APEC Summit: एपेक शिखर सम्मेलन पर भी पड़ा है यूक्रेन युद्ध का साया
APEC Summit: एपेक के महानिदेशक चर्दचाइ चैइवैविद ने गुरुवार को कहा- ‘हालात जैसे हैं, उसी में रहना है- इस नजरिए के साथ एपेक आगे नहीं बढ़ सकता। हमें चुनौतियों का जवाब देना होगा, तभी एपेक प्रासंगिक बना रह सकेगा।’
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एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक) के यहां हो रहे शिखर सम्मेलन में आम सहमति बनना मुश्किल मालूम पड़ रहा है। यूक्रेन युद्ध से बने हालात का साया यहां भी पड़ा हुआ है। साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के सम्मेलन में न आने के फैसले यहां आयोजकों को निराशा हुई है। पर्यवेक्षकों की राय है कि बाइडेन के न आने से यहां सारा ध्यान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर केंद्रित रहा है।
एपेक के महानिदेशक चर्दचाइ चैइवैविद ने गुरुवार को कहा- ‘हालात जैसे हैं, उसी में रहना है- इस नजरिए के साथ एपेक आगे नहीं बढ़ सकता। हमें चुनौतियों का जवाब देना होगा, तभी एपेक प्रासंगिक बना रह सकेगा।’ चैइवैविद मेजबान थाईलैंड के अधिकारी हैं। थाईलैंड इस कोशिश में लगा रहा है कि एपेक के सदस्य देशों में मौजूद तमाम तरह के मतभेदों के बावजूद उनके बीच एक न्यूनतम सहमति यहां बनाई जा सके। थाईलैंड ने कोशिश की है कि खाद्य पदार्थों और ऊर्जा की ऊंची महंगाई से पैदा हुई मुश्किलों का कोई समाधान निकल सके।
विश्लेषकों के मुताबिक पिछले एक हफ्ते में हुए तीनों शिखर सम्मेलनों के मेजबानों को आम सहमति तैयार करने की कठिन चुनौती से गुजरना पड़ा है। पहले दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संघ आसियान का शिखर सम्मेलन कंबोडिया की राजधानी नॉम पेन्ह में हुआ। फिर इंडोनेशिया के बाली में जी-20 देशों की शिखर बैठक हुई। अब एपेक शिखर सम्मेलन का मेजबान थाईलैंड है।
अधिकारियों के मुताबिक एपेक के वार्ताकार क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौते पर सहमति बनाने की दिशा में कुछ आगे बढ़े हैं। इस समझौते के तहत फ्री-ट्रेड एरिया ऑफ एशिया पैसिफिक (एफटीएएपी) अस्तित्व में आएगा। बैंकाक शिखर बैठक में वार्ताकारों ने अब तक जो सफलता पाई है, उसके आधार पर चर्चा हो रही है। लेकिन अधिकारियों ने यह भी कहा है कि इस क्षेत्र में दो मुक्त व्यापार समझौते पहले से हैं। इसे देखते हुए एक नया समझौता करने में कई देशों की दिलचस्पी नहीं है। पहले से मौजूद दो समझौते रिजनल कॉम्प्रिहेन्सिव पार्टनरशिप (आरसीईपी) और कॉम्प्रिहेन्सिव एंड प्रोग्रेसिव एग्रीमेंट फॉर ट्रांस पैसिफिक (सीपीटीपीपी) हैं।
वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम में छपे एक विश्लेषण के मुताबिक एपेक के लक्ष्यों के सामने मुख्य चुनौती भू-राजनीतिक कारणों से पेश आ रही है। चूंकि इस ग्रुप में अमेरिका और उसके साथी देशों के साथ-साथ रूस और चीन भी शामिल हैं, इसलिए इस मौके पर भू-राजनीतिक मसलों पर सहमति बनना कठिन बना हुआ है। इसका असर आर्थिक मुद्दों पर भी पड़ा है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस वेबसाइट से कहा- ‘एपेक कोई एकमत से कोई बयान जारी कर पाएगा, इसकी उम्मीद कम है।’
जी-20 शिखर सम्मेलन में भी ये समस्या सामने आई थी। लेकिन वहां इंडोनेशिया ने उच्च कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया। उसने सभी सदस्य देशों को एक बयान पर राजी कर लिया। उस बयान में युद्ध की निंदा की गई, लेकिन यह भी कहा गया कि इस मामले में कई देशों के अलग विचार हैं। यहां अधिकारियों को उम्मीद है कि उसी पैटर्न पर अंतिम बयान तैयार हो सकेगा। लेकिन एपेक की आर्थिक योजनाओं पर सहमति बनना उससे कहीं ज्यादा मुश्किल है।