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Nepal New Note: क्या चीन की नकल कर रहा है नेपाल? पूर्व विदेश सचिव ने कही ये बड़ी बात
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नेपाल
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Amar Ujala
विस्तार
क्या नेपाल चीन के रास्ते पर चल रहा है? राजनयिक हलकों में नेपाल के हालिया कदम को कुछ इसी नजर से देखा जा रहा है। लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा, जो भारत का हिस्सा रहे हैं, उन्हें नेपाल ने अपना बताया है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर इस मामले में अपनी कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर कर चुके हैं। पूर्व विदेश सचिव भी नेपाल के इस कदम से नाखुश हैं। उन्हें लगता है कि नेपाल का यह फैसला उकसावे वाला कदम है और ऐसा जानबूझ कर किया गया है। वहीं नेपाल का यह ताजा कदम प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल 'प्रचंड' के उस बयान के विपरित है, जिसमें उन्होंने भारत-नेपाल की बीच सीमा विवाद को मित्रता की भावना से सुलझाने का संकल्प लिया था।
हाल ही में नेपाली कैबिनेट ने 100 रुपये का नया नोट छापने को मंजूरी दी है। जिसके मानचित्र में भारत में शामिल इलाकों लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी को दर्शाया जाएगा। कैबिनेट के फैसले के मुताबिक 100 रुपये के बैंक नोट को फिर से डिजाइन करने के साथ बैकग्राउंड में छपे पुराने नक्शे को भी बदला जाना है। इससे पहले 18 जून, 2020 को तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने नेपाली संविधान में संशोधन करके रणनीतिक रूप से अहम तीन इलाकों लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताया था, उस दौरान भी भारत ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए 'एकतरफा कार्यवाही' बताया था।
नेपाल का जानबूझकर उकसाने वाला कदम
भारत के पूर्व विदेश सचिव और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के चांसलर कंवल सिबल का इसे नेपाल का उकसावे वाला कदम बताते हैं। वह कहते हैं कि अपने नए करेंसी नोटों पर नक्शे बना कर भारतीय क्षेत्रों को दिखाने का नेपाल का यह फैसला जानबूझकर उकसाने वाला कदम है। भारत को इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। भारत को नेपाल को यह भी आगाह करना चाहिए कि उसके इस फैसले से दोनों देशों के बीच संबंधों पर कितना गहरा असर पड़ सकता है। वह कहते हैं कि नेपाल को इस बार ऐसे ही नहीं छोड़ देना चाहिए।
चीन के नक्शेकदम पर चल रहा है नेपाल
पूर्व विदेश सचिव के मुताबिक उन्हें लगता है कि नेपाल चीन के नक्शेकदम पर चल रहा है। वह ठीक वैसा ही कर रहा है जैसा चीन अभी तक भारत के साथ करता रहा है। जैसे चीन विवादित इलाकों पर अपना दावा करता है, पासपोर्ट पर अपना नक्शा दिखाता है। अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों को अपने नक्शे में शामिल करता है, तो कभी उन जगहों का नाम बदल देता है। वह कहते हैं कि नेपाल का 100 रुपये के करेंसी नोट पर नक्शा बना कर भारतीय इलाकों को अपना बताना कुछ इसी तरह से दर्शाता है। वह कहते हैं कि जब दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही थी, तो नेपाल को ऐसा करने की क्या जरूरत थी। क्या नेपाल सरकार ओली की राह पर चल रही है? नेपाल को इस पर बिंदुवार अपना स्पष्टीकरण देना चाहिए।
क्या कहा था विदेश मंत्री ने?
इससे पहले यह मामला सामने आने के बाद भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि भारतीय इलाकों को अपने करेंसी नोट में शामिल करने के कदम से जमीनी स्तर पर स्थिति या वास्तविकता में कोई बदलाव नहीं आने वाला है। उन्होंने एक प्रेस वार्ता में कहा कि कभी-कभी पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में थोड़ी बहुत राजनीति भी शामिल हो जाती है। लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम कैसे अपने और उनके हितों को मिलाकर चल सकते हैं।
1850 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं नेपाल और भारत
लिपुलेख दर्रा भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत से कैलाश मानसरोवर तक तीर्थयात्री लिपुलेख दर्रे से जाते हैं। साल 2020 में भारत ने चीन के कब्जे वाले तिब्बत में लिपुलेख दर्रे से करीब 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित कैलाश मानसरोवर की यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को राहत पहुंचाने के लिए 80 किमी लंबी सड़क का उद्घाटन किया था। उस दौरान नेपाल ने पिथौरागढ़ से शुरू हुई इस सड़क पर आपत्ति दर्ज कराई थी। नेपाल और भारत 1850 किमी लंबी सीमा साझा करते हैं। सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड तक की सीमाएं नेपाल से लगी हैं, जिनमें से लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल अपना हिस्सा बताता है। जून 2023 में नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड ने चुनाव जीतने के बाद अपना पहला दौरा भारत का ही किया था। इस दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड ने सीमा विवाद निपटाने का फैसला भी किया था। लेकिन इसे सुलझाने को लेकर ज्यादा पहल नहीं हुई।