते हैं कि इस संधि का सामान्य परिचालन तत्काल आरंभ करे और इस संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियों को पूर्णता और सच्चाई से पूरा करे।
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वहीं, पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने सोशल मीडिया पर लिखा, पाकिस्तान मध्यस्थता कोर्ट के पूरक फैसले का स्वागत करता है। यह फैसला इस बात की पुष्टि करता है कि सिंधु जल संधि पूरी तरह वैध है। भारत एकतरफा रूप से इसे स्थगित नहीं कर सकता। राष्ट्रों का आकलन अंतरराष्ट्रीय समझौतों के उनके पालन से किया जाता है। इस संधि को इसकी संपूर्ण भावना के साथ लागू किया जाना चाहिए।
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भारत मध्यस्थता अदालत को ठहरा चुका है अवैध
भारत ने बीते शुक्रवार इस पूरक फैसले की आलोचना करते हुए कहा था कि वह इस कोर्ट के अधिकार को मान्यता नहीं देता। भारत ने दो-टूक कहा था कि केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा और रातले जलविद्युत परियोजनाओं के संबंध में सुनवाई से जुड़ा मध्यस्थता न्यायालय का पूरक अवाॅर्ड पूरी तरह निरर्थक है, क्योंकि सिंधु जल संधि-1960 के तहत गठित मध्यस्थता न्यायालय ही अवैध है। भारत ने कभी इसे मान्यता नहीं दी। इसके किसी भी पूरक अवाॅर्ड या फैसले को स्वीकार करने का सवाल ही नहीं उठता।

विदेश मंत्रालय ने कहा, भारत का रुख हमेशा से यही रहा है कि कथित मध्यस्थ निकाय का गठन अपने आप में सिंधु जल संधि का गंभीर उल्लंघन है। नतीजतन, इसकी कोई भी कार्यवाही, अवाॅर्ड या निर्णय भी अवैध और अपने आप में निरर्थक है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान के साथ जल संधि स्थगित रहने तक वह इसके तहत किसी भी दायित्व को पूरा करने के लिए बाध्य नहीं है। बयान के मुताबिक, संप्रभु अधिकारों के साथ भारत किसी भी मध्यस्थता न्यायालय और अवैध रूप से गठित निकाय को किसी कार्रवाई की वैधता की जांच का अधिकार नहीं देता है। 

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विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा था कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संप्रभु राष्ट्र के रूप में अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए सिंधु जल संधि को स्थगित किया। पाकिस्तान जब तक विश्वसनीय और स्पष्ट तौर पर सीमा पार आतंकवाद को समर्थन बंद नहीं करता, तब तक यह संधि स्थगित ही रहेगी। 

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सिंधु जल संधि और विवाद
1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि हुई थी, जो विश्व बैंक की मध्यस्थता में बनी थी। इसके तहत भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग नदियों पर अधिकार दिए गए थे। पाकिस्तान ने बार-बार किशनगंगा और रतले परियोजनाओं पर आपत्ति जताई है और विवाद को कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में ले गया। भारत का कहना है कि यह कोर्ट संधि की मूल प्रक्रियाओं को दरकिनार कर अवैध रूप से बनाई गई है, और इसलिए भारत इसमें शामिल नहीं है। गौरतलब है कि भारत ने 22 अप्रैल के पहलगाम आतंकी हमले के एक दिन बाद पाकिस्तान के खिलाफ कई कदम उठाए थे जिनमें इस संधि को स्थगित करना भी शामिल था।  

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