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Mongolia: संसद में विश्वास मत हासिल नहीं कर सके मंगोलिया के प्रधानमंत्री, कड़े विरोध के बाद दिया इस्तीफा
Tue, 03 Jun 2025 10:08 AM IST
बशु जैन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
Published by: बशु जैन
Updated Tue, 03 Jun 2025 10:08 AM IST
सार
रूस और चीन के बीच घिरा मंगोलिया लोकतांत्रिक देश बनने की राह पर चल रहा है। यहां पिछले साल चुनावी सुधारों के बाद संसद की सीटें 76 से बढ़ाकर 126 कर दी गईं। इसके बाद गठबंधन सरकार बनी। मगर प्रधानमंत्री पर बेटे के बेतहाशा खर्च को लेकर आरोप लगे और विरोध प्रदर्शन हुए। इसके बाद संसद में विश्वास मत के लिए मतदान हुआ।
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मंगोलिया के प्रधानमंत्री ओयुन-एर्डीन लुव्सन्नामसराय
- फोटो : एक्स/@OyunerdeneMN
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विस्तार
लोकतंत्र कायम करने की राह पर चल रहे मंगोलिया में सियासी उथल-पुथल है। अपने बेटे के बेतहाशा खर्च को लेकर विरोध का सामना कर रहे प्रधानमंत्री ओयुन-एर्डीन लुव्सन्नामसराय संसद में विश्वास मत हासिल नहीं कर सके हैं। प्रधानमंत्री ने मंगलवार सुबह इस्तीफा दे दिया।
वॉशिंगटन में मंगोलिया के दूतावास ने इसकी पुष्टि की। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि प्रधानमंत्री ओयुन-एर्डीन लुव्सन्नामसराय को 44 वोट मिले, जो आवश्यक 64 से काफी कम है। दरअसल प्रधानमंत्री के बेटे के खर्च को लेकर कई सप्ताह से विरोध प्रदर्शन हो रहा था। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री से पद छोड़ने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि देश की खनिज संपदा से व्यापारिक हितों और धनी लोगों को लाभ हुआ है, जबकि कई मंगोल लोग अभी भी गरीबी में जी रहे हैं।
ये भी पढ़ें: अप्रवासन नीति को सख्त न करने पर गिर सकती है नीदरलैंड सरकार, दक्षिणपंथी गीर्ट विल्डर्स ने दी धमकी
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इसके बाद संसद में विश्वास मत को लेकर मतदान कराया गया। मतदान से पहले ओयुन-एर्डीन ने चेतावनी दी कि इससे अस्थिरता पैदा हो सकती है और मंगोलिया का नया लोकतंत्र हिल सकता है। उन्होंने कहा कि अगर शासन अस्थिर हो जाता है, आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है। राजनीतिक दल आम सहमति पर नहीं पहुंच पाते हैं। इससे जनता का संसदीय शासन में विश्वास खत्म हो सकता है और हमारी लोकतांत्रिक संसदीय प्रणाली के ढहने का खतरा हो सकता है।
उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा कि मैंने बड़ी परियोजनाओं को बहुत अधिक समय दिया, जबकि सामाजिक और आंतरिक राजनीतिक मामलों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। ओयुन-एर्डीन चार वर्षों तक इस पद पर रहे थे तथा इससे पहले भी उन्हें पद छोड़ने के लिए कहा गया था।
मंगोलिया में पिछले साल बनी थी गठबंधन सरकार
मंगोलिया में पिछले साल चुनावी सुधारों के बाद संसद की सीटें 76 से बढ़ाकर 126 कर दी गईं। इसके बाद गठबंधन सरकार बनी। रूस और चीन के बीच घिरा मंगोलिया लोकतांत्रिक बनने के लिए संघर्ष कर रहा है। शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के पतन के बाद से यह लोकतंत्र में तब्दील हो रहा है।
ये भी पढ़ें: 'ब्रिटेन आतंकवाद से लड़ने के भारत के प्रयासों के साथ', ब्रिटिश सांसद शिवानी राजा की बयान
सामरिक एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में भारत एवं एशियाई अर्थव्यवस्था की उप निदेशक एवं वरिष्ठ फेलो एरिन मर्फी ने कहा कि लोकतंत्र के लिए आधार तैयार करना बहुत कठिन है। ऐसे समय में मंगोलिया को आर्थिक समस्याओं से भी निपटना होगा। हमें अभी भी देखना है कि आगे क्या होता है और नई सरकार इन मुद्दों से निपटने की क्या योजना बनाती है? मंगोलिया में लोकतंत्र अभी तक पनप नहीं पाया है, लेकिन यह जड़ें जमा रहा है।
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वॉशिंगटन में मंगोलिया के दूतावास ने इसकी पुष्टि की। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि प्रधानमंत्री ओयुन-एर्डीन लुव्सन्नामसराय को 44 वोट मिले, जो आवश्यक 64 से काफी कम है। दरअसल प्रधानमंत्री के बेटे के खर्च को लेकर कई सप्ताह से विरोध प्रदर्शन हो रहा था। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री से पद छोड़ने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि देश की खनिज संपदा से व्यापारिक हितों और धनी लोगों को लाभ हुआ है, जबकि कई मंगोल लोग अभी भी गरीबी में जी रहे हैं।
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इसके बाद संसद में विश्वास मत को लेकर मतदान कराया गया। मतदान से पहले ओयुन-एर्डीन ने चेतावनी दी कि इससे अस्थिरता पैदा हो सकती है और मंगोलिया का नया लोकतंत्र हिल सकता है। उन्होंने कहा कि अगर शासन अस्थिर हो जाता है, आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है। राजनीतिक दल आम सहमति पर नहीं पहुंच पाते हैं। इससे जनता का संसदीय शासन में विश्वास खत्म हो सकता है और हमारी लोकतांत्रिक संसदीय प्रणाली के ढहने का खतरा हो सकता है।
उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा कि मैंने बड़ी परियोजनाओं को बहुत अधिक समय दिया, जबकि सामाजिक और आंतरिक राजनीतिक मामलों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। ओयुन-एर्डीन चार वर्षों तक इस पद पर रहे थे तथा इससे पहले भी उन्हें पद छोड़ने के लिए कहा गया था।
मंगोलिया में पिछले साल बनी थी गठबंधन सरकार
मंगोलिया में पिछले साल चुनावी सुधारों के बाद संसद की सीटें 76 से बढ़ाकर 126 कर दी गईं। इसके बाद गठबंधन सरकार बनी। रूस और चीन के बीच घिरा मंगोलिया लोकतांत्रिक बनने के लिए संघर्ष कर रहा है। शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के पतन के बाद से यह लोकतंत्र में तब्दील हो रहा है।
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सामरिक एवं अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में भारत एवं एशियाई अर्थव्यवस्था की उप निदेशक एवं वरिष्ठ फेलो एरिन मर्फी ने कहा कि लोकतंत्र के लिए आधार तैयार करना बहुत कठिन है। ऐसे समय में मंगोलिया को आर्थिक समस्याओं से भी निपटना होगा। हमें अभी भी देखना है कि आगे क्या होता है और नई सरकार इन मुद्दों से निपटने की क्या योजना बनाती है? मंगोलिया में लोकतंत्र अभी तक पनप नहीं पाया है, लेकिन यह जड़ें जमा रहा है।
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