Same Sex Marriage: भारत में समलैंगिक विवाह सुनवाई को लेकर नेपाल में जगी है गहरी दिलचस्पी
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विस्तार
भारत के सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह के बारे में चल रही सुनवाई में नेपाल के समलैंगिक तबकों की गहरी दिलचस्पी देखी जा रही है। भारत सरकार ने ऐसे विवाह की अनुमति देने के विचार का विरोध किया है। इसके बावजूद भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इससे संबंधित याचिका पर सुनवाई जारी रखी है। कोर्ट ने इस मामले में भारत सरकार की इस दलील पर कड़ी टिप्पणियां भी की हैं कि समलैंगिक विवाह एक शहरी और अभिजात्यवादी परिघटना है।
भारतीय सुप्रीम कोर्ट यह सुनवाई 18 समलैंगिक जोड़ों की अर्जी पर कर रहा है। इन जोड़ों ने गुजारिश की है कि उन्हें विधिवत विवाह कर साथ रहने की इजाजत दी जाए। नेपाल में क्वीयर अधिकार कार्यकर्ता रुकसाना कपाली ने कहा- ‘हम इस मामले पर करीबी निगाह रख रहे हैं। जहां तक समलैंगिक विवाहों और क्वीयर अधिकारों का सवाल है, नेपाल काफी आगे है।’
नेपाल के संविधान में लेस्बियन, गे, बाइ-सेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीयर (एलजीबीटीक्यू) व्यक्तियों के बुनियादी अधिकारों को मान्यता दी गई है। मार्च 2007 में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने नेपाल सरकार को आदेश दिया था कि देश में समलैंगिक विवाह को मान्यता दी जाए। साथ ही कोर्ट ने नेपाल में जेंडर और सेक्सुअल अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने का निर्देश भी दिया था। लेकिन समलैंगिक विवाह को अभी तक देश में कानूनी मान्यता नहीं मिल सकी है। इस तरह समलैंगिक जोड़ों का विवाह करना गैर-कानूनी बना हुआ है। वरिष्ठ वकील सुनील पोखारेल ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘हमारा कानून हमारे समाज की व्यापक सोच की झलक देता है।’
नेपाल में पुरुष और महिला के अलावा तीसरे जेंडर को 2013 के नागरिकता कानून के तहत मान्यता दी गई थी। दो साल बाद ऐसे लोगों को ‘अऩ्य श्रेणी’ के तहत पासपोर्ट जारी करने की शुरुआत कर दी गई। इसके बावजूद समलैंगिक और ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन समुदायों के अनुकूल स्थिति बनाने के लिए नेपाल में अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है।
बताया जाता है कि नेपाल में एलजीबीटीक्यू समुदाय के नौ लाख लोग हैं। उनकी शिकायत है कि उन्हें अभी भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और नौकरियां पाने के मामले में उन्हें अभी भी दिक्कत आती है। लेकिन कपाली ने कहा- ‘पिछले दशक की तुलना में अब इस अधिक संख्या में समुदाय के लोग खुल कर सामने आ रहे हैं। अब बहुत से लोग इस समुदाय के पक्ष में बोलने लगे हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव है।’
पिछले साल नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी ने कुछ ट्रांसजेंडर छात्रों को इम्तिहान देने से रोक दिया था। तब एलजीबीटीक्यू संगठनों ने इसको लेकर सोशल मीडिया पर बड़ा अभियान चलाया। उस समय बड़े पैमाने पर आम जन का समर्थन इस समुदाय के लोगों को मिला। इसके बाद यूनिवर्सिटी को झुकना पड़ा और उसने ऐसे छात्रों को एडमिट कार्ड जारी कर दिया।
कपाली ने कहा- ‘इस घटना से जाहिर हुआ कि बड़ी संख्या में लोग हमारा समर्थन करते हैं। लेकिन जो लोग खुल कर अपनी समलैंगिक पहचान समाज के सामने नहीं रखते, उनके लिए अभी भी मुश्किल है। हाल में कई जगहों पर ऐसे लोगों पर हमले भी हुए हैं। यहां तक कि हत्या की घटनाएं भी हुई हैं।’