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Korea: बिछड़े रिश्ते, टूटी यादें और अधूरी मुलाकातें; कोरियाई युद्ध के दिग्गजों ने बताई 1953 से अब तक की कहानी

Thu, 07 Aug 2025 02:11 PM IST
हिमांशु चंदेल वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ग्योदोंग-डो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ग्योदोंग-डो Published by: हिमांशु चंदेल Updated Thu, 07 Aug 2025 02:11 PM IST
सार

कोरियाई युद्ध के 70 साल बाद भी, दक्षिण कोरिया के ग्योदोंग द्वीप पर रह रहे बुजुर्ग युद्ध दिग्गज उत्तर कोरिया लौटने की उम्मीद नहीं छोड़े हैं। 90 वर्षीय किम और उनकी पत्नी मिन जैसे कई विस्थापित, अब स्थायी रूप से वहीं बस गए हैं। विभाजन का दर्द अब भी जिंदा है। इन दिग्गजों की आखिरी ख्वाहिश है कि दोनों कोरियाओं का फिर एकीकरण हो जाए।

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Korea Lost relationships roken memories incomplete meetings Korean War veterans tell story from 1953 till now
किम और उनके पति मिन - फोटो : Kim Cheong San and his wife Min

विस्तार

किम चेओंग सान और उनकी पत्नी मिन ओक सन दोनों 90 वर्ष के करीब हैं। वो कहते हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि कोरियाई युद्ध में विस्थापित होने के बाद, दक्षिण कोरिया के ग्योदोंग द्वीप पर 70 साल पहले बना उनका अस्थायी टिन की छत वाला आश्रय उनका स्थायी घर बन जाएगा।
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ग्योदोंग-डो यानी ग्योदोंग-द्वीप उत्तर और दक्षिण कोरिया की सीमा पर स्थित है। 90 वर्षीय दंपत्ति किम और मिन की तरह, यहां भी 1950 के दशक में कोरियाई युद्ध में शामिल हुए कई विस्थापित उत्तर कोरियाई लोग रहते हैं। ग्योदोंग-डो को गंगवा-डो से जोड़ने वाला एक पुल है, जहां असैन्यीकृत क्षेत्र (डीएमजेड) शांति पथ स्थित है। इसे 2014 में बनाया गया था। इससे पर्यटकों को इस क्षेत्र में आने की अनुमति मिलती है। पर्यटक डेयरयोंग गांव और डेयरयोंग बाजार देखने के लिए इस क्षेत्र में आते रहे हैं, जिसका आकर्षण 1970 के दशक की याद दिलाता है।
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कहां हुआ किम का जन्म?
किम का जन्म 1930 में ह्वांगहे-डो (अब उत्तर कोरिया में) में हुआ था, एक गुरिल्ला इकाई, UN8240 यूल्जी टाइगर ब्रिगेड एसोसिएशन के सदस्य थें। इस इकाई ने 25 जून, 1950 को कोरियाई युद्ध छिड़ने के बाद, अमेरिकी वायु सेना के पायलटों के बचाव कार्यों में अमेरिकी सेना के सैनिकों की मदद की थी, जो उनके परिचित क्षेत्र, उत्तरी क्षेत्र में थे।
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कहां हुआ मिन का जन्म?
मिन का जन्म उनके पति के गांव में ही हुआ था, केवल 17 वर्ष की आयु में ग्योदोंग-डो आई थीं। लेकिन युद्ध के बाद देश विभाजित हो गया और उन्हें कभी वापस जाने का मौका नहीं मिला। 27 जुलाई, 1953 को युद्ध समाप्त होने पर, इस जोड़े सहित कई उत्तर कोरियाई लोग ग्योदोंग द्वीप पर अस्थायी रूप से बस गए थे। किम कहते हैं कि यहां के ग्रामीणों ने टिन की छत वाले आश्रय बनाकर हम शरणार्थियों को बसने में मदद की। अब, वर्षों से, हमारे अस्थायी निवास स्थायी घरों में बदल गए हैं।

शादी पर क्या बोले दिग्गज?
मिन ने कहा कि मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं शादी करूंगा और अपना पूरा जीवन यहीं बिताऊंगा। मैं बस शांति के लिए तरस रहा था और अपने गृहनगर अपने माता-पिता के पास लौटना चाहता था और वहीं, उनके सामने शादी करना चाहता था। दंपति के तीन बेटे हैं। सभी दक्षिण कोरिया के अलग-अलग शहरों में अच्छी तरह से बस गए हैं। दंपत्ति के बेटे और पोते-पोतियां अक्सर उनसे मिलने आते हैं।

विभाजन की यादें
उनकी तरह, द्वीप पर कुछ और कोरियाई युद्ध के पूर्व सैनिक हैं जिनके लिए बीते युग की यादें और कोरिया के विभाजन का दर्द आज भी ताजा है। साल1931 में ह्वांगहे-डो में जन्मे चाए जा इओक, UN8240 यूल्जी टाइगर ब्रिगेड वेटरन्स एसोसिएशन के सदस्य भी थे। वह याद करते हैं कि कैसे उनका काम अमेरिकी जेट विमानों के मार गिराए जाने के बाद उत्तर कोरिया में फंसे अमेरिकी वायु सेना के जवानों को बचाने में मदद करना था। आधिकारिक इकाई बनने के बाद, उन्हें तोपखाने से लैस किया गया और अमेरिकी सेना की वर्दी भी दी गई।

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1945 में कोरिया में क्या हुआ? 
जब वह ग्योदोंग-डो आए, तब उनकी उम्र सिर्फ 19 साल थी। 15 अगस्त, 1945 को कोरिया आखिरकार जापानी औपनिवेशिक शासन से आजाद हो गया। हालांकि, यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं रही क्योंकि उसी महीने सोवियत सेना ने उत्तर कोरिया में प्रवेश किया और फिर 38वीं समानांतर रेखा आई, चाए कहते हैं। 38वीं समानांतर रेखा को शुरू में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ द्वारा जापानी आत्मसमर्पण वाले क्षेत्रों को विभाजित करने के लिए एक अस्थायी सीमा के रूप में स्थापित किया गया था।

इससे उत्तर और दक्षिण कोरिया का निर्माण हुआ और अब विसैन्यीकृत क्षेत्र (DMZ) बना है, जो दोनों देशों को अलग करने वाला एक मजबूत सुरक्षा वाला बफर जोन है। चाए कहते हैं कि और इस तरह, आजादी के एक महीने से भी कम समय में, कोरियाई प्रायद्वीप को एक और कष्ट झेलना पड़ा। हम विस्थापित लोगों ने जो दर्द सहा है, वह अथाह है।

उत्तर कोरिया पर कब्जे की शुरुआत
उनकी गुरिल्ला इकाई संयुक्त राष्ट्र कमान (यूएनसी) को उत्तर कोरिया जाने में मदद कर रही थी। वे काएसोंग (उत्तर कोरिया का एक शहर) पर कब्जा करने में सफल रहे, जिसे गेसियोंग भी कहते हैं, और यूएनसी के कब्ज़ा करने का इंतज़ार किया। जब यूएनसी समय पर वहां नहीं पहुंच सका, तो हमारे पास दक्षिण कोरिया वापस लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं था वे 1951 में हुई उस घटना को याद करते हैं, जिसे 4 जनवरी रिट्रीट के नाम से जाना जाता है।

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इस प्रक्रिया के दौरान बहुत से लोग विस्थापित हुए। कई शरणार्थी और युवा थे जो युद्ध में शामिल थे, लेकिन युद्ध की समाप्ति के बाद उनके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं थी। उन्होंने दक्षिण कोरिया के द्वीपों में शरण ली। ग्योदोंग-डो उनमें से एक थे। उत्तर कोरिया का सुंदर सोंगक पर्वत, गंगवा-डो पर, सैन्य-नियंत्रित क्षेत्र, उइदु डोंडे के ठीक सामने स्थित है, जहाँ गंगवा शांति वेधशाला स्थित है।

सिर्फ मीडिया के जरिए ही जाना
दूरबीन से उस तरफ देखने के अलावा, चाए कहते हैं कि पिछले 70 वर्षों में उन्होंने उत्तर कोरिया के जीवन के बारे में सिर्फ मीडिया के जरिए ही जाना है। हालांकि, लगभग अपना पूरा जीवन दक्षिण कोरियाई पक्ष में बिताने के बाद भी, इनमें से कई युद्ध के पूर्व सैनिक मरने से पहले कम से कम एक बार अपने गृहनगर ज़रूर जाना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद है कि दोनों देश फिर से एक हो जाएँगे।

अगर जर्मनी एक हो सकता है, तो मुझे लगता है कि कोरियाई भी अपने मतभेदों को दूर कर सकते हैं। हमें अपने अतीत को पीछे छोड़कर एक जातीयता वाले एक कोरिया के रूप में भविष्य की ओर बढ़ना चाहिए," मिन कहते हैं।
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