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अंतरिक्ष में कचरा: पृथ्वी के लिए खतरा है स्पेस में फैला मानव निर्मित मलबा, सफाई कर रहा जापान

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो Published by: प्रियंका तिवारी Updated Sat, 24 Apr 2021 03:21 PM IST

सार

मानव निर्मित मलबों के ये टुकड़े विभिन्न उपग्रहों और अंतरिक्षयानों के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। हालांकि, इन मलबों की सफाई में जापान की चार कंपनियां तेजी से काम कर रही हैं और बेहतर व्यापार के अवसर देख रही हैं।
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पृथ्वी की कक्षा में घूमते कचरे के टुकड़े
पृथ्वी की कक्षा में घूमते कचरे के टुकड़े - फोटो : नासा
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विस्तार

अंतरिक्ष में ढेरों सैटेलाइटों का मलबा जमा है। यह मलबे धरती का चक्कर लगा रहे हैं। ऐसे में अगर कोई नया सैटेलाइट इन मलबों के ढेर से टकराएगा तो ना सिर्फ करोड़ों का नुकसान होगा बल्कि रिसर्च प्रोजेक्ट भी अधूरा रह जाएगा। मानव निर्मित मलबों के ये टुकड़े विभिन्न उपग्रहों और अंतरिक्षयानों के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। हालांकि, इन मलबों की सफाई में जापान की चार कंपनियां तेजी से काम कर रही हैं और बेहतर व्यापार के अवसर देख रही हैं। वे उन समाधानों को विकसित करने में जुटी हैं जिनकी बदौलत आने वाले दिनों में अंतरिक्ष यात्रा अधिक सुरक्षित हो सकेगी।
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पैठ बनाने की कोशिश में अंतरिक्ष में कूड़ा फैला रहे देश
गौरतलब है कि सभी देश अंतरिक्ष में अपनी गहरी पैठ बनाने की कोशिश में लगे हैं। इसके चलते वे अंतरिक्ष में अपने ज्यादा से ज्यादा सैटेलाइट छोड़ रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में स्पेस में इन मलबों की मात्रा और बढ़ेगी। बता दें, अंतरिक्ष में मानव निर्मित मलबे आठ किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से धरती का चक्कर लगा रहे हैं। वहीं, सैटेलाइटों के टकराने से बना मलबा 40 हजार किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चक्कर काटता है। इतनी रफ्तार से चक्कर काटता एक मूंगफली का दाना भी टकराने पर ग्रेनेड जैसा असर करता है। अंतरिक्ष का कचरा पृथ्वी में पलने वाले जीवन के लिए भी खतरा है। अगर कोई बड़ा टुकड़ा वायुमंडल में दाखिल होते समय पूरी तरह नहीं जला तो काफी तबाही मचा सकता है।


जापानी कंपनी एस्ट्रोस्केल स्पेस में फैले कूड़े को कर रही साफ  
जापानी कंपनी एस्ट्रोस्केल साल 2013 में बनाई गई थी और इसकी चार शाखाएं ब्रिटेन, अमेरिका, इस्राइल व सिंगापुर में हैं। इस कंपनी ने इसी साल 22 मार्च को कजाखस्तान के बाइकोनुर कॉस्मोड्रोम से छोड़े गए सोयुज रॉकेट में भेजे अपने एल्सा-डी डिमॉन्स्ट्रेशन क्राफ्ट के जरिये अपनी ‘एंड ऑफ लाइफ सर्विसेज' शुरू कर दी। एल्सा-डी दो उपग्रहों से मिलकर बना है जो एक के ऊपर एक जुड़े हुए हैं। इसमें एक 175 किलोग्राम वाला सर्विसर सैटेलाइट है और दूसरा 17 किलो वाला क्लाइंट सैटेलाइट है। इसमें एक चुंबकीय डॉकिंग मकैनिजम भी लगा है और खराब पड़ चुके उपग्रहों और मलबे के बड़े टुकड़ों को हटाने का काम इसी उपग्रह के जरिये होता है।

कई अन्य देश भी अंतरिक्ष में मौजूद मलबे को साफ करने की कर रहे तैयारी
बता दें, जापान के अलावा यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) भी अंतरिक्ष में मौजूद कूड़े को साफ करने के लिए काम कर रही है। वह 2023 में एक गारबेज रोबोट को लॉन्च करने की तैयारी कर रही है। इस स्पेस रोबोट में एक हाथ होगा जो सैटेलाइट को पकड़ कर वापस धरती पर ले आएगा। अंतरिक्ष में मौजूद कूड़े को साफ करने के लिए कई उपायों पर काम किया रहा है। वैज्ञानिकों का यह विचार है कि कचरे को अंतरिक्ष में ही जला दिया जाए। जर्मनी की अंतरिक्ष एजेंसी डीएलआर इसके लिए एक लेजर तकनीक विकसित कर रही है। लेजर शॉट से मलबे को वहीं भस्म कर दिया जाएगा।

इलेक्ट्रो नेट पर काम कर रही नासा
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी एक इलेक्ट्रो नेट पर काम कर रही है। यह जाल एक बड़े इलाके में मौजूद कचरे को बांधेगा और फिर से धरती के वायुमंडल में लाएगा। पृथ्वी के वायुमंडल से दाखिल होते समय ज्यादातर कचरा खुद जल जाएगा, लेकिन इस विचार पर अभी ठोस काम होना बाकी है। इसके अलावा जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा के पास इलेक्ट्रोडायनैमिक माइन का प्रपोजल है। 700 मीटर लंबी इलेक्ट्रोडायनैमिक सुरंग स्टेनलैस स्टील और एल्युमीनियम से बनाई जाएगी। यह सुरंग कचरे की तेज रफ्तार को धीमा करेगी और उसे धीरे-धीरे वायुमंडल की तरफ धकेलेगी।
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