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ईरान: डावांडोल अर्थव्यवस्था को कैसे संभालेंगे इब्राहिम रईसी?
Tue, 29 Jun 2021 05:26 PM IST
योगेश साहू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेहरान।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेहरान।
Published by: योगेश साहू
Updated Tue, 29 Jun 2021 05:26 PM IST
सार
ईरान में इस बारे में सबसे ज्यादा कयास लगाए जा रहे हैं कि निर्वाचित राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की सरकार में आर्थिक मामलों का प्रभावी कौन होगा। जानकारों का कहना है ईरान इस समय गहरे आर्थिक संकट में है। देश मुद्रास्फीति की ऊंची दर से जूझ रहा है। रईसी के बारे में माना जाता है कि उन्हें राजकाज चलाने का ज्यादा अनुभव नहीं है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को संभालने की जिम्मेदारी उन्होंने किसी काबिल व्यक्ति को नहीं सौंपी, तो संकट और गहरा सकता है।
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Ebrahim Raisi wins Iran presidential election
- फोटो : Twitter
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विस्तार
ईरान कोरोना महामारी से बुरी तरह प्रभावित देशों में है। साथ ही वह अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों का भी सामना कर रहा है। इन सबके असर से वहां की अर्थव्यवस्था मंदी की शिकार हो चुकी है। खबरों के मुताबिक हाल में वहां हजारों लोगों की रोजी-रोटी गई है और बहुत सी कारोबारी गतिविधियां ठप हैं। जानकारों का कहना है कि ईरान की अर्थव्यवस्था पर सबसे खराब असर 2018 में लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों का पड़ा। तब अमेरिका ने खुद को ईरान परमाणु समझौते से अलग करने के बाद ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए थे।
इस समय अमेरिका को फिर से उस समझौते में शामिल करने के लिए वियना शहर में बातचीत चल रही है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर ये बातचीत कामयाब रही और अमेरिका ने प्रतिबंध हटाए, तो उससे ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिलेगी। गौरतलब है कि ईरान इस वक्त महंगाई से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों की सूची में 12वें नंबर पर है। अमेरिकी की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री स्टीव हैंके ने अनुमान लगाया है कि ईरान में इस वक्त असल मुद्रास्फीति दर 46.9 फीसदी है। ईरान की मुद्रा की कीमत में असाधारण गिरावट आई है। फिलहाल एक डॉलर की कीमत 42 हजार रियाल के बराबर है।
पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि 2016 में ईरान की अर्थव्यवस्था ने 13.4 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की थी। इससे ठीक एक साल पहले ईरान परमाणु डील पर दस्तखत हुए थे और अमेरिका के तत्कालीन बराक ओबामा प्रशासन ने ईरान से बहुत सारे प्रतिबंध हटा लिए थे। उस समय बड़ी संख्या में विदेश निवेशकों ने पैसा लगाने के लिए ईरान का रुख किया था। जिन कंपनियों ने तब ईरान के साथ कारोबार के लिए करार किया, उनमें जनरल इलेक्ट्रिक, रॉयल डच शेल, सिमन्स कॉरपोरेशन, एयरबस एसई और बोईंग शामिल हैं। तब ईरान से तेल के निर्यात में काफी बढ़ोतरी हुई थी। लेकिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के ईरान डील से निकलने के फैसले से ईरान फिर से आर्थिक मुसीबतों से घिर गया।
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इसीलिए यहां जानकारों की राय में असल सवाल यह है कि क्या अमेरिका से ईरान का परमाणु डील के लिए समझौता हो पाएगा। साथ ही यह भी अहम है कि रईसी आर्थिक मामलों का प्रभार किसे सौंपते हैं। अगर परमाणु डील ईरान की मर्जी के मुताबिक नहीं हुआ, तो ये सवाल और भी अहम हो जाएगा। रईसी को ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खामनेई का करीबी माना जाता है। खामेनई ने हाल में आह्वान किया था कि ईरान 'प्रतिरोध की अर्थव्यवस्था' अपनाए।
इसका क्या मतलब है, इस बारे में भी विशेषज्ञ यहां कयास लगाते रहे हैं। खामनेई ने कहा था कि प्रतिरोध की अर्थव्यवस्था का मतलब यह नहीं है कि ईरान बाकी दुनिया से अपना संपर्क काट लेगा। लेकिन इस अर्थव्यवस्था को कैसे अमल में लाया जाएगा, यह उन्होंने साफ नहीं किया है।
जानकारों का कहना है कि रईसी अयातुल्लाह खामनेई के करीबी हैं। इसलिए वे ही शायद इस विचार को बेहतर ढंग से समझने की स्थिति में हैं। जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि इस वक्त ईरान को सबसे ज्यादा उम्मीद चीन से है। उसके साथ 25 वर्ष का रणनीतिक समझौता (स्ट्रेटेजिक ऐग्रीमेंट) करने को लेकर इस समय बातचीत चल रही है। पर्यवेक्षकों ने कहा है कि रूस, एशिया के कई देशों और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ ईरान के इस वक्त अच्छे रिश्ते हैं। ईरान की अर्थव्यवस्था संभालने के लिए रईसी सरकार को शायद पहली उम्मीद उन देशों से ही होगी।
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इस समय अमेरिका को फिर से उस समझौते में शामिल करने के लिए वियना शहर में बातचीत चल रही है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर ये बातचीत कामयाब रही और अमेरिका ने प्रतिबंध हटाए, तो उससे ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिलेगी। गौरतलब है कि ईरान इस वक्त महंगाई से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों की सूची में 12वें नंबर पर है। अमेरिकी की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री स्टीव हैंके ने अनुमान लगाया है कि ईरान में इस वक्त असल मुद्रास्फीति दर 46.9 फीसदी है। ईरान की मुद्रा की कीमत में असाधारण गिरावट आई है। फिलहाल एक डॉलर की कीमत 42 हजार रियाल के बराबर है।
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पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि 2016 में ईरान की अर्थव्यवस्था ने 13.4 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की थी। इससे ठीक एक साल पहले ईरान परमाणु डील पर दस्तखत हुए थे और अमेरिका के तत्कालीन बराक ओबामा प्रशासन ने ईरान से बहुत सारे प्रतिबंध हटा लिए थे। उस समय बड़ी संख्या में विदेश निवेशकों ने पैसा लगाने के लिए ईरान का रुख किया था। जिन कंपनियों ने तब ईरान के साथ कारोबार के लिए करार किया, उनमें जनरल इलेक्ट्रिक, रॉयल डच शेल, सिमन्स कॉरपोरेशन, एयरबस एसई और बोईंग शामिल हैं। तब ईरान से तेल के निर्यात में काफी बढ़ोतरी हुई थी। लेकिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के ईरान डील से निकलने के फैसले से ईरान फिर से आर्थिक मुसीबतों से घिर गया।
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इसीलिए यहां जानकारों की राय में असल सवाल यह है कि क्या अमेरिका से ईरान का परमाणु डील के लिए समझौता हो पाएगा। साथ ही यह भी अहम है कि रईसी आर्थिक मामलों का प्रभार किसे सौंपते हैं। अगर परमाणु डील ईरान की मर्जी के मुताबिक नहीं हुआ, तो ये सवाल और भी अहम हो जाएगा। रईसी को ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खामनेई का करीबी माना जाता है। खामेनई ने हाल में आह्वान किया था कि ईरान 'प्रतिरोध की अर्थव्यवस्था' अपनाए।
इसका क्या मतलब है, इस बारे में भी विशेषज्ञ यहां कयास लगाते रहे हैं। खामनेई ने कहा था कि प्रतिरोध की अर्थव्यवस्था का मतलब यह नहीं है कि ईरान बाकी दुनिया से अपना संपर्क काट लेगा। लेकिन इस अर्थव्यवस्था को कैसे अमल में लाया जाएगा, यह उन्होंने साफ नहीं किया है।
जानकारों का कहना है कि रईसी अयातुल्लाह खामनेई के करीबी हैं। इसलिए वे ही शायद इस विचार को बेहतर ढंग से समझने की स्थिति में हैं। जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि इस वक्त ईरान को सबसे ज्यादा उम्मीद चीन से है। उसके साथ 25 वर्ष का रणनीतिक समझौता (स्ट्रेटेजिक ऐग्रीमेंट) करने को लेकर इस समय बातचीत चल रही है। पर्यवेक्षकों ने कहा है कि रूस, एशिया के कई देशों और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ ईरान के इस वक्त अच्छे रिश्ते हैं। ईरान की अर्थव्यवस्था संभालने के लिए रईसी सरकार को शायद पहली उम्मीद उन देशों से ही होगी।