जकार्ता में नहीं मिल रही है दो गज जमीन, एक के ऊपर एक शव दफनाए जा रहे
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कहते हैं कि जमीन, जायदाद का मुद्दा तो जीवितों के लिए होता है, मरने वालों के लिए तो दो गज की जमीन की काफी होती हैं। लेकिन क्या हो जब इन मरने वालों को वो जमीन भी मुनासिफ न हो। कुछ इसी तरह की मुसीबतों के गुजर रहे हैं जकार्ता के लोग। यहां पर अपनों को दफनाने के लिए जमीन की ऐसी भारी किल्लत पैदा हो गई है कि लोग एक के ऊपर एक शवों को दफना रहे हैं। वहीं कई कब्रें तो ऐसी हैं, जहां एक के ऊपर एक छह शव तक दफन किए गए।
ऐसा नहीं है कि प्रशासन ने इस दिक्कत को दूर करने के लिए प्रयास न किए हों। लेकिन, ये कोशिशें इसलिए कामयाब होती नहीं दिखतीं, क्योंकि यहां का क्षेत्र बहुत सीमित है। वहीं ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ ने करात बिवाक और जकार्ता की इस समस्या पर एक रिपोर्ट प्रकाशित किया था।
जिसमें उन्होंने बताया था कि साल 2017 में प्रशासन ने नई कब्रें बनाने पर रोक लगा दी थी, लेकिन इसके लिए कोई वैकल्पिक इंतजाम नहीं किया था। जिसके कारण यहां के मौजूदा हालात बद से बदतर होते चले गए। बताया जाता है कि यहां कुल 48 हजार कब्रें हैं। इनमें एक लाख से ज्यादा शव दफनाए जा चुके हैं।
शवों को दफनाने के कड़े नियमों से भी आ रही है बाधा
जकार्ता में एक तरफ जहां शवों को दफनाने के लिए जमीन नहीं मिल रही हैं वहीं दूसरी तरफ यहां शवों को दफनाने के कुछ ऐसे नियम है। जिसकी वजह से यह समस्या और विकराल रुप धारण कर रही है। यहां शवों को दफनाने के लिए कई प्रकार की नियमावली है। यहां पर दो शवों को दफनाने के लिए एक मीटर का अंतर होना जरूरी होता है। कब्र कम से कम तीन साल पुरानी होनी चाहिए। तभी यहां दूसरा शव दफन किया जा सकता है।
बागान होते जा रहे हैं कब्रिस्तान में तब्दील
जकार्ता में जनसंख्या का घनत्व इस कदर बढ़ रहा है कि यहां के हरे-भरे बागान भी धीरे-धीरे कब्रिस्तान में तब्दील होते जा रहे हैं। शहर के दक्षिणी हिस्से में कालिबाता कब्रिस्तान है। यहां किसी वक्त हरे-भरे बागान हुआ करते थे। वहीं उत्तरी जकार्ता में 495 एकड़ में नया कब्रिस्तान बनाने की तैयारी है। जो साल 2021 में बनकर तैयार हो जाएगा। एक अधिकारी के मुताबिक, परेशानी गरीबों को ज्यादा है। शहर में रोज करीब 80 से 100 शव दफनाए जाते हैं। नई कब्र हासिल करने के लिए करीब 5,500 रुपए देने होते हैं। इसके बाद हर तीन साल पर लाइसेंस फीस भी देनी होती है।
डूबते शहर भी बन रहे हैं वजह
हाल ही में जकार्ता को लेकर एक शोधपत्र प्रकाशित किया गया था, जिसमें यह बताया गया था कि साल 2050 तक शहर का एक बहुत बड़ा हिस्सा समुद्र में डूब जाएगा। वहीं उत्तरी जकार्ता हर साल औसतन 1-15 सेंटीमीटर डूबता जा रहा है। आधा जकार्ता समुद्र तल से नीचे है। हालांकि इसके पीछे यह वजह बताई जा रही है कि इंडोनेशिया दलदली जमीन के किनारे पर बसा है, यहां पर 13 नदियां एक दूसरे को काटती हैं। जिसके कारण बाढ़ की समस्या यहां अक्सर बनी रहती है। जिसके कारण जकार्ता का काफी जमीन अक्सर पानी में ही डूबी रहती हैं। इसी का नतीजा है कि यहां पर मरने वालों को दफनाने के लिए कब्रों में जगह नहीं मिल रही है।