एशिया-प्रशांत क्षेत्र: डेल्टा वैरिएंट के आगे नाकाम हो गई है जीरो कोविड रणनीति
विशेषज्ञों के मुताबिक आरंभिक रूप से जीरो कोविड रणनीति सफल रही, हालांकि इसकी कीमत भी इसे अपनाने वाले देशों को चुकानी पड़ी है। पर्यटन पर निर्भर न्यूजीलैंड और प्रशांत महासागर में मौजूद द्वीपीय देशों की अर्थव्यवस्था को इस रणनीति से भारी नुकसान हुआ है...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
एक साल पहले एशिया-प्रशांत क्षेत्र के जिन देशों की कोरोना संक्रमण पर प्रभावी ढंग से काबू पाने के लिए तारीफ हो रही थी, अब वे इस महामारी से बुरी तरह परेशान हैं। अब कहा जा रहा है कि महामारी पर काबू पाने के दावे जल्दबाजी में किए गए। फिलहाल, संक्रमित मरीजों की संख्या में तेज इजाफे के कारण मलेशिया, थाईलैंड और इंडोनेशिया की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं चरमराती नजर आ रही हैं। फीजी जैसे द्वीपीय देश में महामारी का नया दौर आ गया है, जबकि पिछले साल वहां संक्रमण के इक्के-दुक्के मामले ही सामने आए थे।
इस क्षेत्र के कई विशेषज्ञ यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अचानक हालत इतनी कैसे बिगड़ गई। इस क्षेत्र के ज्यादतर देशों ने कोरोना महामारी की शुरुआत के समय अपनी सीमाएं बाहरी लोगों के लिए बंद कर दी थीं, उसका फायदा हुआ। लेकिन बताया जाता है कि कोरोना वायरस के डेल्टा वैरिएंट ने सारी कहानी पलट दी। इस वैरिएंट की मार से चीन भी नहीं बच पाया है, जिसने जीरो कोविड रणनीति अपनाई थी। ऐसी ही रणनीति ऑस्ट्रेलिया ने भी अपनाई थी, जहां फिर से लॉकडाउन का सहारा लेना पड़ा है। जीरो रणनीति का मतलब कोविड संक्रमण का एक भी एक मामला देश में न रहने देना है।
हांग कांग के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में एसोसिएट प्रोफेसर कारेन ए. ग्रेपिन ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘बीते 18 महीनों में जीरो कोविड रणनीति दुनिया के कुछ हिस्सों में सफल रही। लेकिन मुझे नहीं लगता कि अब कोई भविष्य के लिए ऐसी रणनीति चाहता है।’ विशेषज्ञों ने कहा है कि जिन देशों ने इस रणनीति के तहत अपनी सीमाएं बिल्कुल बंद कर दीं, वे हमेशा ऐसा किए नहीं रह सकते। ऐसी रणनीति वाले हांग कांग और न्यूजीलैंड को भी देर-सबेर अपनी सीमाएं खोलनी होंगी।
विशेषज्ञों के मुताबिक आरंभिक रूप से जीरो कोविड रणनीति सफल रही, हालांकि इसकी कीमत भी इसे अपनाने वाले देशों को चुकानी पड़ी है। पर्यटन पर निर्भर न्यूजीलैंड और प्रशांत महासागर में मौजूद द्वीपीय देशों की अर्थव्यवस्था को इस रणनीति से भारी नुकसान हुआ है। ऑस्ट्रेलिया के लोगों के लिए पिछले डेढ़ साल से विदेश जाना या विदेश जाने पर देश लौटना बेहद मुश्किल बना हुआ है।
इस रणनीति का फायदा यह हुआ है कि चीन या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में कभी महामारी ने वैसा भयानक रूप नहीं लिया, जैसा यूरोप या अमेरिका में इसने लिया था। ग्रेपिन ने कहा- ‘मोटे तौर पर गुजरे डेढ़ साल में एशिया-प्रशांत क्षेत्र कोविड का मुकाबला करने में अपेक्षाकृत कामयाब रहे हैं। इसलिए ये कहना उचित नहीं होगा कि उन्होंने जो रणनीति अपनाई वह सही नहीं थी।’
लेकिन अब कहानी बदल गई है। सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ डेल फिशर के मुताबिक चीन और ऑस्ट्रेलिया ने सीमा को सख्ती से बंद रखने का तरीका अपनाया। साथ ही जहां संक्रमण के संकेत दिखे, वहां सबकी जांच की गई। लेकिन इस तरीके को डेल्टा वैरिएंट से कड़ी चुनौती मिली है। ये वैरिएंट उतना ही संक्रामक है, जितना चेचक का वायरस होता है। यह चीन के वुहान में 2019 में सामने आए वायरस की तुलना में 60 से 200 फीसदी तक ज्यादा संक्रामक है।
ऑस्ट्रेलिया सरकार की अब यह कह कर आलोचना हो रही है कि उसने टीकाकरण पर पूरा ध्यान नहीं दिया। अब तक वहां की ढाई करोड़ आबादी में से सिर्फ 17 फीसदी का टीकाकरण हुआ है। सिडनी यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ की प्रोफेसर एलेक्जांड्रा मार्तिनिउक ने सीएनएन से कहा- ‘यह बहुत बड़ी गलती हुई। हम अपने नजरिए पर अड़े रहे, जिस वजह से बहुत कम लोगों का टीकाकरण हुआ। उसके बाद ये खतरनाक वैरिएंट आ गया।’