{"_id":"5f13bfe71110ce69553e566d","slug":"old-corona-virus-infections-may-boost-covid-19-immunity-says-study","type":"story","status":"publish","title_hn":"कोरोना के पुराने मरीजों को कोविड-19 के खिलाफ लड़ने में मिलती है मदद- शोध","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
कोरोना के पुराने मरीजों को कोविड-19 के खिलाफ लड़ने में मिलती है मदद- शोध
Sun, 19 Jul 2020 09:07 AM IST
Tanuja Yadav
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, सिंगापुर
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, सिंगापुर
Published by: Tanuja Yadav
Updated Sun, 19 Jul 2020 09:07 AM IST
विज्ञापन
कोरोना वायरस (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : PTI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कुछ लोग जो नए कोरोना वायरस के संक्रमण में नहीं आए हैं, उनके पास दूसरे कोरोना वायरस के पुराने संक्रमण की वजह से एक बेहतर प्रतिरोधक क्षमता हो सकती है। कोरोना वायरस को लेकर एक नया शोध सामने आया है जो इस ओर संकेत देता है कि कोविड-19 के खिलाफ लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता बनाई जा सकती है।
विज्ञापन
15 जुलाई को नेचर जर्नल में सिंगापुर के शोधकर्ताओं की ओर से छपे शोध के मुताबिक कुछ लोगों के अंदर टी-सेल्स होती हैं जो वायरस के दोनों प्रोटीन यानि कि स्ट्रक्चरल और न्यूक्लोकैपसिड प्रोटीन की पहचान करती हैं और नॉन-स्ट्रक्चरल वायरल प्रोटीन (एनएसपी) संक्रमित कोशिका में बनती है।
विज्ञापन
टी-सेल्स (कोशिकाएं) एक तरह की श्वेत रक्त वाली कोशिकाएं होती हैं जो कोशिका में ही संक्रमण का पता लगाती हैं और वहीं वायरस को मार देती हैं। इस शोध के सहलेखक एंटीनियो बेरतोलेटी का कहना है कि हमने देखा कि सार्स-कोव 2 को कोविड-19 में टी-सेल्स और सार्स (2003 में फैला था) ने स्वास्थ्य लाभ पहुंचाया है।
विज्ञापन
जो मरीज कोविड-19 से ठीक हो गए हैं, उनकी टी-सेल्स एनएसपी से ज्यादा बेहतर तरीके से स्ट्रक्चरल प्रोटीन्स की पहचान कर रही हैं। एंटीनियो बेरतोलेटी ने बताया कि उनके शोध में लगभग 50 फीसदी से ज्यादा गैर संक्रमित अस्वस्थ व्यक्तियों की टी-सेल्स में सार्स-कोव 2 की उपस्थिति थी। टी-सेल्स अक्सर एनएसपी की पहचान जल्दी कर लेती है, ये प्रोटीन सिर्फ जानवरों के कोरोना वायरस में पाया जाता है।
डॉ एंटीनियो बेरतोलेटी ने बताया कि हमारे शोध से यह पता चलता है कि कई विषयों में टी-सेल्स प्रतिक्रिया की प्रगति का स्तर हो सकता है, जो आंशिक रूप से उनकी रक्षा करता है। हालांकि जानकार इस शोध पर ज्यादा आश्चर्यचकित नहीं होते हैं। 20 फीसदी सामान्य जुकाम कोरोना वायरस की वजह से होता है।
वेलकम ट्रस्ट के सीईओ और वायरोलॉजिस्ट शाहिद जमीनल कहते हैं कि सार्स-कोव-2 में 80 फीसदी हिस्सा पुराने सार्स-कोव-1 और 50 फीसदी हिस्सा दूसरे कोरोना वायरस का है। इसलिए इन सभी कोरोना वायरस के प्रोटीन में एक सामान्य परिणाम हो सकता है।
फरीदाबाद के बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्रीय केंद्र के कार्यकारी निदेशक सुधांशु व्राती का कहना है कि साल 2003 में फैला सार्स कोव-1 भारत में सबसे ज्यादा फैला था लेकिन इस पर और शोध होना बाकी है। अभी भी यहां कई कोरोना वायरस हो सकते हैं, जो शायद हानिकारक ना हो, लेकिन उन पर शोध ना किया गया हो।
उनका कहना है कि उन्होंने IgG एंटीबॉडी पर शोध कर रहे लोगों से पूछा कि उन्हें कैसे पता कि ये सार्स-कोव-2 है और पिछला कोई दूसरा कोरोना वायरस नहीं है। व्राती का कहना है कि इस शोध का वैक्सीन के विकास में लागू किया जा सकता है। जिन लोगों को निष्क्रिय बना देने वाला वायरस वैक्सीन दिया जा रहा है, उनमें कुछ ही वायरल प्रोटीन होते हैं, जो प्रभावशाली एंटीबॉडी और कुछ टी-सेल्स रिस्पॉन्स बनाने में मदद करती हैं।
टी-सेल्स रिस्पॉन्स ज्यादा बड़ा और लंबे समय तक काम करता है अगर मरीज पर जिंदा वायरस वैक्सीन का इस्तेमाल किया जाए, लेकिन एक जिंदा वायरस वैक्सीन बनाना काफी मुश्किल काम है।