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चीन को झटका : रद्द होगा ‘क्रा कैनाल प्रोजेक्ट’, कठिन होगी हिंद महासागर तक पहुंच
Sat, 05 Sep 2020 12:15 AM IST
Jeet Kumar
टाइम्स न्यूज सर्विस, बैंकॉक
टाइम्स न्यूज सर्विस, बैंकॉक
Published by: Jeet Kumar
Updated Sat, 05 Sep 2020 12:15 AM IST
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चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल फोटो)
- फोटो : PTI
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भारत-चीन के बीच सीमा पर सैन्य गतिरोध के बीच एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चीन को थाईलैंड में गंभीर झटका लगा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि थाईलैंड सरकार ‘क्रा कैनाल प्रोजेक्ट’ को रद्द करने जा रही है जिसे बीजिंग किसी भी सूरत में पूरा करना चाहता है क्योंकि इसके बाद उसकी हिंद महासागर तक पहुंच आसान हो जाएगी।
यही नहीं, इससे ठीक पहले थाई सरकार ने जनता के दबाव में आकर 72.4 करोड़ डॉलर की दो चीनी पनडुब्बियों की खरीदी में देरी करके भी उसे झटका दिया है। चीन लंबे समय से ‘क्रा कैनाल प्रोजेक्ट’ के पूरा होने की उम्मीद लगाए बैठा है। करीब 102 किलोमीटर लंबी नहर के अस्त्तिव में आने के बाद चीन दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर में अपने नवनिर्मित ठिकानों तक आसानी से पहुंच सकेगा। अभी उसे इसके लिए 1,100 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है।
टीएफआईपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, क्रा प्रोजेक्ट से चीन का इरादा स्ट्रेट ऑफ मलक्का को बायपास करते हुए दक्षिण चीन सागर पर एकाधिकार जमाने का रहा है, ताकि हिंद प्रशांत क्षेत्र में उसे कोई चुनौती नहीं दे पाए। लेकिन थाई सरकार ने इस परियोजना से हाथ पीछे खींचने का मन बनाकर उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया है।
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असलियत समझ गई थाई सरकार
शुरुआत में ‘क्रा कैनाल प्रोजेक्ट’ को थाई सरकार का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बताया गया था, लेकिन अब थाईलैंड को लगता है कि इस परियोजना से उसे कोई लाभ नहीं है। थाईलैंड की योजना पनामा नहर की तरह यहां एक नहर बनाने की थी, जो दक्षिण चीन सागर को सीधे हिंद महासागर से जोड़ती। लेकिन अब वह जान चुकी है कि मलक्का, सुंडा या लोम्बोक स्ट्रेट के जरिये क्रा कैनाल ज्यादा राजस्व पैदा नहीं होगा।
भारत से रिश्ते होंगे प्रभावित
थाईलैंड यह भी समझता है कि आर्थिक कारणों के साथ ही क्रा कैनाल प्रोजेक्ट भारत और अमेरिका समेत कई देशों से उसके रिश्ते प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा एक चिंता यह भी है यह प्रोजेक्ट म्यांमार और कंबोडिया जैसे गरीब दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की स्वतंत्रता के नुकसानदायक हो सकता है, जो चीन के दखल से पहले से ही परेशान हैं।
इस तरह बैकफुट पर आई सरकार
थाईलैंड ने चीन के साथ जून 2015 में पनडुब्बियों की खरीद को लेकर सौदेबाजी शुरू की। इसके बाद एक साल में ही थाईलैंड में सैन्य तख्ता पलट हुआ और प्रधानमंत्री प्रायुत चान-ओ-चा को सत्ता से हटाकर सेना ने कब्जा कर लिया। चीन के रिश्ते नई सरकार से काफी मजबूत हो गए लेकिन दक्षिण सागर में चीनी दादागिरी पर सवाल उठे और लोग सड़कों पर उतर आए। इसके बाद सरकार बैकफुट पर आ गई।
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यही नहीं, इससे ठीक पहले थाई सरकार ने जनता के दबाव में आकर 72.4 करोड़ डॉलर की दो चीनी पनडुब्बियों की खरीदी में देरी करके भी उसे झटका दिया है। चीन लंबे समय से ‘क्रा कैनाल प्रोजेक्ट’ के पूरा होने की उम्मीद लगाए बैठा है। करीब 102 किलोमीटर लंबी नहर के अस्त्तिव में आने के बाद चीन दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर में अपने नवनिर्मित ठिकानों तक आसानी से पहुंच सकेगा। अभी उसे इसके लिए 1,100 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है।
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टीएफआईपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, क्रा प्रोजेक्ट से चीन का इरादा स्ट्रेट ऑफ मलक्का को बायपास करते हुए दक्षिण चीन सागर पर एकाधिकार जमाने का रहा है, ताकि हिंद प्रशांत क्षेत्र में उसे कोई चुनौती नहीं दे पाए। लेकिन थाई सरकार ने इस परियोजना से हाथ पीछे खींचने का मन बनाकर उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया है।
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असलियत समझ गई थाई सरकार
शुरुआत में ‘क्रा कैनाल प्रोजेक्ट’ को थाई सरकार का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बताया गया था, लेकिन अब थाईलैंड को लगता है कि इस परियोजना से उसे कोई लाभ नहीं है। थाईलैंड की योजना पनामा नहर की तरह यहां एक नहर बनाने की थी, जो दक्षिण चीन सागर को सीधे हिंद महासागर से जोड़ती। लेकिन अब वह जान चुकी है कि मलक्का, सुंडा या लोम्बोक स्ट्रेट के जरिये क्रा कैनाल ज्यादा राजस्व पैदा नहीं होगा।
भारत से रिश्ते होंगे प्रभावित
थाईलैंड यह भी समझता है कि आर्थिक कारणों के साथ ही क्रा कैनाल प्रोजेक्ट भारत और अमेरिका समेत कई देशों से उसके रिश्ते प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा एक चिंता यह भी है यह प्रोजेक्ट म्यांमार और कंबोडिया जैसे गरीब दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की स्वतंत्रता के नुकसानदायक हो सकता है, जो चीन के दखल से पहले से ही परेशान हैं।
इस तरह बैकफुट पर आई सरकार
थाईलैंड ने चीन के साथ जून 2015 में पनडुब्बियों की खरीद को लेकर सौदेबाजी शुरू की। इसके बाद एक साल में ही थाईलैंड में सैन्य तख्ता पलट हुआ और प्रधानमंत्री प्रायुत चान-ओ-चा को सत्ता से हटाकर सेना ने कब्जा कर लिया। चीन के रिश्ते नई सरकार से काफी मजबूत हो गए लेकिन दक्षिण सागर में चीनी दादागिरी पर सवाल उठे और लोग सड़कों पर उतर आए। इसके बाद सरकार बैकफुट पर आ गई।