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Exoplanet Weather System: अंतरिक्ष में मौसम का बड़ा रहस्य, 2690 प्रकाशवर्ष दूर ग्रह पर बनते-बिखरते दिखे बादल
Sat, 23 May 2026 07:35 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Sat, 23 May 2026 07:35 AM IST
सार
नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने पृथ्वी से 2690 प्रकाशवर्ष दूर एक एक्सोप्लैनेट पर अनोखा मौसम तंत्र खोजा है। वैज्ञानिकों ने पाया कि ग्रह के अंधेरे हिस्से में घने बादल बनते हैं और तेज हवाएं उन्हें रोशनी वाले हिस्से तक ले जाकर खत्म कर देती हैं। यह खोज ग्रहों के मौसम, वातावरण और रासायनिक संरचना को समझने में बड़ी सफलता मानी जा रही है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट
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वैज्ञानिकों को क्या नई जानकारी मली?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में एक ऐसे दूरस्थ ग्रह का पता लगाया है, जहां मौसम का बेहद अनोखा तंत्र काम करता है। पृथ्वी से करीब 2690 प्रकाशवर्ष दूर स्थित इस विशाल एक्सोप्लैनेट यानी सौरमंडल के बाहर मौजूद ग्रह पर घने बादल बनते और खत्म होते देखे गए हैं। खास बात यह है कि ग्रह के अंधेरे हिस्से में बादल बनते हैं और फिर तेज हवाएं उन्हें रोशनी वाले हिस्से तक ले जाकर खत्म कर देती हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की मदद से वैज्ञानिकों ने पहली बार इतने दूर मौजूद किसी ग्रह पर मौसम की इस प्रक्रिया को विस्तार से समझा है। वैज्ञानिक मान रहे हैं कि यह खोज अंतरिक्ष विज्ञान और ग्रहों के अध्ययन में बड़ा कदम साबित हो सकती है।
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आखिर वैज्ञानिकों ने इस ग्रह पर क्या खोजा?
वैज्ञानिकों ने एक्सोप्लैनेट डब्ल्यूएएसपी-94 ए बी का अध्ययन किया। यह ग्रह अपने तारे डब्ल्यूएएसपी-94 ए के सामने से गुजरता है। इसी दौरान वैज्ञानिकों ने ग्रह के वायुमंडल से होकर गुजरने वाली रोशनी का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि ग्रह के अलग-अलग हिस्सों से आने वाली रोशनी में अंतर दिखाई दे रहा था। खगोलशास्त्री सैगनिक मुखर्जी के नेतृत्व में हुई इस रिसर्च में पता चला कि ग्रह का जो हिस्सा पहले तारे के सामने आता है, वहां घने बादल मौजूद थे। वहीं, रोशनी वाले हिस्से में ये बादल खत्म हो जाते थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रह पर चलने वाली तेज हवाएं इन बादलों को एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक ले जाती हैं।
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बादलों की यह प्रक्रिया इतनी अहम क्यों मानी जा रही?
वैज्ञानिकों के अनुसार यह खोज केवल मौसम तक सीमित नहीं है। इससे ग्रह की रासायनिक संरचना और उसके निर्माण के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है। रिसर्च में कहा गया है कि अगर दिन और रात वाले हिस्सों के इस अंतर को नजरअंदाज कर दिया जाता, तो वैज्ञानिक गलत निष्कर्ष तक पहुंच सकते थे। उन्हें ऐसा लग सकता था कि ग्रह के दिन वाले हिस्से में धुंध जैसी परत बनी हुई है। इससे ग्रह के वातावरण की पूरी तस्वीर बदल सकती थी। इसलिए यह अध्ययन वैज्ञानिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इतने दूर ग्रहों का अध्ययन कैसे किया जाता है?
वैज्ञानिकों के लिए एक्सोप्लैनेट्स को सीधे देख पाना आसान नहीं होता। आमतौर पर इन ग्रहों का पता तब चलता है जब वे अपने तारे के सामने से गुजरते हैं। उस समय तारे की रोशनी थोड़ी कम हो जाती है। वैज्ञानिक उसी बदलाव का अध्ययन करते हैं। इस प्रक्रिया में ग्रह तारे की कुल रोशनी का केवल लगभग 1 प्रतिशत हिस्सा ही रोक पाता है। उसमें से भी बहुत कम रोशनी ग्रह के वायुमंडल से होकर गुजरती है। यही वजह है कि ऐसे संकेत बेहद कमजोर होते हैं और उन्हें समझने के लिए अत्याधुनिक तकनीक की जरूरत पड़ती है। जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने इसी मुश्किल काम को संभव बनाया है।