संयुक्त राष्ट्र महासभा में निंदा प्रस्ताव: नेपाल की नीतियों पर दिखने लगा अमेरिका का असर
संयुक्त राष्ट्र महासभा में चर्चा शुरू होने के पहले अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा को फोन किया था। ब्लिंकेन ने उसके बाद एक ट्विट में बताया था कि उन्होंने देउबा से यूक्रेन पर हमले की चर्चा की और इस मुद्दे पर उनका समर्थन मांगा...
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नेपाल ने यूक्रेन पर हमले के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र महासभा में लाए गए रूस की निंदा के प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाला। दक्षिण एशिया में नेपाल के अलावा ऐसा रुख सिर्फ मालदीव का रहा। भारत, श्रीलंका, और पाकिस्तान ने अपने को मतदान से अलग रखा। हालांकि औपचारिक रूप से अफगानिस्तान और म्यांमार को प्रस्ताव के पक्ष में वोट डालने वाले देशों की सूची में दिखाया गया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में अभी तक प्रतिनिधित्व उन सरकारों को मिला हुआ है जो अब वहां वास्तव में सत्ता नहीं हैं। वरना, म्यांमार के सैनिक शासकों ने खुल कर रूस का समर्थन किया है, जबकि अफगानिस्तान में सत्ताधारी तालिबान के रूस से बेहतर रिश्ते बताए जाते हैं।
ब्लिंकेन ने वोटिंग से पहले किया था फोन
नेपाल उन 141 देशों में शामिल हुआ, जिन्होंने निंदा प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाले। मतदान से पहले चर्चा में भाग लेते हुए संयुक्त राष्ट्र में नेपाल के स्थायी प्रतिनिधि अमृत राय ने कहा कि उनका देश किसी संप्रभु देश के खिलाफ ताकत के इस्तेमाल और उसकी प्रादेशिक अखंडता के उल्लंघन के खिलाफ है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में चर्चा शुरू होने के पहले अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा को फोन किया था। ब्लिंकेन ने उसके बाद एक ट्विट में बताया था कि उन्होंने देउबा से यूक्रेन पर हमले की चर्चा की और इस मुद्दे पर उनका समर्थन मांगा।
पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि अमेरिकी संस्था मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) की मदद लेने के सवाल पर नेपाल में हुई बहस के दौरान यह साफ हो गया था कि देउबा सरकार का झुकाव अमेरिका की तरफ है। इसमें रुकावट सत्ताधारी गठबंधन में शामिल दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां थीं। लेकिन उन्हें साध लेने के बाद देउबा सरकार की विदेश नीति पूरी तरह स्पष्ट हो गई है।
यूक्रेन मामले में नेपाल सरकार की सोच का पहला संकेत बीते सोमवार को ही मिल गया था, जब संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद में नेपाल ने यूक्रेन पर रूसी हमले की निंदा के लिए लाए गए प्रस्ताव का समर्थन किया। यहां भी नेपाल ने चीन और भारत से अलग रुख लिया। चीन ने प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया था, जबकि भारत ने खुद को मतदान से अलग रखा था।
अभी तक खुद को मतदान से अलग रखता रहा है नेपाल
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि यह नेपाल की विदेश नीति में एक स्पष्ट बदलाव है। 2014 में जब क्राइमिया को रूस में मिलाए जाने के बाद संयुक्त राष्ट्र में निंदा प्रस्ताव लाया गया था, तब नेपाल ने खुद को मतदान से अलग रखा था। अभी पिछले साल जून तक नेपाल का रुख संतुलन बना कर चलने का था। बीते जून में म्यांमार के सैनिक शासन की निंदा के लिए महासभा में प्रस्ताव लाया गया था। तब नेपाल ने उस पर हुए मतदान से खुद को अलग रखा था।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक देउबा सरकार के सत्ता में आने और उसके बाद तेज हुई अमेरिकी कूटनीति का अब असर होता दिख रहा है। इस बीच कम्युनिस्ट पार्टियों के रुख में भी बदलाव आया है, जो एमसीसी की मदद लेने के लिए हुए करार के मुद्दे पर जाहिर हुआ। न सिर्फ सत्ताधारी गठबंधन में शामिल पुष्प कमल दहल और माधव कुमार नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों ने उसका समर्थन किया, बल्कि विपक्षी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) ने भी इसका विरोध छोड़ दिया है।